लद्दाख सिविल सोसायटी फोरम ने लेह एपेक्स बॉडी और केडीए पर आरोप लगाया है कि वे अपनी शर्तें बदलकर क्षेत्र के मूल एजेंडे को कमजोर कर रहे हैं। फोरम ने आठ जिलों में पंचायत और एलएएचडीसी चुनाव कराने की मांग की है। आखिर लद्दाख की बातचीत में विवाद क्यों बढ़ रहा है? क्या स्थानीय चुनाव जमीन, नौकरियों और संस्कृति की सुरक्षा का रास्ता खोल सकते हैं? केंद्र सरकार अब क्या कदम उठाएगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
लद्दाख में जमीन, नौकरियों, संस्कृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चल रही बातचीत को लेकर विवाद गहरा गया है। लद्दाख सिविल सोसायटी फोरम ने लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) पर आरोप लगाया है कि उन्होंने क्षेत्र के मूल एजेंडे को हाईजैक कर लिया है और अपनी शर्तें बार-बार बदल रहे हैं। फोरम का कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत किसी ठोस नतीजे तक पहुंचने के बजाय टकराव की ओर बढ़ रही है। संगठन ने तत्काल पंचायत और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) के चुनाव कराने की मांग की है।
फोरम का कहना है कि चुनी हुई परिषदों को अधिक अधिकार देकर स्थानीय जरूरतों के अनुसार फैसले लेने की व्यवस्था की जा सकती है।
अलग-अलग जिलों के लिए अलग परिषदें क्यों जरूरी बताई गईं?
फोरम के अनुसार, लद्दाख के हर जिले की अपनी अलग जातीय, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान है। उदाहरण के तौर पर धा-हानु के ब्रोकपा, चांगथांग के चांगपा, जंस्कार के बौद्ध और द्रास के शीना समुदाय की जरूरतें अलग-अलग हैं। सदस्यों का कहना है कि केवल लेह या करगिल पर केंद्रित कोई संस्था इन सभी समुदायों के हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं कर सकती। फोरम ने दावा किया कि एलएएचडीसी पहले से स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं और इन्हें आठ जिलों तक विस्तारित करने के लिए एलएएचडीसी अधिनियम में संशोधन की जरूरत होगी। उसने यह भी कहा कि पिछले छह वर्षों से पंचायतें नहीं होने के कारण गांवों में विकास कार्य, मनरेगा और फंड से जुड़े काम प्रभावित हुए हैं। फोरम ने अनुच्छेद 371 जैसे प्रावधानों के तहत सुरक्षा और परिषदों को अधिक अधिकार देने की मांग भी रखी है।
लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बहाल करने के लिए क्या सुझाव दिए गए?
फोरम ने कहा कि चुनाव से वास्तविक जनप्रतिनिधि सामने आएंगे और भविष्य में केंद्र सरकार के साथ बातचीत के लिए अधिक भरोसेमंद प्रतिनिधि मिल सकेंगे। उसने लेह एपेक्स बॉडी के पुनर्गठन की मांग करते हुए कहा कि इसमें सभी संबंधित जिलों के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए। फोरम के मुताबिक, इसमें मठों, महिलाओं, आदिवासी समुदायों, युवाओं और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले खानाबदोश समुदायों को भी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संगठन ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री से अपील की कि संवैधानिक समझौता होने तक पंचायत और एलएएचडीसी चुनाव कराए जाएं तथा स्थानीय संस्थाओं को अधिक शक्तियां दी जाएं।
गृह मंत्रालय की बैठक पर सोनम वांगचुक और थुपस्तान छेवांग ने क्या कहा?
सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख के मुद्दों पर गुरुवार को गृह मंत्रालय में बैठक होनी थी, लेकिन यह नहीं हो सकी। उन्होंने केंद्र सरकार पर वादे से पीछे हटने का आरोप लगाया और कहा कि वह दिल्ली पहुंचकर लद्दाख भवन में क्षेत्र के लोगों की समस्याएं सामने रखेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र जल्द बैठक आयोजित करेगा। दूसरी ओर, लद्दाख के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता थुपस्तान छेवांग ने कहा था कि 9 सितंबर को गृह मंत्रालय में लेह एपेक्स बॉडी और केडीए के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक सकारात्मक रही थी। उन्होंने निराशा जताई कि बैठक में हुई सकारात्मक चर्चा और सहमति वाले मुद्दों को जनता के सामने ठीक से नहीं रखा गया। उनके अनुसार, इसके बजाय राष्ट्रीय और सोशल मीडिया में बातचीत में प्रगति नहीं होने की बातें सामने आईं। इस तरह लद्दाख में बातचीत की दिशा, प्रतिनिधित्व और स्थानीय चुनावों को लेकर अलग-अलग पक्षों के बीच मतभेद सामने आए हैं।