देश में हो रहे लोकसभा चुनाव के पांच चरण सम्पन्न हो चुके हैं। चुनाव को लेकर देश में उत्सव जैसा माहौल है। रोज दर्जनों रैलियां हो रही हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव का खर्च 2014 के लोकसभा चुनाव से 40 फीसदी बढ़ गया है। पिछले चुनाव में 3 हजार 870 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इस बार के चुनाव का खर्च करीब 5 हजार 418 करोड़ रुपए हैं। इस लोकसभा चुनाव के छठे चरण तक 60 सबसे रईस प्रत्याशीयों की कुल संपत्ति 10 हजार 75 करोड़ रुपए है। जो इस बार के चुनाव के खर्चे से दोगुना है। अगर ये 60 उम्मीदावर चाहे तो लोकसभा का चुनाव दोबारा करवा दें।
| पहला चरण | 3,180 करोड़ रु. |
| दूसरा चरण | 2,218 करोड़ रु. |
| तीसरा चरण | 1,231 करोड़ रु. |
| चौथा चरण | 1,601 करोड़ रु. |
| पांचवां चरण | 7,85 करोड़ रु. |
| छठा चरण | 1,060 करोड़ रु.
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1952 के पहले चुनाव में सब कुछ शुरुआत से होना था। बैलेट पेपर से लेकर चुनावी तैयारियों के लिए 10.45 करोड़ का बजट रखा गया था। लेकिन 1957 में हुए दूसरे आम चुनाव का बजट घटकर तकरीबन आधा हो गया। साल 1971 में आम चुनाव का खर्च 11.61 करोड़ था। जो आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में बढ़कर 23.03 करोड़ पर पहुंच गया।
सरकारें उठाती हैं चुनावी खर्च
लोकसभा पर होने वाले खर्चों को केंद्र सरकार वहन करती है। जबकि विधान सभा के चुनाव में होने वाले खर्चों का बोझ राज्य सरकार उठाती हैं। अगर लोकसभा के साथ ही राज्यों के विधान सभा चुनाव होते हैं, तो केंद्र और राज्य दोनों बराबर रूप से चुनाव पर हुए खर्चों का वहन करते हैं। चुनावी खर्चों में उंगुली पर लगने वाली स्याही से लेकर वोटिंग मशीन और हर बूथ पर तैनात कर्मचारियों का दैनिक भत्ता तक शामिल है।