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सेना की तर्ज पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए आयोजित हो 'झंडा दिवस', शहीदों के परिजनों को मिलेगी मदद!

Tue, 24 Nov 2020 04:13 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

झंडा दिवस पर शहीद जवानों के परिवारों की मदद के लिए धनराशि जमा की जाती है। लोगों को गहरे लाल और नीले रंग के झंडे का स्टिकर दिया जाता है। इससे जो भी राशि जमा होती है, उसे झंडा दिवस कोष में जमा कर दिया जाता है...
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crpf - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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इस बार केंद्रीय कर्मियों से आग्रह किया गया है कि वे झंडा दिवस पर कम से कम दो सौ रुपये का योगदान करें। कन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह का कहना है कि सेना पर हमें भी गर्व है। सरकार को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के उन 34 हजार जवानों के परिवारों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दी है। आर्मी की तर्ज पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए भी 'झंडा दिवस' कार्यक्रम आयोजित हो।

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सरदार पटेल ने 1950 में 19 मार्च के दिन सीआरपीएफ को झंडा प्रदान किया था। इस दिन को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 'झंडा दिवस' के तौर पर मना सकते हैं। इससे इन बलों के शहीद परिवारों की मदद की जा सकेगी।


भारतीय सेना के शहीद परिवारों की मदद करने के लिए हर वर्ष सात दिसंबर को 'सशस्त्र बल झंडा दिवस' का आयोजन होता है। इस दिन सरकारी और गैर सरकारी विभागों के कर्मचारी अपनी इच्छानुसार दान करते हैं। भारतीय सेनाएं, जो देश की सरहदों की रक्षा करती हैं, झंडा दिवस पर उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए मदद का हाथ बढ़ाया जाता है। इस रोज उन शहीदों को भी याद करते हैं, जिन्होंने तिरंगे के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए हैं।
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झंडा दिवस पर शहीद जवानों के परिवारों की मदद के लिए धनराशि जमा की जाती है। लोगों को गहरे लाल और नीले रंग के झंडे का स्टिकर दिया जाता है। इससे जो भी राशि जमा होती है, उसे झंडा दिवस कोष में जमा कर दिया जाता है। यह राशि युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों के कल्याण और घायल सैनिकों के इलाज में खर्च होती है।

एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह के अनुसार, आए दिन अर्धसैनिक बलों के जवान शहीद हो रहे हैं। यह अलग बात है कि सरकार तो उन्हें शहीद का दर्जा भी नहीं दे रही। उन्होंने सवाल के लहजे में कहा, क्या इन जवानों की शहादत किसी से कम है। केंद्रीय सुरक्षा बल, जिन्हें पैरामिलिट्री के नाम से पुकारते हैं, वे देश की लम्बी सरहदों के वास्तविक चौकीदार हैं। इतना होने पर भी अर्धसैनिक बलों के लिए कोई झंडा दिवस आयोजित नहीं किया जाता।

देश के लिए 34 हजार से अधिक जवान शहीद हो चुके हैं। ये बल सड़क से लेकर संसद तक की पहरेदारी करते हैं। बाढ़, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटना, देश में शांतिपूर्वक एवं निष्पक्ष चुनाव कराना, कश्मीर के आतंकवाद और दूसरे राज्यों में फैले नक्सलवाद का मुक़ाबला, महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों की सुरक्षा व लोगों को वीवीआईपी सुरक्षा मुहैया कराना, जैसे दायित्वों का सफल निर्वहन किया है।

बतौर महासचिव, दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि सैनिक कल्याण बोर्ड की तर्ज पर अर्धसैनिक कल्याण बोर्ड के गठन को लेकर कई बार केंद्र सरकार का दरवाजा खटखटाया है। तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह व गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू को ज्ञापन सौंपा गया। इस बार के गृहमंत्री अमित शाह व राज्यमंत्री नित्यानंद राय से मुलाकात कर उन्हें पूर्व अर्धसैनिकों की मांगों को लेकर ज्ञापन दिया। केंद्र सरकार जवानों की शहादत के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपना रही है।

मौजूदा और पूर्व अर्धसैनिक बलों के परिवारों के करीब 40 लाख सदस्य सरकार की इस दोहरी नीति का विरोध करते हैं। इन सुरक्षा बलों के शहीद परिवारों की मदद करने के लिए अर्धसैनिक झंडा दिवस कार्यक्रम 19 मार्च को आयोजित किया जाए। यही वो ऐतिहासिक तारीख है जब देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने सीआरपीएफ को झंडा प्रदान किया था।

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