फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'सरोगेसी हब' बनने से हो रहा था तकनीक का दुरुपयोग, अब विधेयक से लगेगी रोक

Sat, 05 Jan 2019 04:17 PM IST
Shilpa Thakur न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
सरोगेसी
विज्ञापन

भारत में सरोगेसी तकनीक का दुरुपयोग हो रहा था जिसके चलते हाल ही में लोकसभा में सरोगेसी विधेयक को मंजूरी मिल गई है। जिसके तहत भारत में व्यसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह से रोक लग गई है। विधेयक के तहत सरोगेसी के दुरुपयोग पर इससे रोक लगाई जा सकेगी।

विज्ञापन


लगभग सवा घंटे की चर्चा में सरकार ने बिल पर 23 संशोधनों को स्वीकार किया और अंतत: लोकसभा ने सरोगेसी विनिमय विधेयक-2016 पास हुआ। हालांकि, इस विधेयक में ऐसे प्रावधान भी हैं जिससे नि:संतान दंपती सरोगेसी का सहारा ले सकेंगे। लेकिन विधेयक के पास होने के बाद से ही इसका विरोध भी जारी है। 

इस तरह हो रहा दुरुपयोग

जिस महिला के गर्भ में भ्रूण को परिपक्व होने के लिए रखा जाता है, उसकी देखभाल और गर्भावस्था के दौरान खानपान के लिए नि:संतान दंपत्ति के द्वारा कुछ आर्थिक भुगतान किया जाता है। लेकिन यह लेनदेन अब अवैध कारोबार में बदल गया है। कुछ महिलाओं ने इसे एक कारोबार का जरिया बना लिया है। 
विज्ञापन


आईवीएफ के जरिए इस कारोबार में चांदी काट रहे संस्थानों ने इसके लिए गरीब तबके की महिलाओं को उपलब्ध कराने से लेकर पूरा सौदा करने लगे हैं। यह महिलाएं अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर वे बार-बार सरोगेट मदर बनने के लिए तैयार हो जाती हैं। विशेषकर अमेरिकन और यूरोपीय निसंतान दंपत्ति भारत और नेपाल जैसे गरीब देशों में इस तरह सरोगेसी के लिए आते हैं। 

इस्राइल के लोगों की पहली पसंद भारत और नेपाल जैसे देश ही हैं। देश के भीतर एक अमीर तबका भी है। इस तबके की महिलाएं गर्भ धारण होने के बाद शरीर की सुंदरता और प्रसव पीड़ा आदि जैसी स्थिति से बचने के लिए सरोगेसी का सहारा लेती है। भारत में जगह-जगह खुले आईवीएफ सेंटर इसमें उनकी मदद करते हैं। 

20 हजार करोड़ का कारोबार

इन विदेशियों और देश के अमीर तबके के द्वारा महिलाओं को अच्छा खासा धन दिया जाता है। यही कारण है कि भारत में यह कारोबार अनुमानत: 20 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के कारण इसे रोकने की मांग की जा रही थी जिसके बाद सरकार इस पर अंकुश लगाने का विचार कर रही थी।

भारत बना सरोगेसी हब

सरोगेसी
सरोगेसी के लिए गरीब महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। बीते कुछ सालों से भारत सरोगेसी हब कहलाया जाने लगा था। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां काफी कम पैसों में किराए की कोख उपलब्ध हो जाती है। आईवीएफ सेंटर वाले इसके लिए 20 से 50 लाख रुपये तक लेते हैं लेकिन सरोगेट मदर को महज 40-50 हजार रुपये ही मिलते हैं। भारत में सरोगेसी की कीमत भी बेहद कम है। वहीं अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, थाईलैंड जैसे कई देश सरोगेसी को गैरकानूनी करार दे चुके हैं। 

अब विधेयक के आ जाने से इसमें सुधार होगा। विधेयक में सरोगेसी के संदर्भ में 'मां' को परिभाषित किया गया है। इसमें बताया गया है कि कौन लोग सरोगेसी की सेवा ले सकते हैं। इस विधेयक से महिलाओं का शोषण रोकने की दिशा में भी सहायता मिलेगी।

विधेयक में किसे है सरोगेसी की अनुमति

किराए की कोख के उन भारतीय नागरिक दंपतियों को इसकी अनुमति रहेगी, जो चिकित्सीय रूप से गर्भ धारण के योग्य नहीं हैं। ताकि नि:संतान दंपति आधुनिक तकनीक और चिकित्सीय विज्ञान के सहारे संतान का सुख पा सकें। इकलौते अभिभावक को किराए के कोख की अनुमति नहीं दी गई है। ऐसे अभिभावक के लिए विधेयक में बच्चा गोद लेने का प्रावधान रखा गया है। 

कुल मिलाकर विधेयक का उद्देश्य किराए की कोख के कारोबार को रोकना है। इसमें अप्रवासी भारतीयों को भी किराए की कोख की सुविधा लेकर संतान का सुख पाने की इजाजत दी गई है। विधेयक में साफ कहा गया है कि किराए की कोख लेने वाले दंपति को 90 दिन के भीतर प्रजनन क्षमता का प्रमाण पत्र सौंपना होगा।
विज्ञापन

क्या होंगी सरोगेट मदर की शर्तें?

demo pic - फोटो : अमर उजाला
सरोगेसी के जरिए बच्चा पैदा करने की कोशिश कर रहे दंपति में महिला की उम्र 23 से 50 साल होनी चाहिए और पुरुष की उम्र 26 से 55 साल होनी चाहिए। दंपति का भारतीय नागरिक होना जरूरी है। 

वहीं सरोगेट मां विवाहित होनी चाहिए और उसका कम से कम खुद का एक बच्चा पहले से होना चाहिए। सरोगेसी से जो बच्चा पैदा होगा उसकी परित्याग नहीं किया जा सकेगा और उसे बाकी बच्चों के समान ही अधिकार प्रााप्त होंगे। एक महिला को एक ही बार सरोगेट बनाया जा सकता है। महिला को अपना ध्यान रखने के लिए पैसे दिए जाने चाहिए। वहीं अधिक पैसा देना कमर्शियल सरोगेसी के अपराध में आ सकता है। 

सरोगेसी से संबंधित कोई भी क्लिनिक, संगठन या व्यक्ति इस संबंध में विज्ञापन, सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे का परित्याग, सरोगेट माता का शोषण या सरोगेसी के प्रयोजन के लिए भ्रूण का निर्यात नहीं करेगा। अगर कानून का उल्लंघन होता है तो इच्छुक दंपती और सरोगेट मदर को क्रमशः कम से कम 5 साल और 10 साल तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा 5-10 लाख रुपये तक के मुआवजे का भी प्रवधान रखा गया है। वहीं मेडिकल प्रैक्टिशनर अगर कानून का उल्लंघन करता है तो उसे 5 साल की सजा और 10 लाख तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।

साल 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सरोगेसी को देश में मान्यता दी थी। लेकिन जब गरीब महिलाओं का शोषण होने लगा तो साल 2016 में सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 आया। लेकिन वह पारित नहीं हो पाया था। साल 2018 में इसे संसद में दोबारा पेश किया गया, जहां से वह पारित हुआ।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें