कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी न सिर्फ चुनावी हार से सकते में हैं बल्कि इस बात से भी आहत हैं कि पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें चुनावों को लेकर लगातार अंधेरे में रखा। जहां राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने बार-बार यही भरोसा दिया कि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सीटें भाजपा से ज्यादा आएंगी, दूसरे नेता भी सिर्फ दिल्ली में बैठकर बयानबाजी ही करते रहे और अपने अपने गृह राज्यों में कोई काम नहीं किया।
राहुल को न सिर्फ वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं से शिकायत है बल्कि युवा नेताओं की अपनी टीम ने भी उन्हें निराश किया है। कर्नाटक में जिस तरह उनके बार बार कहने के बावजूद राज्य के वरिष्ठ नेता जद(एस) नेताओं के साथ लड़ते रहे और आंकड़ों के लिहाज से कांग्रेस जद(एस) गठबंधन को 28 में से कम से कम 20 सीटें जीतनी चाहिए थीं, वह बुरी तरह पिट गया। यही हाल महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, आदि राज्यों में भी रहा।
अमेठी की हार ने भी राहुल को बेहद आहत किया है। इसलिए अपने इस बड़े कदम से वह एक बड़ी लकीर खींचकर उसे भी छोटा करना चाहते हैं। राहुल संसद में अपनी भूमिका बढ़ाएंगे। वह लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता बनकर सरकार और प्रधानमंत्री के सामने डटकर अपनी बात रखेंगे। लेकिन संगठन की कमान किसी और को सौंपकर वह कम से कम एक डेढ़ साल देश भर में घूम-घूम कर लोगों से सीधे मिलेंगे।
उनकी योजना है कि सभी प्रदेशों में जाकर कार्यकर्ताओं से सीधे बात करें। उनकी सुनें और फिर पद यात्राओं और सड़क यात्राओं के जरिए नुक्कड़ सभाओं के जरिए लोगों का मन टटोलें और समझे कि लोग आखिर कांग्रेस और उनसे क्या चाहते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी एक युवा नेता के मुताबिक राहुल पार्टी की बजाय जनता की ताकत पर भरोसा करके आगे बढ़ना चाहते हैं। वह अपनी सक्रियता और भूमिका से पीछे न हटकर उसे नया स्वरूप देना चाहते हैं, इसलिए वह अपने फैसले पर अड़े हुए हैं।