कोटा में आत्महत्या की घटनाएं।
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कोटा में पढ़ने-रहने के खर्च का दबाव भी एक कारण
एक कोचिंग संस्थान के शिक्षक कहते हैं कि अगर बच्चों को टीचर कुछ बोल देता है तो वे एक या दो दिन में इसे भूलकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन उन्हें माता-पिता कुछ बोल देते हैं, तो वह बात उनके मन में घर कर जाती है। बच्चों पर पहले खुद के भविष्य का दबाव रहता है। इसके बाद माता-पिता के सपने पूरे करने का दबाव होता है। आज 90 प्रतिशत लोग अपने बच्चों को कोटा में पढ़ाने की क्षमता नहीं रखते। कोटा में एक साल एक बच्चे के रहने का खर्च करीब ढाई लाख रुपए के आसपास का है। एक से डेढ़ लाख कोचिंग की फीस है। इसके अलावा बच्चों के अन्य खर्चे भी होते हैं। सबकुछ जोड़कर देखें तो एक साल में एक बच्चे पर चार लाख रुपये तक भी खर्च हो जाते हैं। अगर बच्चा दो साल पढ़ाई करता है तो आठ लाख रुपये का खर्च बैठता है। इन पैसों का दबाव बच्चों पर आता है।
शिक्षक कहते हैं कि कई कोचिंग संस्थान हर सप्ताह टेस्ट लेते हैं। यह तरीका बहुत ही गलत है। एक सप्ताह के टेस्ट से बच्चे की ग्रोथ का पता लगाना बहुत ही मुश्किल होता है। बच्चों का टेस्ट एक माह में भी नहीं होना चाहिए। यह टेस्ट एक पूरा सिलेबस पूरा होने के बाद होना चाहिए। ताकि बच्चे भी समय रहते इसे पढ़कर तैयारी कर सकें। बच्चे आमतौर पर इन्हीं वीक टेस्ट को सब कुछ मानकर इसकी तैयारी में लगे रहते हैं। जैसे ही इस टेस्ट में पिछड़ जाते हैं तो माता-पिता की डांट सुनते हैं। इन्हीं वजहों से उन्हें कोटा में रहकर पढ़ाई बोझ लगने लगती है।
आत्महत्या के सबसे बड़े कारण
- छात्रों को कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाई का तनाव होता है। टेस्ट में कम अंक लाने पर या प्रवेश परीक्षा में चयन नहीं हो पाने वे आत्महत्या जैसा कदम उठाते हैं।
- छात्रों की उम्र 14 से 18 वर्ष के बीच होती है। इस उम्र में शरीर और सोच में बदलाव आते हैं, लेकिन छात्र इसे समझ नहीं पाते। वे अकेले होते हैं। ऐसे में उन्हें समझाने वाला कोई नहीं रहता। इसी वजह से तनाव बढ़ता है।
- पढ़ाई के दौरान कुछ बच्चे मानसिक तनाव लेते हैं।
- 15 साल तक परिवार और माता-पिता के साथ रहने के बाद नए शहर में बच्चा अकेला रह जाता है। उस पर पढ़ाई का भारी प्रेशर आ जाता है। इस कारण परिवार से जुड़े बच्चे इस दूरी को झेल नहीं पाते है। इसका सीधा असर पढ़ाई और फिर दिमाग पर पड़ता है।
- कोचिंग में पढ़ने वाले हर बच्चे समान नहीं होते हैं। हर किसी के अभिभावक आर्थिक रूप से संपन्न हो, यह जरूरी नहीं है। कुछ बच्चे खुद को आर्थिक रूप से कमजोर समझने लगते हैं। यह तनाव का कारण बन जाता है।
मनोरोग विशेषज्ञ की राय- कौन रखे बच्चों का ध्यान?
कोटा के वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ और 11 हजार बच्चों को आत्महत्या जैसा कदम उठाने से रोक चुके डॉ.एम.एल अग्रवाल अमर उजाला से कहते हैं कि आज अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों का करियर चयन करते समय उनकी रुचि के विषय का ध्यान रखें। कभी भी अपनी मर्जी का विषय या करियर उन पर न थोंपें। उनकी पढ़ाई और उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही करियर बनाने में मदद करें। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के माता-पित कभी भी उन पर अच्छे परिणाम का दबाव नहीं बनाएं। हमेशा उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित करें। अगर बच्चे का चयन नहीं होता है उन्हें समझाएं और बताएं कि कैसे इन परीक्षाओं में सफलता हासिल की जा सकती है। अगर किसी छात्र की कोई मेडिकल हिस्ट्री है तो माता-पिता को उसकी जानकारी कोचिंग संस्थान के साथ-साथ होस्टल संचालक भी देना चाहिए ताकि विषम परिस्थिति में बच्चे को संभाला जा सके।
डॉ. अग्रवाल का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले बच्चों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनका लक्ष्य स्पष्ट हो। बच्चों को पढ़ाई के दौरान टेंशन, व्यसन और गलत संगत से दूर रहना चाहिए। अगर छात्रों को प्रतियोगी परीक्षा में सफलता नहीं मिलती है उन्हें डिप्रेशन में जाने के बजाए फिर से तैयारी शुरू करनी चाहिए। इसके अलावा अन्य करियर ऑप्शन भी सोचकर रखना चाहिए ताकि समय रहते उनकी तैयारी की जा सके। कुछ छात्र ऐसे होते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है। वे परीक्षाओं में बेहतर नहीं कर पाते तो ऐसे में उन्हें अपने माता-पिता से सलाह कर नए विकल्प का चयन करना चाहिए।
डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि कोचिंग संस्थान भी कोटा आने के बाद बच्चों को ऐसा वातावरण मुहैया करवाएं कि परिवार और दोस्तों से दूरी का उन्हें एहसास नहीं हो। छात्रों को पहले दिन से पढ़ाई को बोझ न दे। उन्हें पहले दिन से ये यह बताएं कि कैसे धीरे-धीरे लक्ष्य केंद्रित कर इन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की जा सकती है। कोचिंग बच्चे के एडमिशन के समय उसकी मेडिकल हिस्ट्री का जांच जरूर करें ताकि विपरीत परिस्थितियों में बच्चों की मदद हो सके। कोटा में सभी कोचिंग संस्थानों में एक बात सामान्य तौर पर देखने को मिलती है कि कुछ बच्चे स्वभाव व रुचि से पढ़ाई में अव्वल होते हैं। तो दूसरे कुछ पिछड़ जाते है। यहां गौर करने वाली बात है कि जो छात्र पीछे रह जाते हैं उन्हें टॉप में लाने के लिए विशेष प्रयास नहीं किए जाते हैं। इससे छात्रों पर दोहरा असर पड़ता है।
इन तरीकों से रुक सकती है छात्रों की आत्महत्या
- प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ाना सबसे ज्यादा जरूरी है। अभिभावकों के दबाव और अपने भविष्य को लेकर बच्चे कोटा तो आ जाते हैं, लेकिन वे जैसा चाहो वैसी पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। इस दौरान बच्चों को यह विश्वास दिलाया जाए कि इंजीनियरिंग और मेडिकल फील्ड के अलावा भी कई क्षेत्र हैं।
- घर छोड़कर कोटा या अन्य शहरों में रहकर पढ़ाई करने वाले बच्चे पहले परिवार और फिर अपने दोस्तों से एकदम से दूर हो जाते हैं। इसके बाद अभिभावक बच्चे को पढ़ाई के लिए सिंगल रूम दिलवा देते हैं, लेकिन इसी कमरे में वह बच्चा खुद को रिजर्व कर लेता है। अकेलेपन का शिकार हो जाता है। बच्चे के साथ क्या हो रहा है, क्या परेशानियां आ रही हैं, इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। बच्चा भी अपनी परेशानी साझा नहीं कर पाता। इसलिए उससे निरंतर संवाद रखना बेहद जरूरी है।
- अभिभावक बच्चों को हर समय यह अहसास करवाएं कि वे भले ही पढ़ाई के लिए परिवार और दोस्तों से दूर है, लेकिन वह उनके लिए बहुत मायने रखता है। अभिभावक बच्चों को हरदम यह समझाएं कि परिवार के अलावा समाज में भी उसकी बहुत अहमियत है।
- अभिभावक खुलकर एक दोस्त की तरफ बच्चों के साथ बर्ताव करे। उसकी पसंद और नापसंद को जानने का प्रयास करें।
कोटा में छात्रों की आत्महत्या के बड़े कारण
- पढ़ाई का दबाव
- कोचिंग संस्थानों में प्रतिद्वंद्वी माहौल
- होस्टल-पीजी का माहौल
- स्टडी ग्रुप का प्रेशर
- कोचिंग संस्थान का पढ़ाकू व तेज बच्चों पर ज्यादा ध्यान देना
- औसत और कमजोर बच्चों की अनदेखी करना
- कोचिंग क्लासेस की टाइमिंग-शेड्यूल, छुट्टियों की कमी
- परिवार, दोस्त और रिश्तेदार से दूरी
- माता-पिता या दोस्तों का दूसरे छात्रों से तुलना करना