भाजपा की रणनीति साफ नजर आती है। यूपी में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई दूसरे बड़े राज्यों से की जाए। नए सहयोगी तलाशें जाएं। सबसे पहले नीतीश कुमार को अपने पाले में कर बिहार में लड़ाई का मैदान मजबूत किया गया। यहां 40 सीटें हैं। महाराष्ट्र में नाराज शिवसेना को भी मनाया गया। 48 सीटों वाले इस राज्य में अकेले लड़कर भाजपा को नुकसान होना तय था। एक और बड़े राज्य तमिलनाडु में भाजपा ने बड़ा दांव खेलते हुए विपक्ष को चौंका दिया। यहां एआईएडीएमके और पीएमके के साथ हाथ मिला लिया। 39 सीटों वाले इस राज्य में भाजपा को बड़ा फायदा हो सकता है।
2014 में एआईएडीएमके ने 37 सीटें जीती थीं। भाजपा ने एक सीट हासिल की थी। वहीं, महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटों पर कब्जा जमाया था। कांग्रेस को दो सीटें जबकि एनसीपी के खाते में चार सीटें आईं। यानि दोनों ने मिलकर 48 में से 41 सीटों पर जीत हासिल कर विपक्ष को करारी मात दी। दोनों का साथ एक बार फिर यहां भगवा रंग खिला सकता है।
विपक्ष को नेता की तलाश
ऐसे वक्त पर जब विपक्ष में एक कद्दावर नेता की तलाश हो रही है, भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में एनडीए को नया आकार देना शुरू कर दिया है। भले ही चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया हो, लेकिन अब एनडीए के कुनबे में नए साथियों का प्रवेश हो रहा है। उधर, विपक्ष अभी भी ऐसे नेता की तलाश में है जो सर्वमान्य हो, कभी ममता बनर्जी का नाम सामने आता है तो कभी राहुल गांधी का। चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार भी रेस में नजर आते हैं।