धारा 124-ए पर सु्प्रीम कोर्ट
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1962 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नारेबाजी करना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता। वहीं कई ऐसे मामले हैं, जिनमें कोर्ट ने सरकार या प्रशासन के खिलाफ उठाई गई आवाज को राजद्रोह के अधीन नहीं माना है। बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर 1962 में राज्य सरकार ने एक भाषण के मामले में देशद्रोह का केस दर्ज किया था, जिस पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी।
केदारनाथ सिंह के चर्चित केस पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की एक बेंच ने भी आदेश दिया था। इस आदेश में कहा गया था, 'देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है, जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े'।
हाल में इस कानून से जुड़े चर्चित मामले
हाल के वर्षों में इस कानून के चर्चित मामलों की बात करें तो वीएचपी नेता प्रवीन तोगड़िया, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी , पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और जेएनयू प्रेसीडेंट कन्हैया कुमार को इसी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। इन सभी मामलों के चर्चा में आने के बाद से ही इस कानून पर बहस तेज हो गई थी।
क्या है इसके आलोचकों का तर्क
इस कानून को लंबे समय से खत्म करने की बात की जाती रही है। कई जानकारों का मानना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का दमन करता है और संविधान की धारा 19 (1) ए में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से इसका टकराव है।
क्या है इसका इतिहास
इस कानून को अंग्रेजों ने 1870 में आईपीसी में शामिल किया था और उस वक्त अंग्रेज इस कानून का इस्तेमाल उन भारतीयों के लिए करते थे, जो उनके खिलाफ आवाज उठाते थे। आजादी की लड़ाई के दौरान देश के कई क्रांतिकारियों पर यह केस लगाया गया था। आजादी से पहले इसी कानून के तहत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक पर कार्रवाई की गई थी।