हालांकि राज्य सरकार पहले ही इस कांड की सीबीआई जांच का आदेश दे चुकी है। इसके बावजूद इस पूरे कांड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को राहुल गांधी लगातार मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। महिला कांग्रेस के अधिवेशन में भी उन्होंने अपने भाषण में इसे उठाया। मुजफ्फरपुर की ही तरह उत्तर प्रदेश में देवरिया के सुधार गृह में यौन शोषण के आरोप सामने आते ही राज्य की योगी सरकार भी विपक्ष के निशाने पर आ गई।
हालांकि आनन फानन में राज्य सरकार ने कार्रवाई की और प्रदेश के सभी सुझार गृहों की जांच शुरु करवा दी है। इन दोनों कांडों के बाद देश भर में महिला एवं बाल सुधार गृहों की व्यवस्था और कुव्यवस्था की विस्तृत जांच की जरूरत हो गई है। केंद्र सरकार को चाहिए की राज्य सरकारों की सहमति से एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करके देश भर के सभी सरकारी और गैर सरकारी (सरकारी सहायता और मान्यता प्राप्त) संस्थाओं द्वारा संचालित सुधार गृहों और आश्रमों की जांच कराई जानी चाहिए।
सियासत के कुरक्षेत्र में पिछले कई दिनों से केंद्र सरकार और भाजपा को दलितों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। देश के अनेक हिस्सों में दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले जिसमें अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार विरोधी कानून के तहत किसी के खिलाफ कार्रवाई से पहले कुछ जरूरी कदम उठाने का जो निर्देश दिया था उसे लेकर दलितों का गुस्सा बेहद बढ़ गया और इसकी परिणिति उस देशव्यापी गुस्से के रूप में देखने को मिली जो पिछले भारत बंद के दौरान जगह जगह हिंसक संघर्ष के रूप में सामने आई। अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के नेतृत्व में दलित संगठनों ने नौ अगस्त को फिर भारत बंद की घोषणा की थी।
महासभा के अध्यक्ष अशोक भारती ने इसे लेकर सभी राजनीतिक दलों के दलित नेताओं और केंद्र सरकार में शामिल दलित मंत्रियों को पत्र लिखकर भारत बंद को सफल बनाने की अपील की। भारती ने केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान से मुलाकात भी की। पासवान, रामदास अठावले और उदितराज जैसे दलित नेताओं ने अपनी सरकार के भीतर दबाव बनाया और आखिरकार सरकार ने संसद में संशोधन प्रस्ताव लाकर दलित कानून को मजबूत कर दिया। इस तरह सरकार ने दलित असंतोष को थामने की कोशिश की है, लेकिन दलितों के अभी कई अन्य मुद्दे भी हैं जिनका समाधान सरकार को करना होगा।
उत्तर भारत में जब महिलाओं और दलितों की सुरक्षा को लेकर सियासत गरम है तब धुर दक्षिण में तमिल राजनीति के शिखर पुरुष के.करुणानिधि ने इस संसार से विदा ले ली। द्रविड़ आंदोलन और द्रविड़ अस्मिता की लडाई के इस अप्रतिम योद्धा की लंबी जीवन यात्रा न सिर्फ बहुआयामी है बल्कि भारतीय राजनीति में उसका एक अलग स्थान है। लंबे समय के बाद तमिलनाडु का राजनीतिक आकाश नक्षत्र विहीन दिखाई दे रहा है।
अन्ना दुरई, एम जी रामचंद्रन और जयललिता के बाद अब करुणानिधि के बिना तमिल राजनीति में अब न सिर्फ द्रविड़ राजनीति पर वर्चस्व की होड़ तेज होगी बल्कि उसकी आंच केंद्रीय राजनीति पर भी आएगी। क्या जयललिता के बिना अन्ना द्रमुक को पनीरसेल्वम और पनालीस्वामी संभाल पाएंगे जबकि शशिकला के वफादार दिनाकरण अपनी खिचड़ी अलग पका रहे हैं। वहीं द्रमुख में भले ही स्टालिन का नेतृत्व स्थापित हो गया हो लेकिन करुणानिधि के दूसरे बेटे अलागिरी का रुख क्या होगा। क्या उनकी घर वापसी होगी या वह पूरी तरह अलग थलग हो जाएंगे।
इसी तरह फिल्मी सितारों के राजनीतिक नेतृत्व वाले इस दक्षिणी भारतीय प्रदेश में क्या रजनीकांत और कमला हसन कोई नया गुल खिला सकेंगे। 2019 के लोकसभा चुनावों में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा क्या अन्ना द्रमुक को ही साथ रखेगी या द्रमुक की ओर कदम बढ़ाएगी और कांग्रेस क्या द्रमुक को अपने साथ बनाए रखने में कामयाब रहेगी। इन सारे सवालों का जवाब आने वाले कुछ महीनों में देश को मिलेगा।
संसद का यह सत्र कई मायनों में यादगार रहेगा। सत्र की शुरुआत में ही सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव में भले ही सरकार जीत गई लेकिन सरकार पर जमकर हमला करने का मौका विपक्ष को भरपूर मिला। विपक्ष के आरोपों का अपनी धारदार शैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोरदार जवाब दिया लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी एक नए रूप में सामने आए। अपने आक्रामक भाषण के बाद अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राहुल का गले मिलना और फिर अपने सहयोगी सांसद को आंख मारकर इशारा करना हमेशा याद किया जाएगा। संसद के दोनों सदनों में कामकाज भी हुआ और अंतिम दिन से एक दिन पूर्व राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में एनडीए ने अपने उम्मीदवार जद (यू) के हरिवंश को जिताकर एक बड़ी सफलता भी पाई।
सदन में विपक्ष का पलड़ा भारी होने के बावूजद अगर सरकार अपने उम्मीदवार को जिता ले गई तो इसका श्रेय उसके बेहतर राजनीतिक प्रबंधन और कांग्रेस के असमंजस भरे सियासी अहमकाना रवैए को ही दिया जाना चाहिए। कांग्रेस अगर अपने दांव सही चलती और आगे बढ़कर विपक्षी दलों को साथ लेती तो वह सरकार को मात दे सकती थी, लेकिन भाजपा ने जिस तरह यह पद जद (यू) को देकर बीजद और शिवसेना जैसे उन दलों को भी अपने साथ कर लिया जो सरकार से दूरी बनाए रखना चाहते हैं।
यही नहीं भाजपा ने अकाली दल और टीआरएस को भी साध लिया। जबकि कांग्रेस के रवैये की वजह से आम आदमी पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस को विपक्षी उम्मीदवार से दूरी बनानी पड़ी। लेकिन इस पूरी कवायद का सुखद परिणाम यह रहा कि वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक रूप से बेहद जागरुक हरिवंश जैसा उपसभापति संसद के उच्च सदन को प्राप्त हुआ जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में हरि कृपा जैसा है। गौरतलब है कि इस चुनाव में दोनों उम्मीदवारों के नाम में हरि का नाम था हरिवंश और बी.के. हरिप्रसाद।