प्रवासी मतदाताओं की गैर-मौजूदगी ने बदला केरल चुनाव का गणित
इसके साथ ही खाड़ी देशों में काम कर रहे प्रवासी मतदाताओं की बड़ी संख्या में गैर-मौजूदगी और राज्य में गैस आपूर्ति संकट ने चुनावी समीकरण को प्रभावित किया।
आंकड़ों के मुताबिक, केरल में करीब 2.42 लाख पंजीकृत प्रवासी मतदाता हैं, जो आमतौर पर चुनाव के दौरान वोट डालने के लिए राज्य लौटते हैं। लेकिन इस बार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, उड़ानों की सीमित उपलब्धता और टिकटों की कीमतों में भारी उछाल के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी वोटर केरल नहीं पहुंच सके। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई रूट्स पर हवाई किराया तीन से चार गुना तक बढ़ गया, जिससे मजदूर और मध्यम वर्ग के प्रवासियों के लिए लौटना मुश्किल हो गया।
विश्लेषण बताता है कि प्रवासी मतदाताओं का प्रभाव खासकर उत्तर और मध्य केरल के जिलों कोझिकोड, मलप्पुरम और कन्नूर की सीटों पर ज्यादा रहता है। इन इलाकों में हजारों वोटों का अंतर चुनावी नतीजों को पलट सकता है। उदाहरण के तौर पर, कुछ सीटों पर जीत-हार का अंतर 5,000 से 10,000 वोट के बीच रहता है, जबकि प्रवासी मतदाताओं की संख्या कई जगह इससे कहीं ज्यादा होती है। ऐसे में उनकी गैर-मौजूदगी ने सीधे तौर पर करीबी मुकाबलों का परिणाम बदलने की क्षमता रखी।
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो प्रवासी वोटर्स का झुकाव परंपरागत रूप से यूडीएफ की ओर माना जाता है। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति ने कई सीटों पर समीकरण को प्रभावित किया, जिससे मुकाबला और भी अनिश्चित हो गया।
गैस संकट ने मतदाताओं के मूड को किया प्रभावित
इसके साथ ही, राज्य में गैस की किल्लत भी एक अहम चुनावी मुद्दा बनकर सामने आई। पश्चिम एशिया संकट के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे केरल में घरेलू एलपीजी और व्यावसायिक गैस दोनों की उपलब्धता पर असर पड़ा। होटल, रेस्तरां और पर्यटन उद्योग, जो राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा हैं। उन्हें इससे भारी नुकसान झेलना पड़ा।
व्यापारिक संगठनों के अनुसार, कई क्षेत्रों में गैस सिलेंडर की सप्लाई बाधित रही और कीमतों में बढ़ोतरी ने छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ा दी। इसका असर सीधे तौर पर आम जनता तक पहुंचा, जिससे महंगाई और रोजमर्रा की परेशानियों को लेकर असंतोष बढ़ा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन दोनों फैक्टर्स प्रवासी मतदाताओं की अनुपस्थिति और गैस संकट ने मिलकर मतदाताओं के मूड को प्रभावित किया।