मजे की बात ये है कि वामदल भारत में एक के बाद एक चुनाव हारते जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में 38 साल शासन करने के बाद 2011 में उन्हें ममता बनर्जी के हाथों करारी हार मिली। फिर 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के बावजूद उन्हें 294 सदस्यीय विधानसभा में महज 26 सीटें मिलीं।
इसी तरह त्रिपुरा में भाजपा ने 25 साल पुराने वामपंथ का गढ़ फतह कर लिया। अब केवल केरल में उनकी सरकार है। भाजपा ने भले ही केरल में केवल एक और बंगाल में तीन सीटें जीती हों लेकिन दोनों राज्यों में 10 फीसदी से ज्यादा वोट पाकर उसने एक मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
दुश्मन बने दोस्त
वामदलों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए
कांग्रेस को साथ लेना पड़ रहा है जबकि त्रिपुरा, केरल और बंगाल में वे कांग्रेस के खिलाफ ही दशकों से लड़ रहे थे। इस मुद्दे पर भी माकपा के शीर्ष नेताओं में दरार है। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी कांग्रेस के साथ तालमेल चाहते हैं, वहीं उनके पूर्ववर्ती प्रकाश करात इसके सख्त खिलाफ हैं। पिछले दिनों दिल्ली में हुई केंद्रीय समिति की बैठक में करात गुट हावी रहा जबकि हाल ही में हुई पार्टी कांग्रेस में न सिर्फ सीताराम दोबारा महासचिव चुने गए बल्कि माकपा अपना रुख नरम करते हुए सीटों के तालमेल के लिए भी राजी हो गई।