कर्नाटक पब्लिक सर्विस कमीशन (केपीएससी) के जरिए राजपत्रित अधिकारी बनने के प्रश्न पत्रों को मोटी रकम लेकर बेचा गया। प्रति उम्मीदवार प्रश्न पत्र मुहैया कराने के लिए 80 लाख रुपये मांगे गए थे। बाद में 30 से 40 लाख रुपये में सौदा तय हो गया। खास बात ये रही कि इस मामले में एक आईएएस अफसर ने पेपर लीक कराने वाले व्यक्ति को ही स्ट्रांग रूम की 'चाबी' सौंप दी। जिन उम्मीदवारों ने रुपये दिए थे, उन्हें परीक्षा वाले दिन विशेष गाड़ी में बैठाकर एग्जाम सेंटर पर ले जाया गया।
ईडी के बेंगलुरु जोनल ऑफिस, कर्नाटक पब्लिक सर्विस कमीशन (केपीएससी) द्वारा 400 पदों के लिए आयोजित वेटरनरी ऑफिसर्स भर्ती परीक्षा में हुई गड़बड़ियों की जांच कर रहा है। यह जांच बंगलूरू के विधान सौधा पुलिस स्टेशन में दर्ज कई एफआईआर के आधार पर की जा रही है। इनमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318(3), 318(4), 336(2), 336(3) और 340(2) के तहत दंडनीय अपराधों का जिक्र है। जांच के दौरान ऐसे सबूत मिले, जिनसे पता चला कि बसवराज कन्नाले ने अपने साथियों के साथ मिलकर, गैर-कानूनी तरीके से पैसे लेकर उम्मीदवारों को सही जवाबों वाला लीक हुआ प्रश्न-पत्र उपलब्ध कराया और वेटरनरी ऑफिसर्स भर्ती परीक्षा में उनका गैर-कानूनी चयन सुनिश्चित किया।
पहले मांगे गई 80 लाख रुपये, सौदा हुआ 40 लाख में
जांच से पता चला कि बसवराज कन्नाले को लीक हुए प्रश्न-पत्र तक पहुंच केपीएससी के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक आईएएस अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार के साथ अपनी करीबी जान-पहचान के जरिए मिली थी। उनके पास परीक्षा की गोपनीय सामग्री की कस्टडी और देखरेख की ज़िम्मेदारी थी। इसके बाद बसवराज कन्नाले ने कई उम्मीदवारों की पहचान की, उनसे संपर्क किया और उन्हें वेटरनरी ऑफिसर्स भर्ती परीक्षा में उनके चयन का भरोसा दिलाया। सबूतों के आधार पर, बसवराज कन्नाले को 17 सितंबर को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया। उन पर अपराध की कमाई करने की रणनीति तैयार करने, उसे जुटाने और संभालने में शामिल होने का आरोप है। अदालत ने कन्नाले को 14 दिन की ईडी कस्टडी में भेजा है।
ईडी के अनुसार, हर उम्मीदवार से लगभग 80 लाख रुपये की मांग की गई थी, जिसे बाद में बातचीत के ज़रिए प्रति उम्मीदवार 30 लाख से 40 लाख रुपये के बीच तय किया गया। तय की गई रकम का कुछ हिस्सा कैश और बैंकिंग चैनलों के ज़रिए एडवांस के तौर पर लिया गया। बाकी रकम की गारंटी के लिए, कुछ उम्मीदवारों से बिना रकम भरे साइन किए हुए चेक और प्रॉमिसरी नोट लिए गए। इनमें से कुछ को बाद में तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान बरामद और जब्त किया गया।
उम्मीदवारों को बंगलूरू के बाहरी इलाके में एक रिसॉर्ट में ले गए
जांच में यह भी पता चला कि ओम लक्ष्मी सौहार्द सहकारी संघ नियमित, बीदर के बैंक अकाउंट का इस्तेमाल ऊपर बताई गई गैर-कानूनी रिश्वत से जुड़ी कुछ रकम लेने के लिए किया गया था। चुने हुए उम्मीदवारों को बंगलूरू के बाहरी इलाके में एक रिसॉर्ट में ले जाया गया, जहां उन्हें सही जवाबों वाला लीक हुआ प्रश्न-पत्र दिया गया। बसवराज कन्नाले और उनके साथियों की देखरेख में उम्मीदवारों को जवाब याद कराए गए। अगले दिन, यानी परीक्षा की तारीख को, उम्मीदवारों को बसवराज कन्नाले और/या उनके साथियों द्वारा इंतज़ाम की गई गाड़ियों से उनके परीक्षा केंद्रों तक ले जाया गया।
आगे की जांच में तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक, आईएएस अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार की भूमिका का भी पता चला। उन्हें भर्ती परीक्षाओं के पारदर्शी और निष्पक्ष संचालन को सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। वे प्रश्न-पत्रों की छपाई को अंतिम रूप देने और उसकी निगरानी करने तथा गोपनीय परीक्षा सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए ज़िम्मेदार थे। जांच में पाया गया कि ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार ने अपने पद पर रहते हुए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया। गैर-कानूनी रिश्वत के बदले, परीक्षा से एक दिन पहले बसवराज कन्नाले को सही जवाबों वाला वेटनरी ऑफिसर्स भर्ती परीक्षा का प्रश्न-पत्र लीक करने में मदद की।ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार को 18 सितंबर को औपचारिक रूप से गिरफ़्तार किया गया।
उन पर तय आपराधिक गतिविधि से हुई अवैध कमाई को हासिल करने में मदद करने का आरोप था। उन्हें प्रोडक्शन वारंट के आधार पर पीएमएलए मामलों की विशेष अदालत के सामने पेश किया गया। विशेष अदालत ने आगे की जांच के लिए ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार को 14 दिनों के लिए प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत में भेज दिया है। 18 अगस्त से 24 अगस्त के बीच की गई तलाशी के दौरान जब्त की गई सामग्री के विश्लेषण से पता चला कि उक्त आपराधिक गतिविधि से हुई अवैध कमाई को बाद में कई तरीकों से घुमाया-फिराया गया। विभिन्न जगहों पर उसका इस्तेमाल किया गया। इन तरीकों में बैंक ट्रांसफर, सोने के गहने खरीदना, हवाई यात्रा के लिए नकद भुगतान और नकद लेनदेन शामिल थे। ऐसा इसलिए किया गया ताकि इस कमाई के स्वरूप और स्रोत को छिपाया जा सके। इसका मकसद उक्त कमाई को कानूनी तौर पर जायज बताना था।