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जानिए क्या है 'इंसेफिलाइटिस' जिसकी वजह से गोरखपुर में 63 बच्चों ने तोड़ा दम

Sun, 13 Aug 2017 12:37 PM IST
amarujala.com- Presented: मोहित
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पिछले 5 दिनों के भीतर गोरखपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 63 बच्चों की सांसें थम चुकी हैं। गंभीर हो चुके इस मामले की वजह से विपक्ष सरकार के निशाने पर है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस हादसे की वजह से सीएम योगी का इस्तीफा तक मांग चुके हैं। उनका आरोप है कि अस्पताल में ऑक्सीजन की सप्लाई कम होने की वजह से बच्चों की मौत हुई है। वहीं डॉक्टर्स इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं।
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ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी है कि आखिर ये पूरा मामला है क्या? क्यों अचानक अस्पताल में इतने बच्चों को भर्ती कराया गया? असल में ऑक्सीजन न मिलने की वजह से जिन बीमार बच्चों की मौत हुई उन्हें इंसेफिलाइटिस नाम की बीमारी की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह वही बीमारी है जिसने पिछले दो दशक से गोरखपुर और पूर्वाचंल में हाहाकार मचा रखा है। सुनने में बेशक हैरतभरा लगे लेकिन हकीकत ये ही है कि दो दशक में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत इस बीमारी के कारण हो चुकी है। अैर इससे भी बड़ी हैरत ये है कि तमाम सरकारें इस बीमारी के सामने हाथ खड़े कर चुकी हैं नतीजतन इस पर आज तक काबू नहीं पाया जा सका। 
क्या है इंसेफिलाइटिस के लक्षण   इंसेफिलाइटिस नाम की इस बीमारी के फैलने के बाद शरीर पर कई तरह के इंफेक्शन सामने आने लगते हैं। इंसेफिलाइटिस, क्यूलेक्स मच्छर के काटने की वजह से होता है। इस बीमारी को 'तेज दिमागी बुखार' भी कहते हैं। मेडिकल न्यूज टुडे वेबसाइट के मुताबिक ये तेजी से बढ़ने वाली बीमारी है, जिसमें मरीज के लिए तुरंत स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत होती है। 
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इस बीमारी की चपेट में सभी उम्र के लोग चपेट में आ सकते हैं, लेकिन इस बीमारी की फैलने की सबसे ज्यादा संभावना बच्चों में होती है। वायरल इंफेक्शन की वजह से ये बीमारी बढ़ती है। कभी-कभी इस बीमारी के बढ़ने की वजह ये होती है कि खुद दिमाग का एम्यून सिस्टम दिमागी टिशूज पर हमला करने लगते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ मामलों में बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से भी ये बीमारी होती है। ये छुआछूत से फैलने वाली बीमारी नहीं है। 

क्या है जापानी इंसेफिलाइटिस
एशिया में इंसेफिलाइटिस की इस बीमारी का मुख्य प्रकार जापानी इंसेफिलाइटिस है। जो कि मच्छर से फैलने वाला वायरस है। क्यूलेक्स मच्छर से फैलने वाली इस बीमारी का वायरस डेंगू के मच्छर जैसा ही होता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक जेईवी प्राथमिक तौर पर बच्चों में फैलता है।
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इंसेफिलाइटिस के लक्षण

बच्चे के शव को ले जाते परिजन
इंसेफिलाइटिस के लक्षणों में तेज दिमागी बुखार और सिरदर्द मुख्य रूप से शामिल हैं। 250 में से 1 केस में ये बीमारी बेहद घातक हो सकती है जिसमें अचानक तेज बुखार, सिरदर्द और कोमा में भी मरीज जा सकता है। इस बीमारी की मृत्युदर 30 प्रतिशत तक है। 
  क्या है इलाज
इसके लक्षणों की वजह से एकदम से इस बीमारी को पहचानना डॉक्टर्स के लिए भी मुश्किल होता है। इंसेफिलाइटिस का पता लगने के बाद डॉक्टर्स की कोशिश ये होती है कि वो ये पता करें ये दिमागी बुखार वायरल इंफेक्शन की वजह से हुआ है या किसी और कारक से। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक वॉयरल फॉर्म में होने वाली इस दिमागी बुखार का इलाज संभव नहीं है, ऐसी स्थिति में डॉक्टर्स इसके लक्षणों का इलाज करते हैं। डॉक्टर अक्सर कारकों की वजह से स्टेरॉयड इंजेक्शन, एंटीबायोटिक्स और दर्द से छुटकारा दिलाने वाली दवाएं लिखते हैं। 

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इंडियन काउन्सिल ऑफ रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक जैपनीज इंसेफिलाइटिस वायरस की पहचान 1955 में भारत में हुई थी। जिसमें पहली बार तमिलनाडु के जिले में इस तरह का केस देखने को मिला था। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 1972 तक पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम, बिहार, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, गोवा जैसे राज्यों में ये बीमारी पांव पसार चुकी थी।

दक्षिण भारत में सामने आई ये बीमारी 16 साल के कम उम्र के बच्चों में हुई थी। वहीं उत्तर भारत में हर उम्र के लोगों को ये बीमारी हुई थी। 2012 तक इंसेफिलाइटिस के 272 मामले ओडिशा से सामने आए जिसमें 24 की मौत हुई थी। 2014 में बीमारी से 550 लोगों की मौत की खबर सामने आई।

जिसमें पश्चिम बंगाल में 102 लोगों की मौत हुई जबकि असम में 43 लोगों में हुई थी। उत्तर प्रदेश और बिहार ऐसे दो राज्यों है जिसमें हाल ही के वर्षों में ज्यादातर मामले सामने आए हैं। यही वजह से है कि इस साल उत्तर प्रदेश के 38 संवेदनशील जिलों में इस बीमारी से लड़ाई के लिए अभियान चलाया गया था।
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