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Lal Bahadur Shastri Jayanti 2022: अमेरिका- पाक को जिन्होंने दिखाया था आइना, जानें उनके बारे में सबकुछ

Sun, 02 Oct 2022 08:42 AM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कहने के लिए तो शास्त्री जी अहिंसा को मानते थे लेकिन अपनी मातृभूमि को सबसे ऊपर रखते थे। इसलिए उसकी रक्षा के लिए दुश्मनों को मारना भी मंजूर था। आइए जानते हैं उनके बारे में सबकुछ...
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लाल बहादुर शास्त्री जयंती विशेष
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विस्तार
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दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अलावा देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के रूप में भी जाना जाता है। शास्त्री का जन्म दो अक्तूबर, 1904 को हुआ था। उनकी सादगी और साहस से हर कोई परिचित है। उनके ही नेतृत्व में भारत ने वर्ष 1965 की जंग में पाकिस्तान को शिकस्त दी थी। वे देश के ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिनकी एक आवाज पर देशवासियों ने एक वक्त का खाना तक छोड़ दिया था। बता दें, लाल बहादुर शास्त्री 9 जून, 1964 को देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे। आइए जानते हैं उनके बारे में सबकुछ...

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बेहद सामान्य परिवार, सादगी की दुनिया कायल 

लाल बहादुर शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री बेहद सामान्य परिवार से आते थे। एक सामान्य परिवार से प्रधानमंत्री तक का सफर तय करने के बावजूद उनकी जीवनशैली बहुत ही सामान्य थी। शास्त्री जी अपना निजी खर्च स्वयं वहन करते थे। यहां तक कि कहा जाता है कि निजी यात्रा के लिए भी वे सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करते थे। उनकी सादगी ऐसी भी कि दुनिया भी उनकी कायल थी।

मजबूत इरादे-अदम्य साहस 

लाल बहादुर शास्त्री - फोटो : अमर उजाला

1962 में चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ था, जिसमें भारत को हार का सामना करना पड़ा था। उस वक्त पाकिस्तान ने इस हार को अपनी आने वाली जीत का संदेश समझा। पाकिस्तान की अय्यूब खान सरकार ने इस मौके का फायदा उठाने की ठान ली। 1965 की भरी गर्मी थी, जब उन्होंने ऑपरेशन जिब्राल्टर छेड़कर और भारतीय सेना की कम्युनिकेशन लाइन को ध्वस्त करने की मंशा से कश्मीर में हजारों सैनिकों को भेजा। उस वक्त भारतीय सेना ने भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिए गए आदेश को अंजाम दिया। उन्होंने पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार किया और पाकिस्तान में घुसकर दो तरफा हमला किया। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान की दूसरी सबसे बड़ी भूल थी ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान के टैंक और क्रैक इन्फैंट्री रेजिमेंट को कुछ आदेश दिए गए थे। वे आदेश थे- छाम्ब-जौरियान पार करना। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब भारतीय थल सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को न केवल पार किया बल्कि मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व में लाहौर पर हमला भी किया। सियालकोट और लाहौर पर हमला करने की रणनीति शास्त्री जी की ही थी। कहने के लिए तो शास्त्री जी अहिंसा को मानते थे लेकिन अपनी मातृभूमि को सबसे ऊपर रखते थे। इसलिए उसकी रक्षा के लिए दुश्मनों को मारना भी मंजूर था।

1965 में अमेरिका ने दी थी गेहूं भेजना बंद करने की धमकी

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बीएचयू में छात्रों के साथ - फोटो : अमर उजाला

जब साल 1965 में भारत पाकिस्तान के बीच जंग जारी थी, तभी अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्री को धमकी दी थी कि अगर उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ जंग नहीं रोकी, तो अमेरिका जो गेहूं भेजता है, वो बंद कर देगा। उस वक्त भारत गेहूं के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को ये बात चुभ गई। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि हम लोग एक वक्त का भोजन नहीं करेंगे। उससे अमेरिका से आने वाले गेहूं की जरूरत नहीं होगी। शास्त्री की अपील पर उस वक्त लाखों भारतीयों ने एक वक्त खाना खाना छोड़ दिया था। देशवासियों से अपील करने पहले शास्त्री ने खुद अपने घर में एक वक्त का खाना नहीं खाया और न ही उनके परिवार ने खाना खाया। वे देखना चाहते थे कि उनके बच्चे भूखे रह सकते हैं या नहीं। जब उन्होंने देख लिया कि वो और उनके बच्चे एक वक्त बिना खाना खाए रह सकते हैं, तब जाकर उन्होंने देशवासियों से अपील की। 

ताशकंद में शास्त्री जी की मौत या हत्या

लाल बहादुर शास्त्री जयंती विशेष
लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी एक रहस्य है। 10 जनवरी, 1966 को पाकिस्तान के साथ ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के महज 12 घंटे बाद 11 जनवरी को रात 1: 32 बजे उनकी मौत हो गई। बताया जाता है कि शास्त्री निधन से आधे घंटे पहले तक बिल्कुल ठीक थे, लेकिन 15 से 20 मिनट में उनकी तबीयत खराब हो गई। इसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें इंट्रा-मस्कुलर इंजेक्शन दिया। इंजेक्शन देने के चंद मिनट बाद ही उनकी मौत हो गई। आधिकारिक तौर पर कहा जाता है कि उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। शास्त्री को दिल से जुड़ी बीमारी पहले से ही थी और 1959 में उन्हें एक हार्ट अटैक भी आया था। इसके बाद उनके परिजन और दोस्त उन्हें कम काम करने की सलाह देते थे, लेकिन 9 जून, 1964 को देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद उन पर काम का दबाव बढ़ता ही चला गया, जबकि इसके इतर कुछ रिपोर्ट में दावा किया गया कि उनको साजिश तहत मारा गया था।
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सोवियत पीएम और पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने दिया कंधा

लाल बहादुर शास्त्री - फोटो : INC.IN
शास्त्री के शव को दिल्ली लाने के लिए जब ताशकंद एयरपोर्ट पर ले जाया जा रहा था, तो रास्ते में सोवियत संघ, भारत और पाकिस्तान के झंडे झुके हुए थे। शास्त्री के ताबूत को कंधा देने वालों में सोवियत प्रधानमंत्री कोसिगिन और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान भी थे।
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