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कोरोना से जंग: दुनियाभर में हुए शोध यही बताते हैं कि किसी काम की नहीं थी प्लाज्मा थेरेपी

Tue, 18 May 2021 02:05 PM IST
Harendra Chaudhary आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अधिकारियों के मुताबिक पिछले सप्ताह हुई कोविड-19 की नेशनल टास्क फोर्स की बैठक में भी प्लाज्मा थेरेपी के मुद्दे पर चर्चा हुई थी, जिसमें प्लाज्मा थेरेपी की उपयोगिता पर सवाल उठाए गए थे...
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
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विस्तार
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कोविड के शुरुआती दिनों से ही शुरू हुई प्लाज्मा थेरेपी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। न सिर्फ देश में बल्कि दुनियाभर में प्लाज्मा थेरेपी पर चल रही कई रिसर्च में साबित हुआ था कि इस थेरेपी से मरीजों के सुधार में कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। पिछले शुक्रवार को दुनिया के प्रमुख मेडिकल जर्नल द लैंसेट ने शोध के माध्यम से रिपोर्ट किया था कि अब यह तय हो गया है प्लाज्मा थेरेपी कोविड के इलाज में कारगर नहीं है। उसके बाद ही आईएसीएमआर, एम्स और कोविड-19 की नेशनल टास्क फोर्स ने देश में चल रहे प्लाज्मा थेरेपी को कोविड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल से हटा दिया।

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कई डॉक्टरों ने बंद करने को लेकर लिखी थी चिट्ठी

लगातार दुनियाभर में हो रही रिसर्च यही बताती थी कि प्लाज्मा थेरेपी कोविड में कारगर नहीं है। यही वजह रही कि देश के अलग-अलग हिस्सों के चिकित्सकों ने स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर के अधिकारियों को पत्र लिखकर इसे इलाज के प्रोटोकॉल से हटाने को कहा था। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक देश के कई वायरोलॉजिस्ट के संगठन लगातार इसी निगरानी कर रहे थे। अधिकारियों के मुताबिक पिछले सप्ताह हुई कोविड-19 की नेशनल टास्क फोर्स की बैठक में भी प्लाज्मा थेरेपी के मुद्दे पर चर्चा हुई थी, जिसमें प्लाज्मा थेरेपी की उपयोगिता पर सवाल उठाए गए थे।

यह बन गया था डर

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक उनकी खुद की रिसर्च कहती थी कि जिनकी इम्युनिटी कमजोर है, उन्हें प्लाज्मा देने से न्यूट्रिलाइजिंग एंटीबाडी कम बनती हैं। ऐसे में इस बात का हमेशा डर बना रहता था कि कहीं यह प्रक्रिया कोविड के नए वैरियंट को सामने न ले आए। शोध बताते हैं कि प्लाज्मा थेरेपी से कोविड के नए स्ट्रेन तक डेवलप होने लगे थे।
 
हाल में ही इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेडिकल वायरोलॉजी में प्लाज्मा थेरेपी पर अर्जेंटीना के मरीजों पर किए गए शोध का एक हवाला दिया गया था। शोध में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि जिन 11000 मरीजों को प्लाज्मा देकर रिसर्च की गई उससे यही पता चला कि यह थेरेपी किसी काम की नहीं है। क्योंकि इससे न तो मरीज की मृत्यु दर में कोई कमी आती है और न ही इससे रिकवरी तेज होती है।
 
आईसीएमआर ने देश के अलग-अलग राज्यों में दी जा रही प्लाज्मा थेरेपी का डाटा इकट्ठा किया था। इस दौरान पता चला कि जिन मरीजों को प्लाज्मा थेरेपी दी गई और जिन्हें प्लाज्मा थेरेपी नहीं दी गयी, दोनों ग्रुप के मरीजों की रिकवरी में कोई अंतर नहीं दिखा।
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लैंसेट ने अपने पिछले साल मई से लेकर इस साल फरवरी तक अलग-अलग ग्रुप्स में शोध किया तो पाया कि प्लाज्मा थेरेपी से मरीजों की न तो मृत्यु दर में कमी हो रही है और न ही मरीजों के ठीक होने की समयसीमा में कोई अंतर आ रहा है। लैंसेट के अलावा चीन और नीदरलैंड के मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित शोध भी प्लाज्मा थेरेपी को कोविड में कारगर नहीं मानते हैं।
 
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की कोविड नेशनल टास्क फोर्स की टीम के एक प्रमुख सदस्य ने बताया कि इस बीमारी में शुरुआती दौर में सब कुछ ट्रायल के तौर पर ही होता है। चूंकि बीमारी के इलाज का कोई पहले से तय प्रोटोकाल तो है नहीं। ऐसे में हमारी टीम सबसे पहले यह देखती है कि दिया जाने वाला इलाज नुकसानदेह न हो और तय किये गए प्रोटोकॉल की वजह से बीमार व्यक्ति को नुकसान न हो। उसके बाद आगे की प्रक्रियाएं होती हैं। माइक्रोबायोलॉजिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व प्रेजिडेंट डॉक्टर ए चक्रवर्ती कहते हैं कि जब महामारी होती है और बीमारी पहली बार और भयावह रूप में सामने हो तो मेडिकल ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल को कई बार बदलना पड़ता है। क्योंकि चिकित्सकों के सामने भी बीमारी के बदलते स्वरूप और उसके निदान को लेकर लगातार चुनौतियां बनी रहती हैं।
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