फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kota Suicides: कोटा में बच्चों की आत्महत्या के पीछे अनसुलझी कहानियां, जानें इसके पीछे की वजहें क्या हैं

सार

What is the reason behind suicide in Kota: राजस्थान के कोटा में अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों में आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। वहां सरकार और स्थानीय प्रशासन हरकत में आया है, लेकिन समस्या की जड़ बहुत गहरी है।
विज्ञापन
Kota - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Kota Students Death: मध्यवर्गीय परिवार के बच्चे जब डॉक्टर या इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए घर छोड़ते हैं तो उनकी राह राजस्थान के एक शहर में आकर रुकती है। यह शहर है कोटा। लाखों बच्चों के सपनों का शहर, जहां एक साथ हजारों ख्वाब पलते हैं। माता-पिता का सपना पूरा करने और कुछ कर गुजरने की इच्छा लिए जब परिवार की आंखों का तारा घर छोड़ता है तो कई उम्मीदें उसके साथ यूं ही बंध जाती हैं कि जब वह कुछ हासिल कर लौटेगा तो परिवार, समाज का नाम रोशन करेगा। घर की दशा-दिशा बदल देगा। डॉक्टर-इंजीनियर या अफसर बनकर बुलंदियों को छुएगा, लेकिन अफसोस! इसी सपनों के शहर से जो खबरें निकलकर आ रही हैं, वह हजारों सपनों को तोड़ती हुई दिख रही हैं। 

विज्ञापन


ये खबरें उम्मीदों के रोशन होने की नहीं, बल्कि घरों के चिराग बुझने की है। कामयाबी की उछाल की नहीं, बल्कि मौत की छलांग लगाने की हैं। सभी बंधन तोड़ने की नहीं, बल्कि गले में फंदा लगाकर जान देने की है। उम्मीदों के इस शहर की गलियों-चौराहों, हॉस्टल-पीजी और मेस में इन दिनों निराशाओं की अनगिनत कहानी सुनने को मिल रही है। कुछ बच्चों की कहानी यहीं से शुरू होकर यहीं खत्म हो रही है और ये सिलसिला लगातार चल रहा है।

अमर उजाला ने इस मामले की पड़ताल की और यह जानने की कोशिश की कि आखिर कोटा में छात्रों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है, वहां का कोचिंग उद्योग किस तरह का है, छात्रों की दिक्कतें क्या हैं और वे आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए आखिर क्यों मजबूर हो जाते हैं। पढ़ें, इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढती यह रिपोर्ट...
विज्ञापन


सबसे पहले आंकड़ों के जरिए जानते हैं छात्रों और कोचिंग के लिहाज से कोटा कितना महत्वपूर्ण है
कोटा में कोचिंग का सालाना कारोबार 3 हजार करोड़ रुपये है। इंजीनियर, मेडिकल सहित अन्य परीक्षाओं की तैयारी के लिए यहां ढाई लाख छात्र रहते हैं। सबसे ज्यादा तादाद बिहार और उत्तर प्रदेश के छात्रों की है। कोटा में 10 से ज्यादा बड़े कोचिंग सेंटर, 3000 होस्टल, 25 हजार पीजी कमरे और 1800 मेस हैं। शहर के लैंडमार्क इलाके में सबसे ज्यादा 60 हजार छात्र रहते हैं। तलवंडी, जवाहर नगर, विज्ञान नगर, दादाबाड़ी और वसंत विहार जैसे इलाके में पौने दो लाख छात्र रहते हैं। कोर पार्क और बोरखेड़ा का इलाका भी छात्रों की बसाहट के लिए जाना जाता है। आईआईटी और जेईई की परीक्षा में सबसे ज्यादा 15.82 फीसदी के साथ राजस्थान का नंबर सबसे ज्यादा है। इसके बाद उत्तर प्रदेश, तेलंगाना,आंध्र प्रदेश व अन्य राज्यों का नंबर आता है। यहां से 8 से 10 प्रतिशत छात्र ही इन प्रतियोगी परीक्षा में बाजी मारते है।

कोटा में कोई दोस्त नहीं हर कोई प्रतिस्पर्धी...
कोटा में रहकर IIT की तैयारी कर रहे एक छात्र ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि कोटा में कोचिंग संचालकों का अपना कारोबार है। दूसरी बात, ज्यादातर अभिभावक फीस देकर बच्चों को भेज देते हैं। कोटा में क्या हो रहा है, ये उन्हें ज्यादा पता नहीं होता। तीसरे नंबर पर आते हैं उनके साथी। यहां कोई भी दोस्त नहीं होता है, सब प्रतिस्पर्धी होते हैं। इनसे ही हमारी असली प्रतिस्पर्धा है। कोटा में ऐसा तल्ख माहौल बनाकर रखा गया है कि छात्र न चाहते हुए भी सभी को अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं। ऐसे में कोई छात्र खुलकर अपनी बात किसी से कह नहीं पाता। यहां 15 से लेकर 20 साल के बच्चे हैं, जिनकी संख्या करीब तीन लाख है। एक छोटे से शहर में लाखों बच्चे हैं, लेकिन उनके लिए कोई गाइडलाइन नहीं है। प्रशासन कहता है कि हॉस्टल संचालक और कोचिंग संचालक आपस में समन्वय कर व्यवस्था करें। कोई एक दिन में तो आत्महत्या का फैसला नहीं करता है। कोई बच्चा अगर आत्महत्या के बारे में सोच भी रहा है तो वह हॉस्टल में ही रहेगा, कोचिंग जाना बंद करेगा। मेस में वह टाइम से खाना खाने नहीं आएगा। क्या इन सब चीजों का ध्यान हॉस्टल और कोचिंग वाले मिलकर नहीं रख सकते? क्या इसकी सूचना उनके माता-पिता को नहीं दे सकते?

कोटा में आत्महत्या की घटनाएं। - फोटो : Amar Ujala
कोटा में पढ़ने-रहने के खर्च का दबाव भी एक कारण
एक कोचिंग संस्थान के शिक्षक कहते हैं कि अगर बच्चों को टीचर कुछ बोल देता है तो वे एक या दो दिन में इसे भूलकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन उन्हें माता-पिता कुछ बोल देते हैं, तो वह बात उनके मन में घर कर जाती है। बच्चों पर पहले खुद के भविष्य का दबाव रहता है। इसके बाद माता-पिता के सपने पूरे करने का दबाव होता है। आज 90 प्रतिशत लोग अपने बच्चों को कोटा में पढ़ाने की क्षमता नहीं रखते। कोटा में एक साल एक बच्चे के रहने का खर्च करीब ढाई लाख रुपए के आसपास का है। एक से डेढ़ लाख कोचिंग की फीस है। इसके अलावा बच्चों के अन्य खर्चे भी होते हैं। सबकुछ जोड़कर देखें तो एक साल में एक बच्चे पर चार लाख रुपये तक भी खर्च हो जाते हैं। अगर बच्चा दो साल पढ़ाई करता है तो आठ लाख रुपये का खर्च बैठता है। इन पैसों का दबाव बच्चों पर आता है।

शिक्षक कहते हैं कि कई कोचिंग संस्थान हर सप्ताह टेस्ट लेते हैं। यह तरीका बहुत ही गलत है। एक सप्ताह के टेस्ट से बच्चे की ग्रोथ का पता लगाना बहुत ही मुश्किल होता है। बच्चों का टेस्ट एक माह में भी नहीं होना चाहिए। यह टेस्ट एक पूरा सिलेबस पूरा होने के बाद होना चाहिए। ताकि बच्चे भी समय रहते इसे पढ़कर तैयारी कर सकें। बच्चे आमतौर पर इन्हीं वीक टेस्ट को सब कुछ मानकर इसकी तैयारी में लगे रहते हैं। जैसे ही इस टेस्ट में पिछड़ जाते हैं तो माता-पिता की डांट सुनते हैं। इन्हीं वजहों से उन्हें कोटा में रहकर पढ़ाई बोझ लगने लगती है।

आत्महत्या के सबसे बड़े कारण
  • छात्रों को कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाई का तनाव होता है। टेस्ट में कम अंक लाने पर या प्रवेश परीक्षा में चयन नहीं हो पाने वे आत्महत्या जैसा कदम उठाते हैं। 
  • छात्रों की उम्र 14 से 18 वर्ष के बीच होती है। इस उम्र में शरीर और सोच में बदलाव आते हैं, लेकिन छात्र इसे समझ नहीं पाते। वे अकेले होते हैं। ऐसे में उन्हें समझाने वाला कोई नहीं रहता। इसी वजह से तनाव बढ़ता है।
  • पढ़ाई के दौरान कुछ बच्चे मानसिक तनाव लेते हैं। 
  • 15 साल तक परिवार और माता-पिता के साथ रहने के बाद नए शहर में बच्चा अकेला रह जाता है। उस पर पढ़ाई का भारी प्रेशर आ जाता है। इस कारण परिवार से जुड़े बच्चे इस दूरी को झेल नहीं पाते है। इसका सीधा असर पढ़ाई और फिर दिमाग पर पड़ता है।
  • कोचिंग में पढ़ने वाले हर बच्चे समान नहीं होते हैं। हर किसी के अभिभावक आर्थिक रूप से संपन्न हो, यह जरूरी नहीं है। कुछ बच्चे खुद को आर्थिक रूप से कमजोर समझने लगते हैं। यह तनाव का कारण बन जाता है।
 
मनोरोग विशेषज्ञ की राय- कौन रखे बच्चों का ध्यान?
कोटा के वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ और 11 हजार बच्चों को आत्महत्या जैसा कदम उठाने से रोक चुके डॉ.एम.एल अग्रवाल अमर उजाला से कहते हैं कि आज अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों का करियर चयन करते समय उनकी रुचि के विषय का ध्यान रखें। कभी भी अपनी मर्जी का विषय या करियर उन पर न थोंपें। उनकी पढ़ाई और उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही करियर बनाने में मदद करें। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के माता-पित कभी भी उन पर अच्छे परिणाम का दबाव नहीं बनाएं। हमेशा उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित करें। अगर बच्चे का चयन नहीं होता है उन्हें समझाएं और बताएं कि कैसे इन परीक्षाओं में सफलता हासिल की जा सकती है। अगर किसी छात्र की कोई मेडिकल हिस्ट्री है तो माता-पिता को उसकी जानकारी कोचिंग संस्थान के साथ-साथ होस्टल संचालक भी देना चाहिए ताकि विषम परिस्थिति में बच्चे को संभाला जा सके।

डॉ. अग्रवाल का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले बच्चों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनका लक्ष्य स्पष्ट हो। बच्चों को पढ़ाई के दौरान टेंशन, व्यसन और गलत संगत से दूर रहना चाहिए। अगर छात्रों को प्रतियोगी परीक्षा में सफलता नहीं मिलती है उन्हें डिप्रेशन में जाने के बजाए फिर से तैयारी शुरू करनी चाहिए। इसके अलावा अन्य करियर ऑप्शन भी सोचकर रखना चाहिए ताकि समय रहते उनकी तैयारी की जा सके। कुछ छात्र ऐसे होते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है। वे परीक्षाओं में बेहतर नहीं कर पाते तो ऐसे में उन्हें अपने माता-पिता से सलाह कर नए विकल्प का चयन करना चाहिए। 

डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि कोचिंग संस्थान भी कोटा आने के बाद बच्चों को ऐसा वातावरण मुहैया करवाएं कि परिवार और दोस्तों से दूरी का उन्हें एहसास नहीं हो। छात्रों को पहले दिन से पढ़ाई को बोझ न दे। उन्हें पहले दिन से ये यह बताएं कि कैसे धीरे-धीरे लक्ष्य केंद्रित कर इन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की जा सकती है। कोचिंग बच्चे के एडमिशन के समय उसकी मेडिकल हिस्ट्री का जांच जरूर करें ताकि विपरीत परिस्थितियों में बच्चों की मदद हो सके। कोटा में सभी कोचिंग संस्थानों में एक बात सामान्य तौर पर देखने को मिलती है कि कुछ बच्चे स्वभाव व रुचि से पढ़ाई में अव्वल होते हैं। तो दूसरे कुछ पिछड़ जाते है। यहां गौर करने वाली बात है कि जो छात्र पीछे रह जाते हैं उन्हें टॉप में लाने के लिए विशेष प्रयास नहीं किए जाते हैं। इससे छात्रों पर दोहरा असर पड़ता है।

इन तरीकों से रुक सकती है छात्रों की आत्महत्या
  • प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ाना सबसे ज्यादा जरूरी है। अभिभावकों के दबाव और अपने भविष्य को लेकर बच्चे कोटा तो आ जाते हैं, लेकिन वे जैसा चाहो वैसी पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। इस दौरान बच्चों को यह विश्वास दिलाया जाए कि इंजीनियरिंग और मेडिकल फील्ड के अलावा भी कई क्षेत्र हैं। 
  • घर छोड़कर कोटा या अन्य शहरों में रहकर पढ़ाई करने वाले बच्चे पहले परिवार और फिर अपने दोस्तों से एकदम से दूर हो जाते हैं। इसके बाद अभिभावक बच्चे को पढ़ाई के लिए सिंगल रूम दिलवा देते हैं, लेकिन इसी कमरे में वह बच्चा खुद को रिजर्व कर लेता है। अकेलेपन का शिकार हो जाता है। बच्चे के साथ क्या हो रहा है, क्या परेशानियां आ रही हैं, इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। बच्चा भी अपनी परेशानी साझा नहीं कर पाता। इसलिए उससे निरंतर संवाद रखना बेहद जरूरी है।
  • अभिभावक बच्चों को हर समय यह अहसास करवाएं कि वे भले ही पढ़ाई के लिए परिवार और दोस्तों से दूर है, लेकिन वह उनके लिए बहुत मायने रखता है। अभिभावक बच्चों को हरदम यह समझाएं कि परिवार के अलावा समाज में भी उसकी बहुत अहमियत है। 
  • अभिभावक खुलकर एक दोस्त की तरफ बच्चों के साथ बर्ताव करे। उसकी पसंद और नापसंद को जानने का प्रयास करें। 

कोटा में छात्रों की आत्महत्या के बड़े कारण
  1. पढ़ाई का दबाव
  2. कोचिंग संस्थानों में प्रतिद्वंद्वी माहौल
  3. होस्टल-पीजी का माहौल
  4. स्टडी ग्रुप का प्रेशर
  5. कोचिंग संस्थान का पढ़ाकू व तेज बच्चों पर ज्यादा ध्यान देना
  6. औसत और कमजोर बच्चों की अनदेखी करना
  7. कोचिंग क्लासेस की टाइमिंग-शेड्यूल, छुट्टियों की कमी
  8. परिवार, दोस्त और रिश्तेदार से दूरी
  9. माता-पिता या दोस्तों का दूसरे छात्रों से तुलना करना
विज्ञापन

Kota Coaching - फोटो : Amar Ujala
हॉस्टल में छठी क्लास से आ जाते हैं बच्चे, वार्डन भी ध्यान नहीं रखते
कोटा स्थित श्री अन्नपूर्णा रसोई के संचालक ओपी तिवाड़ी अमर उजाला से कहते हैं कि कोटा में हॉस्टलों की फीस बहुत ज्यादा है। छात्रों से 15000 से लेकर 40000 रुपये महीना तक लिए जाता है। एक-दो कमरे वाले मकान मालिक तो बच्चों पर थोड़ा बहुत शिकंजा लगाकर रखते हैं। बच्चों के माता-पिता भी रोज संपर्क में रहते हैं। कुछ चुनिंदा लड़कियों के हॉस्टल में भी सुरक्षा ठीक है, लेकिन ज्यादा कमरों वाले हॉस्टल की स्थिति बहुत बेकार है। बच्चा कब आ रहा है, कब जा रहा है, किसी को कुछ नहीं पता। कुछ हॉस्टल में तो वॉर्डन तक नहीं होते हैं। हॉस्टल में वॉर्डन की क्या योग्यता होनी चाहिए, इसका कोई पैमाना तय नहीं है। अगर कोई सेंसिटिव व्यक्ति या महिला अगर हॉस्टल में वॉर्डन है, तो वो अवसाद ग्रस्त बच्चे की मदद कर सकता है क्योंकि वह शाम में जाकर उसका दरवाजा खटखटाकर चेक करेगा कि वह क्या कर रहा है। कोई खाना टाइम पर नहीं खाने आ रहा है तो उस पर नजर रखेगा। इसकी सूचना वह कोचिंग वालों या माता-पिता को देगा। इसके लिए हॉस्टल वार्डन की प्रॉपर ट्रेनिंग होनी चाहिए।

तिवाड़ी बताते हैं कि कोटा में सिर्फ 12वीं पास बच्चे नहीं आते हैं, बल्कि छठी-सातवीं के भी बच्चे आते हैं। छठी सातवीं के बच्चों को यहां रखने का क्या मतलब बनता है? इस पर तो बैन लगना चाहिए। अगर यह 12वीं के बाद की परीक्षा है तो यहां से 12वीं पास के ही बच्चे होने चाहिए। बहुत सारे अभिभावक प्रतियोगी परीक्षा में अच्छे नंबर लाने की होड़ में छोटे बच्चों को कोटा लाकर किसी छोटे स्कूल में दाखिला करवा देते हैं। फिर वह बच्चे यहां तैयारी करते हैं। स्कूल की तरफ से छूट होती है कि आप स्कूल ना आइए। कोचिंग में पढ़िए। केवल एडमिशन हो जाता है और बच्चे कोचिंग में पढ़ते रहते हैं। कई बार ये ही छोटे बच्चे 12वीं क्लास के बच्चों की संगत में आकर बिगड़ जाते हैं। फिर इनका ध्यान पढ़ाई से भटक जाता है।

बढ़ती आत्महत्या पर जिला प्रशासन ने उठाया ये कदम
कोटा में छात्रों के आत्महत्या के मामलों को देखते हुए जिला प्रशासन ने कोटा के कोचिंग सेंटरों में होने वाली परीक्षाओं और टेस्ट रोकने को लेकर बड़ा फैसला किया है। कोटा प्रशासन ने जिले के सभी कोचिंग सेंटर में टेस्ट-परीक्षाओं को दो महीने तक रोक लगा दी है। कोटा जिला कलेक्टर की ओर से इस संबंध में एक पत्र जारी किया गया है। इसमें कोचिंग के लिए आए छात्रों को 'मानसिक सहायता और सुरक्षा प्रदान करने' को लेकर अहम फैसला लिया गया। 8 महीने पहले कोटा जिला प्रशासन ने कोचिंग संस्थानों के लिए एक एडवाइजरी जारी की थी। इसमें कहा गया था कि रविवार को न तो पढ़ाई होगी और न ही टेस्ट कोई होगा। इस आदेश में यह भी कहा गया था कि संडे को फन के रूप में स्टूडेंट्स एंजॉय करें, इसकी पूरी व्यवस्था कोचिंग संस्थानों को करनी होगी। लेकिन स्थिति यह है कि इस आदेश को किसी कोचिंग संस्थान ने नहीं माना। छात्रों की मदद के लिए कोटा पुलिस ने स्टूडेंट सेल बनाई है। 

हर साल कोटा में इसलिए बढ़ रहा है छात्रों का सिलसिला
कोटा में हर साल तैयारी के लिए आने वाले छात्रों का आंकड़ा बढ़ता जाता है। साल 2021-22 में यहां 1,15,000 बच्चे कोचिंग के लिए पहुंचे थे, तो वहीं 2022-23 में यह संख्या बढ़कर 1,77,439 हो गई थी। साल 2023-24 में यह आंकड़ा 2,05,000 तक पहुंच गया है। कोटा में कोचिंग इंडस्ट्री की कुल नेटवर्थ लगभग 5,000 करोड़ रुपये के करीब है। यहां लगभग 3,000 हॉस्टल, 1,800 मेस, 25,000 पीजी कमरे हैं। पिछले साल, 27 लाख भारतीय छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में बैठे और 64,610 स्थानों के लिए प्रतिस्पर्धा की। इनमें से 26 लाख से अधिक असफल रहे। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में छात्रों की संख्या में 35 से 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें