सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिल्मों और किताबों के प्रति लोगों की सहनशीलता कम होती जा रही है। अब हर कोई हर चीज पर संवेदनशील है। शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ शुक्रवार को फिल्म आदिपुरुष के निर्माताओं के खिलाफ विभिन्न हाईकोर्ट के आदेशों और कार्यवाही पर रोक लगा दी।
अदालत ने उस जनहित याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को इस फिल्म का सर्टिफिकेट रद्द करने की मांग की गई थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अदालतों को सेंसर बोर्ड की ओर से दिए गए प्रमाणपत्रों पर अपील करने का मंच नहीं बनना चाहिए। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने रचनात्मक कार्यों के प्रति गिरती सहनशीलता पर अफसोस जताया। जस्टिस कौल ने कहा, हमें संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए? क्या हमें हर चीज का परीक्षण करना चाहिए? फिल्मों और किताबों को लेकर सहनशीलता इन दिनों कम होती जा रही है। वकील ममता रानी की इस जनहित याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने सिनेमाई स्वतंत्रता पर जोर दिया।
अनुच्छेद 32 के तहत दखल संभव नहीं
पीठ ने कहा, इस अदालत के लिए संभव नहीं है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की संवेदनाओं के लिए अनुच्छेद 32 के तहत दखल दे। ये मामले इस अदालत के सुनने योग्य नहीं है। यदि कोई अपीलीय अथॉरिटी के निर्णय से व्यथित है, तो वह कानून के तहत उपाय अपना सकता है। अन्य याचिकाएं फिल्म बनाने वाली कंपनी टी सीरीज के विभिन्न हाईकोर्ट के आदेशों और वहां चल रही कार्यवाही को चुनौती देते हुए दायर की गई थीं। मुख्य याचिका में फिल्म के निर्माताओं को तलब करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।
हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचने का आरोप
पीठ कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, उनमें से एक जनहित याचिका में फिल्म के प्रमाणन को रद्द करने की मांग की गई थी। जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि इससे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंची है और पवित्र ग्रंथों को विकृत किया गया है, लेकिन पीठ इन तर्कों से सहमत नहीं हुई।