लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) मोहिंदर पुरी ने बताया कि सरकार की तरफ से स्पष्ट निर्देश था कि किसी भी सूरत में लाइन ऑफ कंट्रोल को पार नहीं किया जाए। हमारे पास कुछ ही विकल्प थे, पहला केवल लक्ष्य को निशाना बना कर वापस आने का विकल्प, या फिर दूसरा यह कि एलओसी को पार करके ऑपरेशन के जरिए दुश्मन को पीछे धकेला जाए।
पाकिस्तान के पास थे अत्याधुनिक हथियार
उन्होंने बताया कि सेना आधुनिक हथियारों की वजह से जूझ रही थी, जबकि दुश्मन के पास वह सभी साजो-सामान था, जिसका वह फायदा उठा रहे थे। पाकिस्तानी तोपों के मुकाबले भारत की 105 एमएम आईएफजी और 120 एमएम मोर्टार की मारक क्षमता बेहद सीमित थी। साथ ही इनकी रफ्तार भी कम थी और ये सटीक निशाना लगाने में भी कमजोर थे।
बोफोर्स ने मचाई तबाही
पुरी बताते हैं कि यहां तक कि सेना के पास दुश्मनों को उलझाने के लिए गाइडेड वेपन्स तक नहीं थे। फिर हमने रणनीति में बदलाव करते हुए द्रास सेक्टर में दुश्मनों के हौसले पस्त करने के लिए फील्ड गन का सहारा लिया, लेकिन सीमित रेंज के चलते कामयाबी नहीं मिली। सेना के पास ऐसे कोई खास हाईटेक हथियार भी नहीं थे जिससे वो दुश्मनों को चौंका सके। लेकिन बोफोर्स की तैनाती इस जंग में मददगार साबित हुई। हम पहली बार दुश्मनों को झटका देने में कामयाब हुए। बोफोर्स तोपों के सीधे जद में आने से दुश्मनों की तबाही का दौर शुरू हुआ। मोहिंदर पुरी कहते हैं कि हमारे पास जो उपलब्ध संसाधन थे, हमें उसी से काम चलाना था। लेकिन धैर्य, सूझबूझ और अदम्य साहस के बलबूते ही हम जीत पक्की कर पाए।
उन्होंने बताया कि एक तो खराब मौसम और हाई अल्टीट्यूड के चलते जंग में बने रहना हमारे लिए मुश्किल था। दुश्मन 18000 से 21000 फीट की ऊंचाई पर बैठा था, और नेशनल हाईवे भी उनकी पहुंच में था। दुश्मन ने बड़ी ही कुशलता से द्रास और काकसर हाईवे पर गाड़ियों की आवाजाही को रोक दिया था। साथ ही दुश्मन ने द्रास के ट्रांजिट कैम्प को भी काफी नुकसान पहुंचाया था। उन्होंने बताया कि यहां तक कि द्रास में हेडक्वार्टर 56 और 192 माउंटेन ब्रिगेड भी हमलों की जद में था।
ले. जन. (रि.) मोहिंदर पुरी के मुताबिक करगिल जंग में जहां एक और दुश्मन ऊंचाई पर बैठा हुआ था, तो वहीं बारिश के बाद यहां जल्द ही ठंड शुरू होने वाली थी। जंग को जल्द से जल्द खत्म करने का दबाव था, क्योंकि भारी बर्फबारी बर्फबारी के दौरान बॉर्डर की सही दिशा का पता लगाना भी मुश्किल हो जाता।
तोलोलिंग पर जीत सबसे यादगार क्षण
अपने सबसे यादगार क्षण को साझा करते हुए पुरी ने बताया कि तोलोलिंग की जीत उनके लिए अभी तक का सबसे यादगार पल है। तोलोलिंग चोटी श्रीनगर-लेह राजमार्ग के ठीक ऊपर है और अगर दुश्मन वहां कब्जा कर लेता तो लद्दाख और श्रीनगर का संपर्क टूट जाता। तोलोलिंग पर कब्जे के कई प्रयास किए गए, लेकिन सफलता हासिल नहीं हो पाई। वह बताते हैं कि कई बार नाकाम रहने के बाद एक दिन उन्होंने अपने जवानों से फिर से हमला करने के लिए कहा।
13 जून की सुबह 4 बज कर 10 मिनट पर 2 राजपूताना राइफल्स के कंमाडिंग ऑफिसर कर्नल एमबी रविन्द्रनाथ का रेडियो पर मैसेज आया कि वे तोलोलिंग के टॉप पर हैं, तो उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा। उन्होंने बताया तोलोलिंग पर कब्जे से पहले पूरी रात चली जंग में उन्होंने एक अफसर, दो जेसीओ और 7 जवान खो दिए।