भारत के 49वें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने रविवार को कहा कि मुकदमा खून बहने वाले घाव की तरह है। जितना अधिक इससे खून बहने दिया जाएगा, उतना ही अधिक पीड़ित व्यक्ति को भुगतना पड़ेगा।
राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति ललित यहां विज्ञान भवन में आयोजि एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने 365 जिला कानूनी सेवा प्राधिकरणों में हाल ही में शुरू की गई कानूनी सहायता रक्षा परामर्शदाता (एलएडीसी) प्रणाली को औपचारिक रूप से लॉन्च किया।
नालसा के तहत गठित एलडीसीस उन गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करता है जो अपने आपराधिक मामलों से लड़ने के लिए निजी वकील की नियुक्ति करने के लिए मजबूर होते हैं और इस प्रक्रिया में अपनी संपत्ति खो देते हैं।
आगामी 27 अगस्त को सीजेआई के रूप में कार्यभार संभालने वाले न्यायमूर्ति ललित ने इस बात पर प्रकाश डाला कि सत्तर प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे है और केवल 12 प्रतिशत ही कानूनी सेवा अधिकारियों द्वारा प्रदान की जाने वाली मुफ्त कानूनी सहायता का विकल्प चुनते हैं।
उन्होंने, 12 प्रतिशत से 70 प्रतिशत के बीच की आबादी क्या करती है? इसका मतलब है कि 12 प्रतिशत और 70 प्रतिशत के बीच वाले हमारे साथ नहीं है। उन्होंने अपनी संपत्ति बेच दी होगी, उन्होंने अपने आभूषण बेचे होंगे, उन्होंने जमीन गिरवी रखी होगी। यही मुकदमेबाजी लाती है। मुकदमा खून बहने वाले घाव की तरह है। जितना अधिक आप इसे बहने देंगे, उतना ही आदमी पीड़ित होगा।
उन्होंने कहा कि कानूनी सहायता से ऐसे लोगों को विश्वास दिलाने की जरूरत है कि व्यवस्था उन्हें इस दरवाजे से न्याय के मंदिर तक ले जा सकती है और इसका सबसे पेशेवर तरीके से ध्यान रखा जाएगा।
एलएडीसी प्रणाली के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि सरकारी वकील राज्य की ओर से आपराधिक मामलों को आगे बढ़ा रहे हैं और इसी तरह गरीब वादियों के लिए इस प्रणाली के माध्यम से ऐसे मामले लड़े जाएंगे जिनका वित्त पोषण भी नालसा के माध्यम से सरकार से आएगा।
उन्होंने उस स्थिति को बताया जहां गरीबों को निजी वकीलों को किराए पर लेने के लिए मजबूर किया जाता है और कहा कि आपराधिक मामलों में ऐसा होता है कि आरोपी व्यक्ति को मुकदमे में घसीटा जाता है।
उन्होंने कहा कि एलडएडीसी प्रणाली की सफलता उन लोगों के प्रति विश्वास का हाथ बढ़ाने में निहित है जिनके संसाधन मुकदमेबाजी में बर्बाद हो जाते हैं और वे इस जाल में फंस जाते हैं।
उन्होंने एलएडीसी प्रणाली को 'सार्वजनिक रक्षक प्रणाली के अनुरूप आपराधिक मामलों में मुफ्त कानूनी सहायता, सहायता और कानूनी प्रतिनिधित्व को बदलने की पहल' करार दिया। न्यायमूर्ति ललित ने कानूनी सहायता आंदोलन से जुड़े लोगों को पिछले पंद्रह महीनों में उनकी उपलब्धियों के लिए धन्यवाद दिया।
उन्होंने कानूनी सहायता वितरण तंत्र में सुधार के लिए एलएडीसी के अर्थ और आवश्यकता पर जोर दिया और नालसा की उपलब्धियों को गिनाया।