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क्या है देशद्रोह का कानून? जिसको खत्म करना चाहती है कांग्रेस, किया है घोषणापत्र में शामिल

Sat, 06 Apr 2019 10:36 AM IST
Trainee Trainee चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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आईपीसी की धारा 124-A - फोटो : Amar Ujala
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कांग्रेस पार्टी ने मंगलवार को अपना घोषणापत्र जारी करते हुए न्याय योजना, राफेल डील की जांच समेत कई बड़े वादे किए है लेकिन घोषणापत्र जारी होने के बाद से ही भाजपा उस पर ये कहते हुए हमलावार हो गई है कि कांग्रेस ने देश के लिए विघटनकारी घोषणापत्र तैयार किया है। कांग्रेस पार्टी के 'जनआवाज' नाम से जारी किए गए घोषणापत्र में आईपीसी की धारा 124-ए को खत्म करने की बात कही गई है। 

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क्या है आईपीसी की धारा 124-ए

भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 124 ए को ही राजद्रोह का कानून कहा जाता है। अगर कोई व्यक्ति देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधि को सार्वजनिक रूप से अंजाम देता है तो यह 124 ए के अधीन आता है।

साथ ही अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है, ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ ही संविधान का अपमान करता है तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 124 ए के तहत राजद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है। इन गतिविधियों में लेख लिखना, पोस्टर बनाना, कार्टून बनाना जैसे कार्य भी शामिल होते हैं।
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कितनी सजा का है प्रावधान

इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर अपराधी को 3 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है
 
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सुप्रीम कोर्ट की इस कानून पर टिप्पणी

धारा 124-ए पर सु्प्रीम कोर्ट - फोटो : PTI
1962 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नारेबाजी करना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता। वहीं कई ऐसे मामले हैं, जिनमें कोर्ट ने सरकार या प्रशासन के खिलाफ उठाई गई आवाज को राजद्रोह के अधीन नहीं माना है।  बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर 1962 में राज्य सरकार ने एक भाषण के मामले में देशद्रोह का केस दर्ज किया था, जिस पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

 केदारनाथ सिंह के चर्चित केस पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की एक बेंच ने भी आदेश दिया था। इस आदेश में कहा गया था, 'देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है, जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े'।
 
हाल में इस कानून से जुड़े चर्चित मामले

हाल के वर्षों में इस कानून के चर्चित मामलों की बात करें तो वीएचपी नेता प्रवीन तोगड़िया, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी , पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और जेएनयू प्रेसीडेंट कन्हैया कुमार को इसी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। इन सभी मामलों के चर्चा में आने के बाद से ही इस कानून पर बहस तेज हो गई थी।

क्या है इसके आलोचकों का तर्क

इस कानून को लंबे समय से खत्म करने की बात की जाती रही है। कई जानकारों का मानना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का दमन करता है और संविधान की धारा 19 (1) ए में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से इसका टकराव है।

क्या है इसका इतिहास

इस कानून को अंग्रेजों ने 1870 में आईपीसी में शामिल किया था और उस वक्त अंग्रेज इस कानून का इस्तेमाल उन भारतीयों के लिए करते थे, जो उनके खिलाफ आवाज उठाते थे। आजादी की लड़ाई के दौरान देश के कई क्रांतिकारियों पर यह केस लगाया गया था। आजादी से पहले इसी कानून के तहत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक पर कार्रवाई की गई थी।
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