उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने सीमा क्षेत्रों का दौरा किया था। नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी भी उनके साथ थीं। सैम के एडीसी ब्रिगेडियर बहराम पंताखी अपनी किताब सैम मानेकशॉ- द मैन एंड हिज टाइम्स में लिखते हैं, "सैम ने इंदिरा गांधी से कहा था कि आप ऑपरेशन रूम में नहीं घुस सकतीं क्योंकि आपने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है। इंदिरा को तब यह बात बुरी भी लगी थी लेकिन सौभाग्य से इंदिरा गांधी और मानेकशॉ के रिश्ते इसकी वजह से खराब नहीं हुए थे।" सार्वजनिक जीवन में हंसी मजाक के लिए मशहूर सैम अपने निजी जीवन में भी उतने ही अनौपचारिक और हंसोड़ थे।
उनकी बेटी माया दारूवाला ने बीबीसी को बताया, "लोग सोचते हैं कि सैम बहुत बड़े जनरल हैं, उन्होंने कई लड़ाइयां लड़ी हैं, उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें हैं तो घर में भी उतना ही रौब जमाते होंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। वह बहुत खिलंदड़ थे, बच्चे की तरह। हमारे साथ शरारत करते थे। हमें बहुत परेशान करते थे। कई बार तो हमें कहना पड़ता था कि डैड स्टॉप इट। जब वो कमरे में घुसते थे तो हमें यह सोचना पड़ता था कि अब यह क्या करने जा रहे हैं।"
रक्षा सचिव से भिड़ंत
शरारतें करने की उनकी यह अदा, उन्हें लोकप्रिय बनाती थीं लेकिन जब अनुशासन या सैनिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच संबंधों की बात आती थी तो सैम कोई समझौता नहीं करते थे। उनके मिलिट्री असिस्टेंट रहे लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंदर सिंह एक किस्सा सुनाते हैं, "एक बार सेना मुख्यालय में एक बैठक हो रही थी। रक्षा सचिव हरीश सरीन भी वहां मौजूद थे। उन्होंने वहां बैठे एक कर्नल से कहा, यू देयर, ओपन द विंडो। वह कर्नल उठने लगा। तभी सैम ने कमरे में प्रवेश किया। रक्षा सचिव की तरफ मुड़े और बोले, सचिव महोदय, आइंदा से आप मेरे किसी अफसर से इस टोन में बात नहीं करेंगे। यह अफसर कर्नल है। यू देयर नहीं।" उस जमाने के बहुत शक्तिशाली आईसीएस अफसर हरीश सरीन को उनसे माफी मांगनी पड़ी।
मानेकशॉ को अच्छे कपड़े पहनने का शौक था। अगर उन्हें कोई निमंत्रण मिलता था जिसमें लिखा हो कि अनौपचारिक कपड़ों में आना है तो वह निमंत्रण अस्वीकार कर देते थे। दीपेंदर सिंह याद करते हैं, "एक बार मैं यह सोच कर सैम के घर सफारी सूट पहन कर चला गया कि वह घर पर नहीं हैं और मैं थोड़ी देर में श्रीमती मानेकशॉ से मिल कर वापस आ जाऊंगा। लेकिन वहां अचानक सैम पहुंच गए। मेरी पत्नी की तरफ देख कर बोले, तुम तो हमेशा की तरह अच्छी लग रही हो। लेकिन तुम इस "जंगली" के साथ बाहर आने के लिए तैयार कैसे हुई, जिसने इतने बेतरतीब कपड़े पहन रखे हैं?"
सैम चाहते थे कि उनके एडीसी भी उसी तरह के कपड़े पहनें जैसे वह पहनते हैं, लेकिन ब्रिगेडियर बहराम पंताखी के पास सिर्फ एक सूट होता था। एक बार जब सैम पूर्वी कमान के प्रमुख थे, उन्होंने अपनी कार मंगाई और एडीसी बहराम को अपने साथ बैठा कर पार्क स्ट्रीट के बॉम्बे डाइंग शो रूम चलने के लिए कहा। वहां ब्रिगेडियर बहराम ने उन्हें एक ब्लेजर और ट्वीड का कपड़ा खरीदने में मदद की। सैम ने बिल दिया और घर पहुंचते ही कपड़ों का वह पैकेट एडीसी बहराम को पकड़ा कर कहा,"इनसे अपने लिए दो कोट सिलवा लो।"
इदी अमीन के साथ भोज
एक बार युगांडा के सेनाध्यक्ष इदी अमीन भारत के दौरे पर आए। उस समय तक वह वहां के राष्ट्रपति नहीं बने थे। उनकी यात्रा के आखिरी दिन अशोक होटल में सैम मानेकशॉ ने उनके सम्मान में भोज दिया, जहां उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय सेना की वर्दी बहुत पसंद आई है और वो अपने साथ अपने नाप की 12 वर्दियां युगांडा ले जाना चाहेंगे। सैम के आदेश पर रातोंरात कनॉट प्लेस की मशहूर दर्ज़ी की दुकान एडीज खुलवाई गई और करीब बारह दर्जियों ने रात भर जाग कर इदी अमीन के लिए वर्दियां सिलीं। सैम को खर्राटे लेने की आदत थी। उनकी बेटी माया दारूवाला कहती है कि उनकी मां सीलू और सैम कभी भी एक कमरे में नहीं सोते थे क्योंकि सैम जोर-जोर से खर्राटे लिया करते थे। एक बार जब वह रूस गए तो उनके लाइजन ऑफिसर जनरल कुप्रियानो उन्हें उनके होटल छोड़ने गए।
जब वह विदा लेने लगे तो सीलू ने कहा, "मेरा कमरा कहां है?" रूसी अफसर परेशान हो गए। सैम ने स्थिति संभाली, असल में मैं खर्राटे लेता हूँ और मेरी बीवी को नींद न आने की बीमारी है। इसलिए हम लोग अलग-अलग कमरों में सोते हैं। यहां भी सैम की मजाक करने की आदत नहीं गई। रूसी जनरल के कंधे पर हाथ रखते हुए उनके कान में फुसफुसा कर बोले, "आज तक जितनी भी औरतों को वह जानते हैं, किसी ने उनके खर्राटा लेने की शिकायत नहीं की है सिवाए इनके।"
1971 की लड़ाई में
इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वह मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई कर दें लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी। इंदिरा गांधी इससे नाराज भी हुईं। मानेकशॉ ने पूछा कि आप युद्ध जीतना चाहती हैं या नहीं। उन्होंने कहा, "हां।" इस पर मानेकशॉ ने कहा, मुझे छह महीने का समय दीजिए। मैं गारंटी देता हूं कि जीत आपकी होगी। इंदिरा गांधी के साथ उनकी बेतकल्लुफी के कई किस्से मशहूर हैं। मेजर जनरल वीके सिंह कहते हैं, "एक बार इंदिरा गांधी जब विदेश यात्रा से लौटीं तो मानेकशॉ उन्हें रिसीव करने पालम हवाई अड्डे गए। इंदिरा गांधी को देखते ही उन्होंने कहा कि आपका हेयर स्टाइल जबरदस्त लग रहा है। इस पर इंदिरा गांधी मुस्कराईं और बोलीं, और किसी ने तो इसे नोटिस ही नहीं किया।"
टिक्का खां से मुलाकात
पाकिस्तान के साथ लड़ाई के बाद सीमा के कुछ इलाकों की अदलाबदली के बारे में बात करने सैम मानेकशॉ पाकिस्तान गए। उस समय जनरल टिक्का पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष हुआ करते थे। पाकिस्तान के कब्जे में भारतीय कश्मीर की चौकी थाकोचक थी जिसे छोड़ने के लिए वह तैयार नहीं था। जनरल एसके सिन्हा बताते है कि टिक्का खां सैम से आठ साल जूनियर थे और उनका अंग्रेजी में भी हाथ थोड़ा तंग था क्योंकि वो सूबेदार के पद से शुरुआत करते हुए इस पद पर पहुंचे थे। उन्होंने पहले से तैयार वक्तव्य पढ़ना शुरू किया, "देयर आर थ्री ऑलटरनेटिव्स टू दिस।" इस पर मानेकशॉ ने उन्हें तुरंत टोका, "जिस स्टाफ ऑफिसर की लिखी ब्रीफ आप पढ़ रहे हैं उसे अंग्रेजी लिखनी नहीं आती है। ऑल्टरनेटिव्स हमेशा दो होते हैं, तीन नहीं। हां संभावनाएं या पॉसिबिलिटीज दो से ज्यादा हो सकती हैं।" सैम की बात सुन कर टिक्का इतने नर्वस हो गए कि हकलाने लगे। और थोड़ी देर में वो थाकोचक को वापस भारत को देने को तैयार हो गए।
ललित नारायण मिश्रा के दोस्त
बहुत कम लोगों को पता है कि सैम मानेकशॉ की इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के एक सदस्य ललित नारायण मिश्रा से बहुत गहरी दोस्ती थी। सैम के मिलिट्री असिस्टेंट जनरल दीपेंदर सिंह एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, "एक शाम ललित नारायण मिश्रा अचानक मानेकशॉ के घर पहुंचे। उस समय दोनों मियां-बीवी घर पर नहीं थे। उन्होंने कार से एक बोरा उतारा और सीलू मानेकशॉ के पलंग के नीचे रखवा दिया और सैम को इसके बारे में बता दिया। सैम ने पूछा कि बोरे में क्या है तो ललित नारायण मिश्र ने जवाब दिया कि इसमें पार्टी के लिए इकट्ठा किए हुए रुपए हैं।
सैम ने पूछा कि आपने उन्हें यहां क्यों रखा तो उनका जवाब था कि अगर इसे घर ले जाऊंगा तो मेरी पत्नी इसमें से कुछ पैसे निकाल लेगी। सीलू मानेकशॉ को तो पता भी नहीं चलेगा कि इस बोरे में क्या है। कल आऊंगा और इसे वापस ले जाऊंगा।" दीपेंदर सिंह बताते हैं कि ललित नारायण मिश्रा को हमेशा इस बात का डर रहता था कि कोई उनकी बात सुन रहा है। इसलिए जब भी उन्हें सैम से कोई गुप्त बात करनी होती थी वह उसे कागज पर लिख कर करते थे और फिर कागज फाड़ दिया करते थे।
सैम की बेटी माया दारूवाला कहती हैं कि सैम अक्सर कहा करते थे कि लोग सोचते हैं कि जब हम देश को जिताते हैं तो यह बहुत गर्व की बात है लेकिन इसमें कहीं न कहीं उदासी का पुट भी छिपा रहता है क्योंकि लोगों की मौतें भी हुई होती हैं। सैम के लिए सबसे गर्व की बात यह नहीं थी कि भारत ने उनके नेतृत्व में
पाकिस्तान पर जीत दर्ज की। उनके लिए सबसे बड़ा क्षण तब था जब युद्ध बंदी बनाए गए पाकिस्तानी सैनिकों ने स्वीकार किया था कि उनके साथ भारत में बहुत अच्छा व्यवहार किया गया था। साल 1947 में मानेकशॉ और यहया खां दिल्ली में सेना मुख्यालय में तैनात थे। यहया खां को मानेकशॉ की मोटरबाइक बहुत पसंद थी। वह इसे खरीदना चाहते थे लेकिन सैम उसे बेचने के लिए तैयार नहीं थे।
यहया ने जब विभाजन के बाद पाकिस्तान जाने का फैसला किया तो सैम उस मोटरबाइक को यहया खां को बेचने के लिए तैयार हो गए। दाम लगाया गया 1,000 रुपए। यहया मोटरबाइक पाकिस्तान ले गए और वादा कर गए कि जल्द ही पैसे भिजवा देंगे। सालों बीत गए लेकिन सैम के पास वह चेक कभी नहीं आया। बहुत सालों बाद जब पाकितान और भारत में युद्ध हुआ तो मानेकशॉ और यहया खां अपने अपने देशों के सेनाध्यक्ष थे। लड़ाई जीतने के बाद सैम ने मजाक किया, "मैंने यहया खां के चेक का 24 सालों तक इंतजार किया लेकिन वह कभी नहीं आया। आखिर उन्होंने 1947 में लिया गया उधार अपना देश दे कर चुकाया।"