17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव के नतीजे भारतीय राजनीति में नई इबारत लिखेंगे। नतीजे यह भी साफ कर देंगे कि करीब सात दशक से चली आ रही परंपरागत राजनीति ही जारी रहेगी या अब नई राजनीति अपने सफर पर आगे बढ़ेगी, जिसका सूत्रपात पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी कार्यशैली से किया है। जाहिर तौर पर अगर देश में पहली बार विशुद्ध गैर कांग्रेसी सरकार लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतती है, तो राजनीति के चरित्र में कई अहम बदलाव होंगे। खासतौर पर विपक्ष को भाजपा और मोदी-शाह की नई राजनीतिक कार्यशैली से मुकाबले के लिए अपनी राजनीतिक कार्यशैली में बड़े बदलाव करने होंगे।
दरअसल, 1952 से शुरू हुआ संसदीय राजनीति का सिलसिला 16वें चुनाव तक एक ही ढर्रे पर चला। मसलन, सत्ताधारी और विपक्ष दोनों ही चुनावी वर्ष या उससे कुछ पहले ही चुनावी मोड में आए। चुनाव से ठीक पहले कुछ अहम विकास योजना या कल्याणकारी कार्यक्रम की घोषणा और लोकलुभावन नारों की बदौलत जीत-हार की पटकथा लिखी गई। हां, नब्बे के दशक में मंडल आयोग की रिपोर्ट आने के बाद कई क्षेत्रीय दलों ने अपने लिए जातिगत समर्थक वर्ग बनाने में सफलता हासिल की। इससे संसद और विधानसभा चुनावों में जातीय और अन्य क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर चेहरे तो बदले मगर, राजनीति उसी पुरानी परिपाटी पर चली।
मोदी व शाह की जोड़ी सतत चुनावी मोड में
साल 2014 के आम चुनाव के नतीजे और इसमें पहली बार किसी गैर कांग्रेस सरकार को अपने दम पर मिले बहुमत के बाद पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह की जोड़ी ने चुनावी राजनीति की गाड़ी को दूसरी पटरी पर डाल दिया। दोनों शीर्ष नेताओं ने चुनाव को 24 गुणा 7 का काम बना दिया। पार्टी चुनाव जीतने के महज छह-सात महीने बाद ही चुनावी मोड में आ गई। साल 2016 से ही पार्टी ने बूथ स्तर पर मजबूत संरचना, युद्धस्तर पर कार्यकर्ता बनाने का अभियान, एक-एक योजना का युद्ध स्तर पर प्रचार—प्रसार, केंद्रीय योजनाओं के करोड़ों लाभार्थियों से लगातार और सीधे संवाद की रणनीति को जमीन पर उतारा।
बूथ डाटा व संपर्क पर बड़ा काम चुनाव से पहले ही देश भ्रमण पूरा
चार साल पहले ही पार्टी ने पहली बार वोट डालने वालों का डाटा बनाने की शुरुआत की, एक-एक बूथ पर बनाई गई कार्यकर्ताओं की कमेटियों का डाटा तैयार किया। इनसे संपर्क करने का ढांचा एक साल पहले ही न सिर्फ तैयार किया, बल्कि पीएम से लेकर तहसील स्तर तक इनसे सीधा संपर्क की मजबूत संरचना तैयार की। यही कारण है कि विपक्षी दल जहां चुनाव संबंधी अधिसूचना जारी होने का इंतजार कर रहे थे, पीएम मोदी और शाह चुनाव से छह सात महीने पूर्व ही पूरे देश का भ्रमण कर चुके थे।
योजनाओं से लाभान्वित वर्ग होगा जातीय राजनीति की काट?
देश में क्षेत्रीय दल जातीय राजनीति के लिए जाने जाते हैं। ऐसे दलों की रणनीति समर्थक जातिवर्ग के साथ चुनाव के दौरान कुछ अन्य जातियों को साधकर चुनावी बाजी जीतने की रही है। आमतौर पर माना जाता है कि कुछ जातियां ऐसी हैं, जो दल विशेष से हर हाल में जुड़ी रहेंगी। हालांकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस के प्रति रोष और इस पार्टी को सबक सिखाने के बने माहौल ने इस धारणा में बदलाव की शुरुआत की। तब भी माना गया कि ऐसे वर्गों का इस तरह का बदला हुआ वोटिंग पैटर्न महज एक संयोग है।
हालांकि अगर भाजपा की सत्ता में वापसी होती है, तो ऐसे जातीय आधार को साधकर चलने वाले क्षेत्रीय दलों को भी रणनीति में बड़ा बदलाव लाना होगा। भाजपा का दावा है कि गरीब केंद्रित 134 विशेष योजनाओं के जमीनी स्तर तक उचित अमल के बाद इस तरह की जातीय राजनीति को करारी चोट लगी है। मगर पार्टी के इस दावे पर विश्वास के लिए नतीजों का इंतजार करना होगा। अगर भाजपा की सत्ता में वापसी होती है तो यह माना जाएगा कि ऐसी राजनीति में मजबूत चोट की ठोस शुरुआत हो चुकी है। योजना लाभान्वित वर्ग जातीय दायरे को तोड़कर वोट करेगा या नहीं, इसकी पुष्टि परिणाम से होगी।
नेतृत्व और गठबंधन के स्वरूप पर स्पष्ट होगी धारणा
देश में कई बार चुनाव के बाद कई दलों ने गलबहियां कर सत्ता का स्वाद चखा। वर्ष 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनाव तक सिलसिला जारी रहा। बीते चुनाव में अकेले एक पार्टी (भाजपा) को बहुमत और उसकी अगुवाई वाले राजग को प्रचंड बहुमत मिला। अगर 2019 में भी यह सिलसिला जारी रहा तो विपक्ष को गठबंधन के लिए चुनाव के बाद नहीं, बल्कि हर हाल में चुनाव से पहले ही अमलीजामा पहनाना होगा। भाजपा की जीत यह साबित कर देगी कि मतदाता नेतृत्व के रूप में असमंजस की स्थिति को स्वीकार नहीं करेगा।
कांग्रेस की जगह भाजपा बनेगी विरोध की धुरी
संसदीय चुनाव के इतिहास में शुरुआती करीब चार दशकों तक विपक्षी दलों के विरोध की धुरी कांग्रेस रही थी। 1998-1999 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में भाजपा विरोधी धुरी की जमीन तैयार हुई। वर्ष 2014 में सियासत ने पूरी तरह से करवट ली और विपक्ष के विरोध की धुरी कांग्रेस की जगह भाजपा बन गई। जाहिर तौर पर भाजपा की एक और जीत उसे निर्विवाद रूप से कांग्रेस की जगह विरोध की धुरी के रूप में स्थापित कर देगी।