उपराज्यपाल नजीब जंग का अचानक इस्तीफा आम आदमी पार्टी सरकार और जनता के लिए कई सवाल छोड़ गया। महज 3 साल, पांच महीने, 13 दिन में इस्तीफा देने वाले जंग का करीब डेढ़ साल अरविंद केजरीवाल सरकार से विवाद में गुजर गया।
इस विवाद और आप सरकार के साथ खींचतान में दिल्ली के काम पिछड़े। अभी न्यूनतम मजदूरी वृद्धि, स्लम पॉलिसी, बस लेन में जुर्माना, मोहल्ला क्लीनिक निर्माण समेत कई फाइलों पर सुझाव के बाद सुधार करके मंजूरी के लिए भेजना था। अब उन योजनाओं में देरी और बढ़ेगी।
जंग ने विवादों के बीच एक बार विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि वीके शुंगलू की अगुवाई वाली कमेटी ने जो फाइलें परखी हैं, उसमें कई तरह की अनियमितताएं और नियम-कानून का उल्लंघन मिला है।
कुछ मामले सीबीआई को भेजे जाने की प्रक्रिया में हैं। ऐसे में शुंगलू कमेटी ने 27 नवंबर को रिपोर्ट भी उपराज्यपाल को सौंप दी। रिपोर्ट पर अभी तक कोई कार्रवाई सामने नहीं आई। अब उपराज्यपाल के इस्तीफे से सीधे तौर पर शुंगलू कमेटी की सिफारिशों पर कार्रवाई में देरी होगी। साथ ही जो करीब 200 फाइलें राजनिवास में पड़ी हैं, उनका भविष्य क्या होगा? यह भी सवाल है।
दिल्ली सरकार ने दो दिन पूर्व ही डीटीसी बसों का किराया एक महीने के लिए घटाने का एलान किया। इसकी मंजूरी भी उपराज्यपाल से लेनी है। ऐसे में अगर उपराज्यपाल की नियुक्ति में केंद्र सरकार देरी करती है, तो 1 जनवरी से डीटीसी व क्लस्टर बसों में सस्ते सफर के मामले में देरी हो सकती है। महीने के आखिरी शुक्रवार यानी 30 दिसंबर को प्रदूषण को लेकर बैठक भी होनी थी।
राजनिवास (उपराज्यपाल) और प्लेयर्स बिल्डिंग (चुनी सरकार) के बीच जिन मामलों को लेकर विवाद चल रहा है, उसे समझने में भी नए उपराज्यपाल को समय लगेगा। वहीं, मुख्यमंत्री केजरीवाल समेत ज्यादातर मंत्री पंजाब, गुजरात, गोवा के चुनाव को लेकर अगले कुछ महीने व्यस्त रहने वाले हैं। ऐसे में पहले उपराज्यपाल का इस्तीफा और फिर दिल्ली में नगर निगम चुनाव की अधिसूचना के बीच चालू वित्तवर्ष की अंतिम तिमाही में दिल्ली और पिछड़ती दिख रही है।