सरोगेसी के लिए गरीब महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। बीते कुछ सालों से भारत सरोगेसी हब कहलाया जाने लगा था। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां काफी कम पैसों में किराए की कोख उपलब्ध हो जाती है। आईवीएफ सेंटर वाले इसके लिए 20 से 50 लाख रुपये तक लेते हैं लेकिन सरोगेट मदर को महज 40-50 हजार रुपये ही मिलते हैं। भारत में सरोगेसी की कीमत भी बेहद कम है। वहीं अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, थाईलैंड जैसे कई देश सरोगेसी को गैरकानूनी करार दे चुके हैं।
अब विधेयक के आ जाने से इसमें सुधार होगा। विधेयक में सरोगेसी के संदर्भ में 'मां' को परिभाषित किया गया है। इसमें बताया गया है कि कौन लोग सरोगेसी की सेवा ले सकते हैं। इस विधेयक से महिलाओं का शोषण रोकने की दिशा में भी सहायता मिलेगी।
विधेयक में किसे है सरोगेसी की अनुमति
किराए की कोख के उन भारतीय नागरिक दंपतियों को इसकी अनुमति रहेगी, जो चिकित्सीय रूप से गर्भ धारण के योग्य नहीं हैं। ताकि नि:संतान दंपति आधुनिक तकनीक और चिकित्सीय विज्ञान के सहारे संतान का सुख पा सकें। इकलौते अभिभावक को किराए के कोख की अनुमति नहीं दी गई है। ऐसे अभिभावक के लिए विधेयक में बच्चा गोद लेने का प्रावधान रखा गया है।
कुल मिलाकर विधेयक का उद्देश्य किराए की कोख के कारोबार को रोकना है। इसमें अप्रवासी भारतीयों को भी किराए की कोख की सुविधा लेकर संतान का सुख पाने की इजाजत दी गई है। विधेयक में साफ कहा गया है कि किराए की कोख लेने वाले दंपति को 90 दिन के भीतर प्रजनन क्षमता का प्रमाण पत्र सौंपना होगा।
सरोगेसी के जरिए बच्चा पैदा करने की कोशिश कर रहे दंपति में महिला की उम्र 23 से 50 साल होनी चाहिए और पुरुष की उम्र 26 से 55 साल होनी चाहिए। दंपति का भारतीय नागरिक होना जरूरी है।
वहीं सरोगेट मां विवाहित होनी चाहिए और उसका कम से कम खुद का एक बच्चा पहले से होना चाहिए। सरोगेसी से जो बच्चा पैदा होगा उसकी परित्याग नहीं किया जा सकेगा और उसे बाकी बच्चों के समान ही अधिकार प्रााप्त होंगे। एक महिला को एक ही बार सरोगेट बनाया जा सकता है। महिला को अपना ध्यान रखने के लिए पैसे दिए जाने चाहिए। वहीं अधिक पैसा देना कमर्शियल सरोगेसी के अपराध में आ सकता है।
सरोगेसी से संबंधित कोई भी क्लिनिक, संगठन या व्यक्ति इस संबंध में विज्ञापन, सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे का परित्याग, सरोगेट माता का शोषण या सरोगेसी के प्रयोजन के लिए भ्रूण का निर्यात नहीं करेगा। अगर कानून का उल्लंघन होता है तो इच्छुक दंपती और सरोगेट मदर को क्रमशः कम से कम 5 साल और 10 साल तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा 5-10 लाख रुपये तक के मुआवजे का भी प्रवधान रखा गया है। वहीं मेडिकल प्रैक्टिशनर अगर कानून का उल्लंघन करता है तो उसे 5 साल की सजा और 10 लाख तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
साल 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सरोगेसी को देश में मान्यता दी थी। लेकिन जब गरीब महिलाओं का शोषण होने लगा तो साल 2016 में सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 आया। लेकिन वह पारित नहीं हो पाया था। साल 2018 में इसे संसद में दोबारा पेश किया गया, जहां से वह पारित हुआ।