फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कुरुक्षेत्र : दादी और मां के रास्ते पर चल कर मंजिल पाना चाहते हैं राहुल

Tue, 28 May 2019 05:40 PM IST
विनोद अग्निहोत्री विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
विज्ञापन
राहुल गांधी, सोनिया गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

राहुल गांधी अपनी दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी दोनों के ही रास्ते पर चलना चाहते हैं। इसीलिए वह कांग्रेस कार्यसमिति और दूसरे तमाम बड़े नेताओं के आग्रहों और अनुरोधों के बावजूद पार्टी अध्यक्ष पद फिलहाल छोड़ने के अपने फैसले पर डटे हुए हैं। राहुल के बेहद करीबी सूत्रों के मुताबिक 2004 में यूपीए की सरकार बनने के वक्त जिस तरह संसदीय दल का नेता चुने जाने के बावजूद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था और तमाम मान मनौव्वल के बावजूद उन्होंने अपना फैसला नहीं बदलकर हमेशा के लिए विदेशी मूल के विपक्ष के हथियार को भोथरा कर दिया था, कुछ उसी तरह अध्यक्ष पद छोड़कर पार्टी की कमान किसी गैर गांधी को सौंपकर राहुल गांधी कांग्रेस को न सिर्फ गांधी परिवार पर निर्भरता से मुक्त करना चाहते हैं बल्कि वंशवाद के विपक्ष के आरोप को भी खत्म करने का उनका इरादा है। 

विज्ञापन


इन सूत्रों के अनुसार अपने इस कदम से राहुल गांधी अपनी दादी इंदिरा गांधी का भी अनुसरण करना चाहते हैं। जिस तरह तत्कालीन कांग्रेस के तमाम पुराने मठाधीश नेताओं से मुकाबला करते हुए इंदिरा गांधी ने पूरी कांग्रेस को अपने साथ किया था और जनता में अपनी अलग छवि बनाई थी, राहुल अब उसी रास्ते पर चलना चाहते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी इस युवा नेता के मुताबिक राहुल गांधी अब सोनिया गांधी और राजीव गांधी के बेटे बनकर राजनीति नहीं करना चाहते हैं, वह राहुल गांधी की पहचान बनाकर कांग्रेस और खुद को देश की जनता के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं। इसलिए पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने का उनका इरादा मजबूत है।
विज्ञापन


राहुल के करीबियों के मुताबिक ऐसा नहीं है कि राहुल हमेशा के लिए कांग्रेस अध्यक्ष पद छोडना चाहते हैं, बल्कि वह जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाने के बाद अगर पार्टी चाहेगी तो वह फिर उसकी कमान संभालेंगे। लेकिन तब वह इंदिरा गांधी की तरह ज्यादा ताकतवर होकर पार्टी का नेतृत्व करेंगे। 

विज्ञापन

राहुल इस बड़े कदम से एक बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं

राहुल गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी न सिर्फ चुनावी हार से सकते में हैं बल्कि इस बात से भी आहत हैं कि पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें चुनावों को लेकर लगातार अंधेरे में रखा। जहां राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने बार-बार यही भरोसा दिया कि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सीटें भाजपा से ज्यादा आएंगी, दूसरे नेता भी सिर्फ दिल्ली में बैठकर बयानबाजी ही करते रहे और अपने अपने गृह राज्यों में कोई काम नहीं किया।

राहुल को न सिर्फ वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं से शिकायत है बल्कि युवा नेताओं की अपनी टीम ने भी उन्हें निराश किया है। कर्नाटक में जिस तरह उनके बार बार कहने के बावजूद राज्य के वरिष्ठ नेता जद(एस) नेताओं के साथ लड़ते रहे और आंकड़ों के लिहाज से कांग्रेस जद(एस) गठबंधन को 28 में से कम से कम 20 सीटें जीतनी चाहिए थीं, वह बुरी तरह पिट गया। यही हाल महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, आदि राज्यों में भी रहा। 

अमेठी की हार ने भी राहुल को बेहद आहत किया है। इसलिए अपने इस बड़े कदम से वह एक बड़ी लकीर खींचकर उसे भी छोटा करना चाहते हैं। राहुल संसद में अपनी भूमिका बढ़ाएंगे। वह लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता बनकर सरकार और प्रधानमंत्री के सामने डटकर अपनी बात रखेंगे। लेकिन संगठन की कमान किसी और को सौंपकर वह कम से कम एक डेढ़ साल देश भर में घूम-घूम कर लोगों से सीधे मिलेंगे।

उनकी योजना है कि सभी प्रदेशों में जाकर कार्यकर्ताओं से सीधे बात करें। उनकी सुनें और फिर पद यात्राओं और सड़क यात्राओं के जरिए नुक्कड़ सभाओं के जरिए लोगों का मन टटोलें और समझे कि लोग आखिर कांग्रेस और उनसे क्या चाहते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के करीबी एक युवा नेता के मुताबिक राहुल पार्टी की बजाय जनता की ताकत पर भरोसा करके आगे बढ़ना चाहते हैं। वह अपनी सक्रियता और भूमिका से पीछे न हटकर उसे नया स्वरूप देना चाहते हैं, इसलिए वह अपने फैसले पर अड़े हुए हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें