इस स्थिति से बचाने के लिए वहां खड़ा संतरी उन लोगों को बीच-बीच में उठाता रहता है और वे सभी सुबह छह बजे उठ जाते हैं। वैसे उस ऊंचाई पर ठीक से नींद भी नहीं आती। वहां नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने के लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहां त्वचा इतनी नाजुक हो जाती है कि उसके कटने का खतरा काफी बढ़ जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफी समय लगता है। वहां लगभग तीन महीने सैनिक तैनात रहते हैं और उस दौरान वो बहुत ही सीमित दायरे में घूम फिर सकते हैं। संघर्ष विराम होने के कारण सैनिकों के पास वहां ज्यादा काम भी नहीं रहता और उन्हें बस समय गुजारना होता है। इसलिए जब हर तरफ सिर्फ बर्फ ही बर्फ या खाइयां हों तो ऊबना भी स्वाभाविक हो जाता है। सियाचिन पर बनी सैनिक चौकियों की जीवन रेखा के रूप में काम करती है वहां वायु सेना।
उन चौकियों पर जो हेलिकॉप्टर उतरता है उसे चीता का नाम दिया गया है। सेना का कहना है कि उन्हें जिन ऊंचाइयों पर रहना होता है वहां सिर्फ वही हेलिकॉप्टर काम कर सकता है। सबसे ऊंचाई तक जाने और सबसे ऊंचाई पर बने हेलिपैड पर लैंड करने वाले हेलिकॉप्टर का रिकॉर्ड इसी के नाम है। संघर्ष विराम से पहले सीमा के नजदीक बनी चौकियों तक हेलिकॉप्टर ले जाने में काफी सावधानी बरतनी होती थी।
चीता हेलिकॉप्टर उन चौकियों पर सिर्फ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता है। संघर्ष विराम से पहले ये इसलिए किया जाता था जिससे विरोधी पक्ष जब तक निशाना साधेगा तब तक हेलिकॉप्टर उड़ जाएगा। मगर अब भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिससे सेना किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहे। सैनिकों को दूसरी जगहों से लाकर जब सियाचिन पर तैनात किया जाता है तो उससे पहले उन्हें इतने ठंडे मौसम के अनुरूप खुद को ढालने के लिए तैयार किया जाता है। सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सिर्फ एक सैनिक ही न होकर इन परिस्थितियों में एक पर्वतारोही की तरह काम करें। मनोरंजन का भी वहां कोई साधन नहीं है। यानी पहाड़ों के बीच पहाड़ सी मुश्किलों के साथ चल रहा है सैनिकों का जीवन।