मायावती ने उसकी फरियाद सुनी और उसे सीधे इंटर कालेज में दाखिला दिला दिया। सावित्री कहती हैं कि उस दिन उन्हें 'पावर' की ताकत का अहसास हुआ और यह राजनीति से उनका पहला परिचय था। इसके बाद एक और घटना ने उन्हें सक्रिय राजनीति के और करीब पहुंचा दिया। 16 दिसंबर 1995 को लखनऊ में एक आंदोलन के दौरान उन्हें गोली लगी और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा कहीं जड़ पकड़ने लगा।
सावित्री के माता पिता ने छह साल की उम्र में ही उनकी शादी कर दी थी। बिदाई हालांकि नहीं हुई थी, पर बंधन तो बंधा था, जो उन्हें सदा कचोटता था। सावित्री कहती हैं कि वह यह तो जान चुकी थीं कि बंधन में रहकर समाज के लिए कुछ नहीं कर पाएंगी, लिहाजा उन्होंने बड़ा फैसला किया और जिस व्यक्ति के साथ उनका विवाह हुआ था, उनके साथ अपनी छोटी बहन का विवाह करवा दिया और उसी समय अपना सारा जीवन समाज को समर्पित करने का संकल्प लेने के साथ ही भगवा धारण कर लिया।
राजनीति में आने के बाद का सावित्री का जीवन खुली किताब की तरह है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें लंबा रास्ता तय करना पड़ा। इस सफर में उनके राजनीतिक गुरू अक्षरवर नाथ कनौजिया ने उनका साथ दिया। कनौजिया बताते हैं कि उन दिनों मायावती की बहुजन समाज पार्टी के प्रचार के लिए सभाएं हुआ करती थीं और वह सावित्री को उन सभाओं में ले जाते थे कागज पर लिखकर कुछ शब्द देकर मंच पर पढ़ने भेजते थे।
धीरे धीरे सावित्री ने सियासी तकरीरों का हुनर सीख लिया और फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की एक सभा में प्रभावी भाषण देकर बसपा में पहुंचने का रास्ता तलाश लिया। हालांकि बसपा के साथ उनका रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चला और वर्ष 2000 में वह भाजपा में शामिल हो गईं। 2014 में लोकसभा का चुनाव जीतकर देश की सबसे प्रतिष्ठित इमारत में बैठने का हक हासिल करने वाली साध्वी सावित्रीबाई फुले ने हाल ही में भाजपा का दामन छोड़ दिया है और ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि वह फिर से बसपा की हमसफर हो सकती हैं।