भारतीय राजनीति के कुरुक्षेत्र में सरकार और विपक्ष के बीच कोरोना महाभारत में विपक्ष के 'मजदूरास्त्र' और सरकार के 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज कवच का मुकाबला है। सरकार और विपक्ष की संकटकालीन एकता अब बिखर रही है।
लॉकडाउन के चौथे चरण के शुरू हो जाने के बावजूद शहरों से अपना काम और घर छोड़कर गांवों की ओर पलायन कर रहे लाखों मजदूरों की पीड़ा को विपक्ष और धार देकर सरकार के खिलाफ मजदूरास्त्र बनाने में जुट गया है, तो सरकार ने बीस लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज को अपना रक्षा कवच बनाया है।
सैकड़ों हजारों मील का सफर पैदल, साईकिल, रिक्शा, टेंपों से तय कर रहे मजदूरों की पीड़ा का संज्ञान लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे तप की संज्ञा दी है, तो कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इन तप करते हुए मजदूरों की सुध लेने उनके बीच पहुंच कर सरकार को चुनौती दे रहे हैं।
उधर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने प्रवासी मजदूरों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से एक हजार बसें भेजने की अनुमति मांग कर योगी आदित्यनाथ की सरकार पर नया दांव चल दिया है, जिसका मुकाबला योगी सरकार अपने तरकश से नियम और प्रक्रियाओं के तीरों से कर रही है।
दुनिया भर में कहा जा रहा है कि कोरोना काल के बाद का संसार बदला हुआ संसार होगा। कई देश इस समस्या को भी अपने लिए एक अवसर बनाने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना काल को एक अवसर मानते हुए भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है।
कांग्रेस भी इसे अपने लिए एक अवसर मान रही है और एक बार फिर आमजनता खासकर गरीबों मजदूरों किसानों और बेरोजगार नौजवानों के बीच अपनी खोई जमीन वापस पाने में जुट गई है। केंद्र सरकार द्वारा घोषित लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों के देशव्यापी पलायन, छोटे उद्योगों और लघु उद्यमियों व्यापारियों के कारोबार पर सकंट और किसानों के सामने अपने उत्पाद बेचने की समस्या, तालाबंदी की वजह से ठप्प अर्थव्यवस्था से पैदा हो रही भीषण बेरोजगारी ने कांग्रेस को खुद को जनता के साथ खड़े होने का मौका दे दिया है।
इसलिए कांग्रेस हर मंच पर इन मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाकर सरकार को घेरने में जुटी है। कमान खुद राहुल गांधी ने संभाल ली है और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उन्हें अपनी ताकत दे रही हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी का दावा है कि जिस तरह बिना किसी तैयारी के मोदी सरकार ने तालाबंदी घोषित की और करोड़ों लोगों को उनकी किस्मत के भरोसे छोड़ दिया और उसके बाद देशभर में लाखों मजदूर शहरों से विस्थापित होकर सड़कों रेल की पटरियों और खेतों के रास्ते हजारों मील की यात्रा करते हुए दुर्घटनाओं में जान दे रहे हैं।
गर्मी प्यास और धूप में बीमार पड़ रहे हैं और तमाम तकलीफें उठा रहे हैं, इसने मोदी सरकार की बदइंतजामी की पोल खोल दी है और जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यह सरकार संकटकाल के प्रबंधन में बुरी तरह अक्षम है।
त्यागी कहते हैं कि कांग्रेस ने हमेशा गरीबों और वंचितों के हितों की लड़ाई लड़ी है और आज भी वह मजदूरों किसानों छोटे व्यापारियों और बेरोजगार नौजवानों के साथ है।
लेकिन भाजपा और उसके रणनीतिकार निश्चिंत हैं। उन्हें पूरा भरोसा है कि राहुल गांधी और कांग्रेस कितनी भी उछलकूद कर लें, लेकिन आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी साख ही भारी पड़ेंगे। अब खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इस लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर आकर 20 लाख करोड़ के कोरोना आर्थिक पैकेज की घोषणा करके विपक्ष के हमलों की धार को कुंद करने का जोरदार दांव चला है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण राहुल गांधी और कांग्रेस के मजदूर प्रेम को राजनीतिक नाटक की संज्ञा दे रही हैं। भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया कहते हैं कि पूरे देश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा है और सब जानते हैं कि राष्ट्रीय संकट के समय भी ओछी राजनीति करना कांग्रेस की पुरानी आदत है।
कांग्रेस कुछ भी कर ले वह कामयाब नहीं होगी। वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ओंकारनाथ सिंह का दावा है कि जिस तरह प्रियंका गांधी ने पैदल गांव जा रहे मजदूरों के लिए एक हजार बसों का इंतजाम किया है और योगी सरकार उन्हें मंजूरी नहीं दे रही है, राज्य सरकार की यह हरकत भाजपा को भारी पड़ेगी।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि कोरोना से लड़ने के बहाने मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानूनों को खत्म करने या उन्हें कमजोर करने की कोशिश का कांग्रेस विरोध करेगी।
अपने ट्वीट के जरिए राहुल ने कहा कि लोकतांत्रिक और मानव अधिकारों पर कोरोना की आड़ में अतिक्रमण की कोशिश हो रही है जिसे सहन नहीं किया जाएगा। इसके पहले वीडियो कांफ्रेंस
के जरिए आयोजित संवाददाता सम्मेलन में अमर उजाला ने जब यही सवाल राहुल गांधी से पूछा था तब भी उन्होंने कहा था कि हमारे संविधान और संसद द्वारा पारित कानूनों के जरिए जनता को जो अधिकार मिले हैं उन्हें अगर स्थाई रूप से खत्म करने की कोशिश हुई तो हिंदुस्तान इसे बर्दाश्त नहीं करेगा और हिंदुस्तान एसा करने वालों को सबक सिखा देगा।
इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने गांव और घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों के रेल किराए का भुगतान कांग्रेस द्वारा किए जाने की घोषणा करके सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया था और केंद्र सरकार को साफ करना पड़ा कि मजदूरों के रेल किराए का 85 फीसदी पैसा केंद्र सरकार और 15 फीसदी संबंधित राज्य सरकार भरेगी।
उधर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी उत्तर प्रदेश में मोर्चा संभाल लिया है। लोकसभा चुनावों के दौरान राजनीति में सक्रिय हुईं प्रियंका को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया हुआ है। हालांकि लोकसभा चुनावों मोदी के जादू के आगे प्रियंका का जादू नहीं चला।
लेकिन उसके बावजूद पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए रखा है। तब से प्रियंका ने अपना सारा ध्यान उत्तर प्रदेश पर लगा रखा है। सोनभद्र में जमीन विवाद में हुए लोमहर्षक सामूहिक हत्याकांड के बाद प्रियंका ने वहां धरना देकर सबका ध्यान खींचा था।
उसके बाद से वह जमीन पर तो नहीं उतरीं लेकिन सोशल मीडिया के जरिए लगातार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर निशाना साधते हुए राज्य के मुद्दे उठाती रहती हैं। रोजाना उनके ट्वीट राज्य के अनेक मुद्दों पर जनता और सरकार का ध्यान खींचते रहते हैं।
लेकिन कोरोना काल में भाई राहुल और मां सोनिया की तरह अब प्रियंका भी आक्रामक मुद्रा में आ गई हैं। उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों को उनके गांव घर पहुंचाने के मुद्दे पर प्रियंका के निर्देश पर कांग्रेस ने करीब एक हजार बसों को राज्य की सीमा पर खड़ा करके योगी सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी।
प्रियंका ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इन बसों को पैदल चल रहे मजदूरों को उनके गंतव्य तक ले जाने की अनुमति देने का अनुरोध किया।
बदले में योगी सरकार ने पहले तो चुप्पी साधी फिर जब प्रियंका और कांग्रेस ने इस मुद्दे को मीडिया और सोशल मीडिया में बार बार उठाया तो उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए मंजूरी के लिए बसों की सूची, रजिस्ट्रेशन नंबर, चालकों परिचालकों के नाम और ब्योरे मांगे।
कांग्रेस की ओर से जो ब्योरे दिए गए उसमें राज्य सरकार के परिवहन विभाग ने तमाम तकनीकी और कागजी खामियां निकाल दीं। प्रियंका और योगी सरकार के बीच करीब नौ पत्र लिखे गए।
राजस्थान में आगरा सीमा पर बसों की लंबी कतार खड़ी कर दी गई, जिसे लगातार टीवी चैनलों ने दिखाया। प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू के नेतृत्व में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सड़क पर धरना प्रदर्शन भी किया। पूरे दिन अच्छा खासा मीडिया इवेंट बना और लगातार उत्तर प्रदेश सरकार बनाम कांग्रेस और योगी बनाम प्रियंका की चर्चा होती रही।
अपने इस दांव से प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश जहां कांग्रेस जो मात्र सात विधायकों और एक सांसद वाली पार्टी रहकर हाशिए पर है, को सीधे सीधे 325 विधायकों और 64 सांसदों वाली सत्तारूढ़ भाजपा और राज्य सरकार के मुकाबले ला खड़ा किया है। सपा और बसपा जो भाजपा के बाद राज्य की प्रमुख दल हैं, इस मुद्दे पर कांग्रेस से पीछे छूट गए हैं।
प्रियंका और कांग्रेस के इस दांव के पीछे दूरगामी रणनीति है। प्रवासी मजदूरों का मुद्दा उठाकर कांग्रेस अपने उस खोए जनाधार को पाना चाहती है जो पिछले तीन दशकों से भाजपा सपा और बसपा ने उससे छीन रखा है।
राज्य के लाखों प्रवासी मजदूर जो दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा,पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में काम बंद होने के बाद अपने घर और गांवों की ओर चल पड़े हैं, उनका एक व्यापक सामाजिक आधार है।
वह धीरे धीरे अपने गांव पहुंच रहे हैं और वहां उनका परिवार और कुनबा है। जहां वो अपनी तकलीफ और पीड़ा बयां करते हुए बता रहे हैं कि मुसीबत की इस घड़ी में किसने उनका हाल पूछा और कौन साथ खड़ा हुआ।
कांग्रेस की कोशिश है कि वह मजदूरों के साथ खड़ी दिखाई दे और उस व्यापक सामाजिक आधार की सहानुभूति बटोरकर उसका राजनीतिक लाभ पहले 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उठाए और फिर 2024 के लोकसभा चुनावों में उसे भुनाए।मजदूरों के मुद्दे पर भाजपा फंस गई है।
क्योंकि जिस तरह अचानक लॉकडाऊन किया गया और उसके बाद जो मजदूर समस्या पैदा हुई,उसे शुरू में केंद्र ने राज्यों की समस्या मानते हुए अनदेखा किया।
लॉकडाउन के तीसरे चरण तक यह समस्या इतनी विकट और गंभीर हो गई और जिस तरह लगातार कांग्रेस ने इसे एक धारदार मुद्दा बनाया कि आखिरकार केंद्र को इसका संज्ञान लेकर विशेष श्रमिक रेलगाड़िंयां चलानी पड़ीं।
लेकिन समस्या उससे खत्म नहीं हुई बल्कि सड़क दुर्घटनाओं में दर्जनों मजदूरों की मौत की खबरों ने मामले को और जटिल बनाया।साथ ही सूरत मुंबई, अहमदाबाद, मध्यप्रदेश और दिल्ली में उत्तर प्रदेश सीमा पर रोज मजदूरों की भीड़, सड़कों पर धरने प्रदर्शन, सड़कों और रेल पटरियों पर गठरियां लादे, बच्चों को संभाले, ट्रकों और टैंकरों, रिक्शा, साईकिल, ऑटो से सैकड़ों मील का तकलीफ देह सफर करते मजदूरों के झुंड के झुंड की तस्वीरों ने मजूदर पलायन को कोरोना काल का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।
कांग्रेस इसे एक सियासी ब्रह्मास्त्र बनाना चाहती हैं वहीं भाजपा इसकी काट केंद्र सरकार के 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज के कवच से करना चाहती है।
साफ है कि अक्टूबर में संभावित बिहार चुनाव हों या उसके ही आसपास मध्य प्रदेश में करीब दो दर्जन विधानसभा सीटों के उपचुनाव या 2021 में प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के विधानसभा चुनाव और उसके एक साल बाद उत्तर प्रदेश ,पंजाब, उत्तराखंड और गोवा के विधानसभा चुनावों को लेकर होने वाले राजनीतिक महाभारत के कुरुक्षेत्र में कोरोना काल में तबाह हुई अर्थव्यवस्था के साथ साथ एक बड़े मुद्दे के रूप में मजदूरों के पलायन पर सरकार और विपक्ष के बीच हमले होंगे। इन चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि विपक्ष का 'मजदूरास्त्र' कारगर रहा या सरकार का पैकेज कवच।