यही वो दौर था, जब पहली बार इन्हें बीजेपी ने बिहार से राज्यसभा का सदस्य बनने का मौका दिया। इसके कुछ ही समय पहले, यानी 1996 में चारा घोटाले का भंडाफोड़ होने के बाद पटना हाइ कोर्ट में दायर पीआईएल के याचिकाकर्ताओं ने इन्हें अपना एडवोकेट नियुक्त किया था। लालू प्रसाद यादव और अन्य के खिलाफ चले उस बहुचर्चित मुकदमे में रवि शंकर प्रसाद खूब चर्चित हुए।
1995 में ही रविशंकर प्रसाद को बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बतौर सदस्य मनोनीत कर लिया गया था और तब से कई 'हाई प्रोफ़ाइल' मामलों में पार्टी उनसे मदद लेने लगी थी। मतलब बीजेपी में अरुण जेटली के अलावा एक और कानूनी जानकार/सलाहकार की शक्ल में रवि शंकर प्रसाद उभरने लगे थे। एक साल बाद 2001 में वाजपेयी मंत्रिमंडल में कोयला और खदान विभाग के राज्यमंत्री, 2002 में केंद्रीय कानून राज्यमंत्री और 2003 में केंद्रीय सूचना प्रसारण राज्यमंत्री बने रवि शंकर प्रसाद का सियासी कद बढ़ने लगा। फिर 2006 में इन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बना कर बिहार से राज्यसभा की सदस्यता का दूसरा टर्म और 2012 में तीसरा टर्म उपलब्ध कराया गया।
इसी दौरान रविशंकर प्रसाद पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव पद पर प्रोन्नत हुए। इतना ही नहीं, 2016 में तो इन्हें नरेंद्र मोदी सरकार में कानून मंत्री के अलावा इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक्स महकमे का भी मंत्री बना दिया गया। इतने चमकदार प्रोफाइल के बावजूद रवि शंकर प्रसाद की सियासत पर एक सवाल अब तक चिपका रहा है। सवाल है कि चुनावी मैदान में उतर कर सीधे लोगों के वोट से चुन कर लोकसभा पहुँचने जैसी लीडरशिप अबतक वो क्यों नहीं दिखा सके?
खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। मौका आ गया है, जब रवि शंकर प्रसाद बिहार की शायद सबसे महत्त्वपूर्ण 'पटना साहेब लोकसभा सीट' के लिए बीजेपी के उम्मीदवार बन कर पहली बार चुनावी संघर्ष में उतरने जा रहे हैं। मुकाबला खासा रोचक और जोरदार होने की संभावना इसलिए है क्योंकि बीजेपी से विद्रोह कर के कांग्रेस का प्रत्याशी बनने जा रहे शत्रुघ्न सिन्हा यहाँ रवि शंकर प्रसाद के प्रतिद्वंद्वी होंगे।