चतुर्वेदी बताते हैं कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों की असफलता के बाद महाराष्ट्र और मुंबई की राजनीति में राज ठाकरे अप्रासंगिक होते जा रहे थे। पिछले करीब एक साल से शिवसेना जिस आक्रामक अंदाज में भाजपा और मोदी सरकार का विरोध कर रही थी, उससे सरकार में साझीदार रहते हुए भी उसने विपक्ष की भूमिका अपना ली थी। जमीन पर भी किसान असंतोष, नोटबंदी और जीएसटी से नाराजगी, बेरोजगारी, पेट्रोल डीजल की महंगाई आदि से उपजे गुस्से और नेतृत्व की भूमिका ने शिवसेना के कार्यकर्ताओं और समथर्कों को भी भाजपा और केंद्र सरकार के खिलाफ कर दिया।
अचानक भाजपा से समझौते के बाद शिवसेना नेताओं के यूटर्न ने उसके समर्थकों और कार्यकर्तांओं में निराशा भर दी। शिवसेना के पुराने कार्यकर्ता उन दिनों को याद करते हैं जब अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज भाजपा नेता मातोश्री जाकर बाला साहब ठाकरे से मिलते थे। लेकिन जिस तरह उद्धव ने अपने तेवर नरम करके उस भाजपा से समझौता किया जिसे समझौते से एक सप्ताह पहले तक वह कोसते नहीं थकते थे, उससे शिवसेना के जनाधार के मराठी स्वाभिमान को भी धक्का लगा है। अनुराग चतुर्वेदी की इस बात का समर्थन पत्रकार अभिलाष अवस्थी भी करते हैं।
अवस्थी के मुताबिक शिवसेना की राजनीति ही मुंबई में गुजराती और दक्षिण भारतीयों के वर्चस्व के खिलाफ शुरू हुई थी। संयोग से वर्तमान भाजपा के दोनों शिखर नेता गुजराती हैं। राज ठाकरे हालांकि सीधे गुजरातियों के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन मोदी और शाह पर निशाना साधकर वह शिवसेना के जनाधार की इस दबी भावना को भी उभारने की कोशिश कर रहे हैं। राज ठाकरे इसे अपने लिए एक नया अवसर मान रहे हैं और उन्होंने बिना कोई उम्मीदवार खड़ा किए जिस तरह मोदी सरकार और भाजपा पर हमला बोलना शुरु किया है, उससे शिवसेना के जनाधार में उनका आकर्षण बढ़ने लगा है।
राज सीधे-सीधे कह रहे हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी ने साठ महीने यानी पांच साल मांगे थे और देश ने उन्हें दिए। अगर पांच साल जैसे नरेंद्र मोदी को देश ने देखा और परखा उसी तरह का मौका अब राहुल गांधी को क्यों नहीं मिलना चाहिए। राज ठाकरे ने इधर अपने मुस्लिम विरोधी और उत्तर भारतीय विरोधी तेवरों को भी नरम किया है। राज ठाकरे की यह नई और बदली भूमिका महाराष्ट्र के लोकसभा चुनावों में कितना असर डालेगी इसका सही पता 23 मई को चुनाव नतीजे आने के बाद ही चलेगा।