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कानों देखी : राहुल गांधी आहत हैं

Sun, 24 Mar 2019 09:37 PM IST
संदीप भट्ट शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
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राहुल गांधी (फाइल फोटो ) - फोटो : Instagram
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राहुल गांधी दोस्तों के दोस्त हैं, लेकिन जब दोस्त ही दगा करने लगे तो क्या करें? राजनीति में इस मर्ज की दवा उनके पास नहीं है। राहुल को तब बहुत खुशी हुई थी जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस अध्यक्ष के आग्रह पर दोस्ती का फर्ज निभाते हुए मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद से अपना दावा छोड़ दिया। कमलनाथ की राह आसान हो गई।

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कांग्रेस अध्यक्ष राजस्थान में मित्रवत सचिन पायलट से किया वादा भी नहीं निभा पाए। राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाने के लिए निभाने की भरसक कोशिश की, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के कारण कांग्रेस अध्यक्ष को समझौता करना पड़ा। उन्होंने सचिन की जमकर सुनी, उन्हें उपमुख्यमंत्री का पद देकर मनाया, सचिन राहुल की कद्र करके मान भी गए। इसी कड़ी में कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे जितेन्द्र प्रसाद के पुत्र जतिन प्रसाद हैं। राहुल गांधी कई बार उन्हें उत्तरप्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने तक सोच चुके हैं, लेकिन जतिन ने ही पैर पीछे खींच लिए।

जतिन को कांग्रेस ने काफी कुछ दिया और जतिन  ने बिना कांग्रेस अध्यक्ष को विश्वास में लिए, भाजपा में जाने  की तैयारियों को हवा देना शुरू कर दिया। बताते हैं इस पूरे घटनाक्रम से राहुल गांधी काफी अपसेट हो गए थे। खैर, प्रियंका और ज्योतिरादित्य ने राह निकाल ली है। अब कांग्रेस अध्यक्ष को कौन बताए कि भाई यहां कोई किसी का सगा नहीं होता है। राजनीति वह विधा है जहां अपना ही ठगा होता है।

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मायावती के जी का जंजाल

आज बोया है तो कल काटना पड़ेगा। कितनी सच्ची बात है। मायावती को यह परेशान कर रहा है। उनके करीबी नौकरशाह रहे नेतराम पर जांच एजेंसी का शिकंजा कस रहा है। कहां से आई 200 करोड़ की संपत्ति? भाई आनंद को लेकर भी मायावती को एसी में पसीने आ रहे हैं। बसपा सुप्रीमों का अपना भी मामला है।

मायावती के साथ रहने वाले एक खिन्न से चल रहे सूत्र के अनुसार बसपा कॉडर भी सबकुछ नहीं समझ पा रहा है। अब यह आशंका तेज हो चली है कि बसपा चुनाव बाद केन्द्र में भाजपा का साथ दे सकती है। खासकर मायावती के कांग्रेस से दूरी बनाने की घोषणा ने इसे और बल दे दिया है।

बताते हैं प्रियंका गांधी के भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर से मिलने का बहाना लेकर मायावती कुपित हो गई थी। उन्होंने समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश से भी बात की। मायावती ने कांग्रेस को गठबंधन से बाहर रखने के बाद और कड़ा रुख अपनाना चाहा, लेकिन समाजवादी पार्टी इससे परहेज करना चाहती थी।

फिर भी मायावती ने आव देखा न ताव अमेठी, रायबरेली से उम्मीदवार उतारने का बयान दे दिया। इन सब को बसपा पर केन्द्रीय जांच के दबाव के तौर पर देखा जा रहा है। बसपा  के इस रुख पर आजमगढ़ के बसपा नेता का कहना है कि यही हाल रहा तो भले ही हमारे पास घठबंधन में अधिकतम ग्रामीण और कस्बा बहुलता वाली सीटें हैं, लेकिन नुकसान उठाना पड़ सकता है।  





 

नेता जी भी चुप : पार्टी विद द डिफरेंस

समय बदलता है तो राजनीति के पैमाने भी बदल जाते हैं। भाजपा इसी को इंज्वाय कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पार्टी में किसी की कूवत नहीं है कि अनुशासन के खिलाफ ढंग से मुंह खोल दे और यदि खोल दे तो बाहर का रास्ता भी देख ले। कीर्ति आजाद पहले चले गए, शत्रुघ्न सिन्हा भेज दिए गए। नो चूं, नो चपड़।

ताजा मामला देखिए। लौहपुरुष, भाजपा के संस्थापक, 90 के  दशक में भाजपा की धरोहर वाले नारे के प्रमुख पात्र आडवाणी का गांधी नगर से टिकट कट गया। सोशल मीडिया, मीडिया ने खूब शोर मचाया, पार्टी  के किसी नेता ने कुछ नहीं कहा। भाजपा के दूसरे संस्थापक डा. मुरली मनोहर जोशी चुप हैं।

उ.प्र. के भाजपा से ब्राह्मण चेहरा कलराज मिश्र ने खुद चुनाव न लडऩे की घोषणा कर दी। पुत्र के लिए टिकट की मांग को तेज किया। लोकसभा अध्यक्ष  सुमित्रा महाजन ने अपनी मंशा जता दी है। उभा भारत ने चुनाव न लडऩे के संकल्प को दोहराया, सुषमा स्वराज ने पहले ही स्वास्थ्य कारणों से चुनाव न लडऩे की बात कही।

शांता कुमार, भुंवन चंद्र खंडूरी समेत कई नेता चुपचाप सक्रिय राजनीति में मिल रहे सन्यास को मानो मंजूर कर रहे हैं। यहां तक शानदार प्रवक्ता, बेगुसराय, बिहार की सीट पर पांच साल तक काम कर चुके, वहां के प्रचार अभियान में सक्रिय और अससमय सक्रिय राजनीति से विदा किए जा रहे शहनवाज हुसैन भी चुप हैं। यहीं कहीं और होता तो कोहराम मच जाता। इसे कहते हैं पार्टी विद द डिफरेंस।



 

क्या अनार जयेश पटेल को सांसद बनना था?

आप अनार जयेश पटेल को जानते हैं? नहीं तो आइए हम बताते हैं। मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की पुत्री हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अनार जयेश पटेल की सक्रियता, बुद्धिमत्ता, सूझ-बूझ पसंद हैं। आनंदी बेन पटेल भी पीएम को भी पीएम का विश्वास हासिल है।

वह पीएम के गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान कैबिनेट में थी और बाद में उत्तराधिकारी भी बनी थी। बताते हैं अनार जयेश पटेल भी सार्वजनिक राजनीति में आना चाहती हैं। प्रधानमंत्री की तरफ से उन्हें हरी झंडी मिल गई थी। वह और उनका एनजीओ करीब एक साल से गांधी नगर में सक्रिय है।

गुजरात के एक नेता की माने तो यदि आडवाणी जी का इस सीट से उत्तराधिकारी होना चाहती थी। भाजपा के नेताओं का एक तबका भी इसके पक्ष में था, लेकिन बताते हैं आखिरी समय में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बानगी दिखाई और दावा ठोंक दिया। अमित शाह की गांधी नगर सीट से चुनाव लडऩे की इच्छा को भला अभी कौन टाल सकता था।

प्रधानमंत्री भी ऐसा नहीं चाहेंगे। 2019 में प्रधानमंत्री अर्जुन की भूमिका में हैं तो सारथी शाह ही हैं। वैसे भी मामला धीरे-धीरे प्रधानमंत्री के उत्तराधिकार और भाजपा में प्रभाव का भी है।



 

कांग्रेस का मध्यप्रदेश घमासान

कहते हैं राख के नीचे लंबे समय तक आग जिंदा रहती है। मध्यप्रदेश में कुछ ऐसा ही है। कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने-अपने पत्ते फेट रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिग्विजय का इशारा पाकर उन्हें भोपाल से लोकसभा प्रत्याशी घोषित कर दिया।

बताते हैं इसके पीछे जोरदार राजनीतिक गणित है। छिंदवाड़ा को लेकर भी सबकुछ दांव पर है। गुना और ग्वालियर में ज्योतिरादित्य वीटो लगा रहे हैं। वह ग्वालियर की सीट पत्नी प्रियदर्शिनी के लिए चाह रहे हैं। गुना उनकी अपनी संसदीय सीट है। कवायद मध्यप्रदेश में भरपूर पांव जमाए रखने की है।

इधर सिंधिया की परीक्षा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है, लेकिन व्यस्तता मध्यप्रदेश में है। उनके सामने एक अड़चन और है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को राजनीतिक गतिविधि के लिए अपना बंगला ठीक नहीं लगता। वह राहुल गांधी के बंगले से राजनीतिक अभियान चलाकर मीडिया को तिल का ताड़ बनाने का मौका नहीं देना चाहती।

लिहाजा प्रियंका साथी ज्योतिरादित्य के घर पहुंच जाती हैं। अब ज्योतिरादित्य की मुसीबत यह भी है कि कब मध्यप्रदेश  में रहें, कब पश्चिमी उत्तरप्रदेश में और कब दिल्ली? चलाना तो सबकुछ है।





 

राहुल तो नहीं चाहते, कांग्रेस के नेता जो सोचें

क्या राहुल गांधी केरल या कर्नाटक की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे? कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि अमेठी के बाद वह दोनों राज्यों में जहां से भी चुनाव लडऩा चाहेंगे, जरूरत जीत जाएंगे। वैसे भी राहुल गांधी ने अपनी उदारता से पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा को काफी खुश कर रखा है।

माकपा के सीताराम येचुरी भी राहुल गांधी की सुनते हैं। केरल और कर्नाटक में कांग्रेस को अपना समय भी अच्छा दिखाई दे रहा है। लेकिन राहुल गांधी केवल अमेठी से चुनाव लडऩे के पक्ष में हैं। राहुल गांधी का मानना है कि भाजपा स्मृति ईरानी के बहाने उन्हें घेरने के लिए चाहे जितनी ताकत लगा ले, लेकिन कामयाब नहीं होगी।

यहां तक कि हार जीत का अंतर भी बड़ा होगा। राहुल को यह भी लग रहा है कि दो जगह से चुनाव लडऩा केवल संसाधन की बरबादी है। हालांकि कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि 2019 लोकसभा चुनाव काफी अहम है। उत्तर और दक्षिण भारत को जोडऩा है। यहीं इंदिरा गांधी ने किया था, चिकमंगलूर से चुनाव में उतरी थी। सोनिया गांधी ने बेल्लारी से लडऩे का निर्णय लिया था। इसका कांग्रेस को फायदा हुआ था।
 

कैप्टन के सब हुए दिवाने

पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह का भी जवाब नहीं है। कोई शक-सुबहा नहीं रखते। आजकल कांग्रेस उनकी शैली के दिवाने हो रहे हैं। कैप्टन ने केवल अपने विरोधियों को हाशिए पर रखा है, बल्कि पार्टी के विरोधी भी खामोश चल रहे हैं। किसी की दाल नहीं गल रही है। प्रताप सिंह बाजवा को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है।

कैप्टन शैली ने अकाली दल, पंजाब में प्रधानमंत्री मोदी और आम आदमी पार्टी को भी घुटने के बल बैठा रखा है। नवजोत सिंह सिद्धू की जुबानी पतंग को भी वह ज्यादा नहीं उडऩे देते। इतना ही नहीं कैप्टन कांग्रेस हाई कमान से भी जरूरत के हिसाब से ही टच में रहते हैं। कैप्टन के करीबी पार्टी के नेता ने जब इसका राज पूछा गया तो कैप्टन ने उन्हें दो लाइन का जवाब दे दिया।

भाई जी का मुंह लटक गया। कैप्टन ने पूछने वाले कांग्रेसी नेता से कहा कि तुम बहुत कुछ भ्रम में रखते हो। मैं (कैप्टन) जीवन और राजनीति में कहीं भी कुछ भी भ्रम में नहीं रखता। चाहो तो देख लो।




 
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2019 में क्या होगा?

सबकुछ होने के बाद भाजपा को अंतत: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भरोसा है। पार्टी के एक  महासचिव का कहना है कि प्रत्याशियों की घोषणा शुरू होने के बाद अभी प्रधानमंत्री का प्रचार अभियान शुरू नहीं हुआ है। लेकिन विपक्ष बेदम नजर आ रहा है।

खबर यह भी है कि इस बार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का प्रचार अभियान पहले कहीं ज्यादा हाईटेक चलेगा और पार्टी के नेता थोड़ा छंडी सांस लेकर पूर्ण बहुमत लाने का दावा कर रहे हैं। संघ परिवार के एक चिंतक के अनुसार उन्हें एनडीए के 235-240 सीटें लाने का अनुमान है।

बताते हैं प्रांत प्रचारकों के आकलन के आधार पर संघ को इसी तरह नतीजा आने की उम्मीद है। चुनाव बाद एनडीए का दायरा और बढऩे की संभावना है और भाजपा के नेतृत्व वाली सहयोगी सरकार बन सकती है।

राहुल गांधी की टीम में सक्रिय सदस्य के अनुसार उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात में भाजपा को जो झटका लगने वाला है, उसकी भरपाई मुश्किल है। सूत्र का कहना है कि कांग्रेस पास इनमें से कई राज्यों में उत्साहजनक खबरे हैं।

हमारा अनुमान है कि भाजपा 160-170 के पार नहीं जाएगी और यहीं से कांग्रेस का उत्थान होगा।  अब देखना है कि देश की जनता 11 अप्रैल से 23 मई के बीच में कैसी लोकसभा देती है।
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