अमर उजाला डॉट कॉम ने आणंद के बोरसद गांव में ईश्वर भाई से बातचीत की। उन्होंने कई एकड़ में केले के पौधे लगा रखे हैं। ईश्वर भाई ने बताया, एक साल में केला तैयार हो जाता है। गर्मी में हर तीसरे दिन में पानी देना पड़ता है। सर्दी के मौसम में दस दिन बाद पानी देना होता है। केलों को खेत में नहीं पकने दिया जाता। इन्हें यहां से कच्चा ही भेजा जाता है। गुजरात के आणंद से राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और दूसरे राज्यों में केले की सप्लाई होती है।
केले की खेती मुनाफे का सौदा होता है। रेट के हिसाब से केला बिकता है। जहां भी केले का रेट ज्यादा मिलता है, वहीं भेज देते हैं। केले के एक पौधे पर 130 से ज्यादा केले लगते हैं, लेकिन हमें बीस रुपये किलो का भाव मिलता है। यानी केले का एक पूरा गुच्छा चार सौ रुपये प्रति किलोग्राम के रेट में बिकता है। खास बात है कि बाजार में जब भी केला खरीदा जाता है, तो वह गिनती के हिसाब से मिलता है, लेकिन जब यह केला, किसान के खेत से चलता है, तो उसे वजन के हिसाब से खरीदा जाता है। काटे जाने के समय केले के गुच्छे का वजन तीस से पैंत्तीस किलोग्राम होता है, लेकिन किसान को बीस रुपये प्रति किलोग्राम का रेट मिलता है।
केले की पैदावार में प्राकृतिक जोखिम रहता है। अगर सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आंधी चलती है, तो उसमें केले का पौधा गिर जाता है। ये ऐसा जोखिम है, जो किसान को ही झेलना पड़ता है। ईश्वर भाई से जब फसल बीमा के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, हमारे यहां ये तो चलता ही नहीं है। केले का पौधा जब लगाया जाता है, तो वह दो-तीन इंच का होता है। कोई कंपनी एक फुट लंबा पौधा भी देती है। ये पौधे टिश्यू कल्चर के जरिए तैयार होते हैं। जैसे मौजूदा वर्ष में एक पौधे की कीमत 17 रुपये पचास पैसे होती है। पिछले वर्ष में 16 रुपये पचास पैसे थी।
आणंद में कृषि योग्य भूमि के लगभग 35 से 40 फीसदी हिस्से पर केला उगाया जाता है। अधिकांश किसान, केले और आलू की खेती करते हैं। केला तैयार होने के बाद इसका साइज एक फुट तक रहता है। केले के सबसे ऊपर वाले गुच्छे में 30-35 केले रहते हैं। नीचे वाले में दो-दो कम होते रहते हैं। आखिरी गुच्छे में दस-बारह तक केले होते हैं, उसे काट देते हैं। चार-पांच वर्ष में एक आध बार घाटा भी झेलना पड़ सकता है, लेकिन कुल मिला केले की पैदावार मुनाफे का सौदा है। आणंद का केला, न केवल साइज में बड़ा होता है, बल्कि इसकी गुणवत्ता और रंग भी अलग रहता है। पंजाब और जम्मू में आणंद का केला खूब पसंद किया जाता है। केले के नीचे जो नए पौधे निकलते हैं, उन्हें काटना होता है। अन्यथा बड़े पौधे की खुराक वहां तक नहीं पहुंचती। व्यापारी हमारे खेत से कच्चा केला उठाते हैं। उनके पास स्टोरेज की व्यवस्था होती है। चार दिन में केला पक जाता है। जम्मू में चार दिन तो पंजाब में तीसरे दिन केले की खेप पहुंच जाती है।
सरकार द्वारा ड्रिप सिंचाई पर पांच रुपये की सब्सिडी दी जाती है। अगर फसल का नुकसान होता है, तो सरकार कुछ आर्थिक मदद भी करती है। आंधी तूफान से बचाने के लिए केले के साथ में एक सपोर्ट देते हैं। इससे नुकसान कम होता है। केले के पौधे को काटने के बाद जो वेस्ट एकत्रित होता है, उसे खाद के तौर पर इस्तेमाल कर लिया जाता है। हालांकि सभी किसान ऐसा नहीं कर पाते हैं। वे उस वेस्ट को खेत से हटा देते हैं। दो साल बाद खेत को दोबारा से तैयार कर केले की पौध लगाई जाती हैं।