108 मंदिरों का गांव
कभी मलहूटी के नाम से जाना जाने वाला गांव अब मलूटी कहा जाता है। यहां किसी जमाने में 108 मंदिर और उतने ही तालाब थे। अब सिर्फ 72 मंदिर बचे हैं। गांव मे प्रवेश करते ही हर तरफ मंदिरों की पंक्तियां दिखती है। इनमें 58 शिव मंदिर हैं बाकी के 15 मंदिर दूसरे देवी-देवताओं के हैं। ऐसे ही एक मंदिर के पास मैं कविता चटर्जी से मिला। उन्होंने बताया कि भले ही मंदिरों की अवस्था खराब हो गई हो लेकिन गांव की महिलाएं सुबह-शाम इनमें पूजा करती हैं। इन मंदिरों में कई जगह टूटे लेकिन विशालकाय शिवलिंग हैं। इन शिवलिंगों की पूजा नहीं होती।
'पुरातत्व विभाग ले जिम्मा'
मलूटी के मंदिरों पर लंबे समय से शोध कर रहे 82 साल के गोपालदास मुखर्जी इन मंदिरों के जीर्णोद्धार के काम में भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की भागीदारी चाहते हैं। उनका मानना है कि अगर एएसआई इनका जीर्णोद्धार करे, तो मंदिरों का मूल स्वरूप कायम रह सकेगा। उन्होंने बताया कि साल 1979 में उन्होंने भागलपुर के तत्कालीन कमिश्नर अरुण पाठक से मंदिरों को एएसआई से संरक्षित कराने की मांग की थी। तब उन्होंने इसका आश्वासन भी दिया। बाद में वे बिहार के मुख्य सचिव बने तो पुरातत्व विभाग ने यहां काम भी किया। लेकिन अब एएसआई यह काम नहीं कर रही है।
सैकड़ों साल पुराने हैं मंदिर
गोपालदास मुखर्जी ने बीबीसी से कहा, "मलूटी के मंदिरों की आयु कई सौ साल पुरानी है। कोई इन्हें 16 वीं शताब्दी का बताता है, तो कई 17 वीं शताब्दी का।" "इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि यहां सबसे पहले किस मंदिर का निर्माण कराया गया और वह निर्माण कब हुआ। लेकिन, कुछ मंदिरों पर निर्माण का वर्ष अंकित है। उस आधार पर यहां सबसे पुराना मंदिर साल 1719 (शक संवत 1641) में राजा राखर चंद्र ने बनवाया था।"
वो बताते हैं, "मंदिर पर अंकित तिथि के मुताबिक इसका निर्माण जेठ (हिंदी महीना) में शुरू हुआ और अगहन (हिंदी महीना) में इसे पूरी तरह बना लिया गया।"
108 मंदिरों-तालाबों वाली धरोहर
बकौल गोपाल दास मुखर्जी, यहां के जमींदार (राजा) कई भाई थे और उनके बीच मंदिरों के निर्माण की होड़-सी लग गई थी। इस कारण इनके वंशजों ने एक-दूसरे से अधिक मंदिर बनाने को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया और एक सदी तक यह काम चलता रहा। देखते ही देखते मलूटी में 108 मंदिर और उतने ही तालाब बना दिए गए। इनमें से सबसे ऊंचा मंदिर 60 फीट और सबसे छोटा 15 फीट का है। इनमें 30 मंदिर टेराकेटा शैली के हैं। बाद के दिनों में ग्रामीणों ने आठ नए मंदिर भी बनवाए हैं।
हेरिटेज पर काम कर रही संस्था ग्लोबल हेरिटेज फंड ने साल 2010 में मलूटी के मंदिरों को दुनिया के 12 सर्वाधिक लुप्तप्राय धरोहरों की सूची में शामिल किया था। इस सूची में भारत से शामिल होने वाली यह इकलौती धरोहर है। अब झारखंड सरकार ने भी मलूटी को यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में शामिल कराने का प्रयास शुरू किया है।