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जानें सऊदी अरब कैसे बिगाड़ सकता है मोदी के बजट का गणित

Fri, 25 May 2018 04:15 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
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शेयर बाजार में एक कहावत है कि यहां हर किसी का वक्त आता है। कभी बाजी तेजडियों (बुल रन) के हाथ लगती है तो कभी शिकंजा मंदड़ियों (बीयर रन) का कसा रहता है। ये दौर अमूमन पांच से सात साल का रहता है। यानी शेयरों से कमाई हर कोई कर सकता है, बशर्ते वो 'अपने वक्त' के हिसाब से बाजी लगा रहा हो। यही कहावत कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों पर भी लागू होती है, कमोडिटी (सोना-चांदी) और प्रॉपर्टी बाजार को लेकर भी ऐसी ही कहावतें प्रचलन में हैं।

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साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे तो सीटें तो उनकी झोली में भर-भरकर आई ही थी, आर्थिक हालात भी उनके पक्ष में झुके थे। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का दौर था। सिर्फ छह महीने पहले ही 6 जनवरी 2014 को कच्चा तेल 112 डॉलर प्रति बैरल पर था और इधर मोदी का चुनाव प्रचार भी जोरों पर था। उनकी चुनावी रैलियों में महंगाई से लेकर पेट्रोल के दाम छाये रहते थे।

मोदी का किस्मत कनेक्शन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में एक रैली के दौरान खुद को देश के लिए 'किस्मत वाला' बताया था। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल से भी कम समय में कच्चे तेल की कीमत 112 डॉलर प्रति बैरल से 53 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। बड़े स्तर पर सोशल सेक्टर में निवेश के लिए बेकरार और राजकोषीय घाटे से जूझ रही सरकार के लिए यह किसी तोहफे से कम नहीं था। विपक्ष भी इस बात को जानता था कि 90 फीसदी से अधिक तेल इंपोर्ट करने वाले देश को अगर आधी कीमत पर तेल मिलने लगे तो सरकारी खजाने के लिए कितनी राहत की बात है। शायद यही वजह थी कि विपक्ष भी कहने लगा कि ऐसा मोदी सरकार की नीतियों की वजह से नहीं हुआ, बल्कि ये मोदी की 'किस्मत' है।
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2015 में दिल्ली में हुई एक चुनावी रैली के दौरान मोदी ने विपक्षी पार्टियों को जवाब देते हुए कहा था, "ठीक है, मान लेते हैं कि मैं सौभाग्यशाली हूं, लेकिन लोगों ने पैसा बचाया या नहीं? यदि मोदी की किस्मत से लोगों का फायदा हो रहा है, इससे ज्यादा सौभाग्य की बात क्या हो सकती है। यदि मेरी किस्मत की वजह से पेट्रोल और डीज़ल के दाम कम होते हैं और लोगों को इसका फायदा होता है तो किसी अनलकी को लाने की क्या जरूरत है?"

सरकारी खजाना भी लगातार भरता गया

देखते ही देखते जनवरी 2016 तक कच्चे तेल के दाम 34 डॉलर तक लुढ़क गए। लेकिन यहां से फिर कच्चे तेल का बाजार पलटने लगा और धीरे-धीरे ही सही, लेकिन मोदी सरकार की मुश्किलें भी बढ़ने लगी और अब ये 80 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर कामकाज कर रहा है। मोदी सरकार ने कच्चे तेल की गिरावट की रैली का खूब फ़ायदा उठाया। जिस तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव थे। 

भारत में पेट्रोल पंपों पर उसका खास असर नहीं था और सरकारी खजाना भी लगातार भरता गया। इस दौरान, पेट्रोल-डीजल पर 9 बार उत्पाद कर (एक्साइज ड्यूटी) बढ़ाया गया। नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच पेट्रोल पर ये बढ़ोतरी 11 रुपये 77 पैसे और डीजल पर 13 रुपये 47 पैसे थे। जबकि कमी के नाम पर मोदी सरकार ने पेट्रोल, डीजल कीमतों में अक्टूबर 2016 में दो रुपये प्रति लीटर की एकमुश्त कटौती की थी।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री की केंद्र सरकार को मिलने वाला राजस्व लगभग तीन गुना हो गया है। लेकिन अब यही 'तेल का खेल' मोदी सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है।

कहां-कहां परेशानियां

पेट्रोल, डीजल के मुद्दे पर परेशानियां कई मोर्चों से हैं। आर्थिक मामलों के जानकार भरत झुनझुनवाला बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीरिया, ईरान, वेनेजुएला में राजनीतिक अस्थिरता तो है ही, कच्चे तेल के 75 डॉलर प्रति बैरल पर बने रहने की असल वजह है सऊदी अरब। झुनझुनवाला कहते हैं, "सऊदी अरब अपनी तेल कंपनी अरामको की शेयर बाजार में बेहतर लिस्टिंग चाहता है। अरामको दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी है। कुछ मीडिया खबरों में तो यहां तक कहा गया है कि सऊदी अरब कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल तक ले जाना चाहता है।"

हालांकि अभी अरामको के आईपीओ की कोई तारीख तय नहीं की गई है, लेकिन अटकलों का बाजार गर्म है। दूसरा, सऊदी अरब मध्य-पूर्व में अस्थिरता का फायदा उठाना चाहता है। दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज फर्म में रिसर्च हेड आसिफ इकबाल बताते हैं, "अमेरिका ने ईरान और वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं और इसका फायदा सऊदी अरब उठाना चाहता है। सऊदी अरब जानता है कि चीन और भारत से तेल की मांग में किसी तरह कमी नहीं है, इसलिए वो तेल की नियंत्रित आपूर्ति कर इस मौके को भुनाना चाहता है।"

भारत सरकार भी सऊदी अरब की तेल की ताकत से अच्छी तरह वाकिफ है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में तेल निर्यात करने वाले देशों के संगठन ओपेक के अहम सदस्य सऊदी अरब से आग्रह किया कि वो कच्चे तेल की कीमतों में कमी लाए, क्योंकि इसका भारतीय ग्राहकों और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है।

धर्मेंद्र प्रधान तेल कीमतों पर सियासत से अच्छी तरह वाकिफ होंगे। शायद यही वजह थी कि तेल कीमतों में उबाल के छीटें चुनावी नतीजों पर न दिखें, कर्नाटक चुनावों के दौरान 19 दिनों तक पेट्रोल और डीजल कीमतें स्थिर रहीं। वो भी तब जब तेल कंपनियां और मोदी सरकार ये दावा करती रही है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें सरकारी नियंत्रण से बाहर हैं और अंतरराष्ट्रीय भाव के आधार पर ही रोजाना इनकी कीमत तय होती है।
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क्या पटरी से उतर जाएगा मोदी का बजट?

मोदी सरकार ने एक फरवरी को पेश किए अपने आखिरी पूर्ण बजट में ग्रामीण इलाकों, स्वास्थ्य और किसानों के लिए बड़ी घोषणाएं की थी। कई और घोषणाओं के अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा के तहत 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपये तक के स्वास्थ्य बीमा के तहत लाने की बात कही गई। लेकिन कच्चे तेल के कीमतों से मोदी सरकार की इन घोषणाओं की चमक फीकी पड़ सकती है। आर्थिक विश्लेषक का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने और डॉलर के मुकाबले रुपये के लगातार लुढ़कने से खजाने पर बोझ पड़ेगा और राजकोषीय घाटा बढ़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज की हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत एक बार फिर ईंधन सब्सिडी की गिरफ्त में आ सकता है और मौजूदा वित्त वर्ष 2018-19 में फ्यूल सब्सिडी 53,000 करोड़ रुपये हो सकती है। अभी सरकार की योजना इस बोझ को ओएनजीसी और ऑयल इंडिया पर डालने की है। उन्हें कच्चे तेल पर सब्सिडी देने को कहा जा सकता है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर सरकारी खजाने पर ही पड़ने वाला है।
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