केंद्रीय मंत्री और अकाली दल के शिखर पुरुष सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे से हालांकि केंद्र की मोदी सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन अकाली दल के के साथ भाजपा की दोस्ती अब लंबी चलने वाली नहीं है। हालांकि अकाली दल को भाजपा की ज्यादा जरूरत है, भाजपा को अब अकाली दल की उतनी जरूरत नहीं है जितनी 2019 लोकसभा चुनाव तक थी। इसलिए भाजपा महाराष्ट्र की तरह पंजाब में भी अकाली दल की बैसाखी उतार कर विधानसभा चुनावों में अपने दम पर भी मैदान में उतर सकती है।
भाजपा ने इसके लिए अकाली दल से अलग हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा गुट और स्थानीय स्तर पर कुछ छोटे राजनीतिक समूहों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को भरोसा है कि अकाली दल से अलग होने के बाद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक बड़ा वर्ग भी उसके साथ आ सकता है। अकाली दल दोहरे दबाव में है। एक तरफ कृषि क्षेत्र में सुधार के प्रस्तावित विधेयकों को लेकर गरमाई पंजाब के किसानों की सियासत ने उसे केंद्र सरकार से बाहर आने को मजबूर किया है, लेकिन अभी अकाली दल ने मोदी सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है और एनडीए का हिस्सा है।
लेकिन अगर हरसिमरत के इस्तीफे के बावजूद केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए लाए जाने वाले तीनों अध्यादेशों को संसद से कानून बनवा लेती है, जो कि उम्मीद है बनवा लेगी, तो अकाली दल के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट होगा कि वह केंद्र की मोदी सरकार को समर्थन दे या न दे। निश्चित रूप से पंजाब की किसान राजनीति और कांग्रेस का दबाव होगा कि अकाली दल अगर किसानों के हितों को लेकर है तो एनडीए से बाहर आकर इसे साबित करे। अगर अकाली दल यह नहीं करता है तो पंजाब की किसान राजनीति में उसके लिए हरसिमरत कौर का इस्तीफा सिर्फ दिखावे का ही साबित होगा और अगर वह एनडीए से बाहर आता है तो राज्य में भी भाजपा के साथ उसका गठबंधन टूट जाएगा। तब 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के मुकाबले अकाली दल और भाजपा को अलग-अलग लड़ना होगा।
यह समझना कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अकाली दल के इस रुख का अनुमान नहीं था, भूल होगी। क्योंकि राजनीति के चतुर खिलाड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सियासत की शतरंज की बिसात पर चली जाने वाली हर चाल से आगे की चालें समझ कर अपना दांव खेलते हैं। भाजपा अध्यक्ष जे.पी.नड्डा पंजाब के पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश से आते हैं और वह पंजाब की सियासत को भी बखूबी समझते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से ही भाजपा नेतृत्व को लगातार यह जानकारी अपने संगठन के सूत्रों और संपर्कों से हो रही थी कि पंजाब में प्रकाश सिंह बादल जैसी लोकप्रियता और समर्थन उनके बेटे और शिरोमणि अकाली दल के सर्वेसर्वा सुखबीर सिंह बादल के पास नहीं है, इसलिए अकाली दल का जनाधार सिमटता जा रहा है और अकाली दल भाजपा के लिए भी बोझ जैसा बनता जा रहा है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक अब पंजाब में भाजपा के विस्तार और अपने दम पर चुनाव लड़ने का समय आ गया है। इस नेता के मुताबिक 2017 में भी पंजाब विधानसभा चुनावों में जनता की नाराजगी भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नहीं बल्कि अकाली दल और बादल परिवार से थी। इसका नुकसान भाजपा को भी उठाना पड़ा । इस नेता का कहना है कि भाजपा लोकसभा चुनावों के बाद से ही इस रणनीति पर काम कर रही थी कि किस तरह पंजाब में पार्टी का विस्तार करके उसे राज्यव्यापी स्वरूप दिया जाए। इसके लिए भाजपा और संघ के कार्यकर्ता लगातार काम भी कर रहे थे और उन्हें यह जमीनी फीडबैक मिला कि अगर भाजपा अकाली दल से अलग हो जाए तो आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और जनाधार बड़ी संख्या में भाजपा से जुड़ सकता है। क्योंकि इनका विरोध भाजपा से नहीं अकाली दल से है, जैसे कि प.बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विरोध में माकपा के कार्यकर्ता और जनाधार ने बड़ी तादाद में भाजपा का दामन थाम लिया है।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक इसी आधार पर कृषि सुधार संबंधी तीनों अध्यादेश जब लाए गए तब ही यह अनुमान था कि पंजाब की किसान राजनीति के दबाव में अकाली दल इसका विरोध कर सकता है और सरकार से अलग भी हो सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व मानसिक रूप से इसके लिए तैयार थे। लेकिन अध्यादेश लाते वक्त अकाली दल ने विरोध नहीं किया और मंत्रिमंडल की बैठक में हरसिमरत कौर ने भी सहमति की मुहर लगाई। जब संसद में विधेयक लाए गए तब अकाली दल ने जरूर इन्हें प्रवर समिति को सौंपने की मांग की, जिसे सरकार ने नामंजूर कर दिया। उधर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कांग्रेस ने आक्रामक रुख अख्तियार करके अकाली दल पर दबाव बढ़ा दिया और गुरुवार को जब अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर ने प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें अपना इस्तीफा सौंपा तो उन्होंने उसे तुरंत स्वीकार करके राष्ट्रपति को भेज दिया।
भाजपा के एक युवा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि अब यह अकाली दल को तय करना है कि वह एनडीए में रहे या न रहे। अगर अकाली दल अपनी तरफ से एनडीए छोड़ेगा तो भाजपा को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। हालांकि अकाली दल भाजपा का उसी तरह सबसे पुराना सहयोगी जैसे कि शिवसेना थी। शिवसेना महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ने के बावजूद मुख्यमंत्री के मुद्दे पर अलग हो गई। कुछ इसी तरह 2013 में नीतीश कुमार के जद (यू) ने भाजपा और एनडीए से नाता तोड़ा था और 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा और सरकार बनाई।
लेकिन डेढ़ साल बाद नीतीश वापस भाजपा और एनडीए के साथ चले गए। अब अकाली दल के सामने यह राजनीतिक धर्मसंकट है कि वह पंजाब में अपने किसान जनाधार को बचाने के लिए क्या फैसला लेता है। उसकी मजबूरी भाजपा के साथ रहने की है, लेकिन उसे कृषि विधेयकों के कानून बन जाने से नाराज अपने किसान जनाधार को भी साथ रखना है। जबकि भाजपा निश्चिंत है कि अकाली दल साथ रहे या अलग हो उसे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।