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देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा को 'आपदा' मानने से इनकार क्यों?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Thu, 18 Apr 2019 02:57 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में बारिश और बिजली गिरने से मंगलवार तक 60 लोगों की मौत हो गई है। राजस्थान में बारिश से संबंधित घटनाओं से सबसे अधिक 25 लोगों की मौत हुई है। वहीं मध्यप्रदेश में 21 लोगों की मौत हो गई है। इसके अलावा गुजरात में 10 और महाराष्ट्र में 3 लोगों की मौत हुई है।

इन मौतों में कम से कम 10 ऐसी हैं जो बिजली गिरने से हुई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक एक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि खराब मौसम से होने वाली मौत में 2001 से 2014 के बीच सबसे अधिक बिजली गिरने के कारण हुई हैं। साल 2005 के बाद से हर साल करीब 2 हजार लोगों की मौत बिजली गिरने के कारण हो रही है। 



राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2015 में बिजली गिरने से 2,641 लोगों की मौत हुई है। यानि एक दिन में सात मौत। ये संख्या अन्य घटनाओं में सबसे अधिक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बाढ़ से 846, भूस्खलन से 232, भूकंप से 92, महामारी से 218, तूफान से 15 और ठंड से 1,149 लोगों की मौत हुई है। इससे पता चलता है कि भारत में सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा बिजली गिरना है।

क्या है नीति?

हालांकि भारत की वो प्राकृतिक आपदा जिसने सबसे अधिक लोगों की जान ली है, उसमें राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मुआवजा नहीं दिया जाता है। यानी जो लोग बिजली गिरने से घायल हुए हैं या जिनकी मौत हुई हैं, वो मुआवजा पाने के हकदार नहीं हैं। जबकि बाकि प्राकृतिक आपदाओं में मुआवजा दिया जाता है।

हालांकि महाराष्ट्र की तरह कुछ राज्यों में अब बिजली गिरने से घायल या मृत लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जाने लगा है। ये कदम केंद्र द्वारा राज्यों को उनके आपदा राहत कोष का 10 फीसदी राज्य में आई आपदाओं के लिए आवंटित करने के निर्देश के बाद उठाया गया। 

यूनिवर्सिटी ऑफ बर्कली का एक अध्ययन कहता है कि बिजली गिरने की घटनाएं हर साल प्रति डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से 12 फीसदी बढ़ने का अनुमान है। इसमें कहा गया है कि सदी के अंत तक बिजली गिरने की घटनाओं में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo
उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में बारिश और बिजली गिरने से मंगलवार तक 60 लोगों की मौत हो गई है। राजस्थान में बारिश से संबंधित घटनाओं से सबसे अधिक 25 लोगों की मौत हुई है। वहीं मध्यप्रदेश में 21 लोगों की मौत हो गई है। इसके अलावा गुजरात में 10 और महाराष्ट्र में 3 लोगों की मौत हुई है।

इन मौतों में कम से कम 10 ऐसी हैं जो बिजली गिरने से हुई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक एक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि खराब मौसम से होने वाली मौत में 2001 से 2014 के बीच सबसे अधिक बिजली गिरने के कारण हुई हैं। साल 2005 के बाद से हर साल करीब 2 हजार लोगों की मौत बिजली गिरने के कारण हो रही है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2015 में बिजली गिरने से 2,641 लोगों की मौत हुई है। यानि एक दिन में सात मौत। ये संख्या अन्य घटनाओं में सबसे अधिक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बाढ़ से 846, भूस्खलन से 232, भूकंप से 92, महामारी से 218, तूफान से 15 और ठंड से 1,149 लोगों की मौत हुई है। इससे पता चलता है कि भारत में सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा बिजली गिरना है।

क्या है नीति?

हालांकि भारत की वो प्राकृतिक आपदा जिसने सबसे अधिक लोगों की जान ली है, उसमें राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मुआवजा नहीं दिया जाता है। यानी जो लोग बिजली गिरने से घायल हुए हैं या जिनकी मौत हुई हैं, वो मुआवजा पाने के हकदार नहीं हैं। जबकि बाकि प्राकृतिक आपदाओं में मुआवजा दिया जाता है।

हालांकि महाराष्ट्र की तरह कुछ राज्यों में अब बिजली गिरने से घायल या मृत लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जाने लगा है। ये कदम केंद्र द्वारा राज्यों को उनके आपदा राहत कोष का 10 फीसदी राज्य में आई आपदाओं के लिए आवंटित करने के निर्देश के बाद उठाया गया। 

यूनिवर्सिटी ऑफ बर्कली का एक अध्ययन कहता है कि बिजली गिरने की घटनाएं हर साल प्रति डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से 12 फीसदी बढ़ने का अनुमान है। इसमें कहा गया है कि सदी के अंत तक बिजली गिरने की घटनाओं में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला

29 अप्रैल, 2016 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर किसी शख्स की आकाशीय बिजली गिरने से मौत होती है, तो उसे अन्य किसी प्राकृतिक आपदा से हुई मौत के तौर पर ही देखा जाए ना कि 'ऐक्ट ऑफ गॉड' की तरह। कोर्ट ने कहा था कि आकाशीय बिजली गिरना भूकंप और सुनामी आने जैसा ही है। 

कोर्ट लखविंदर सिंह नामक व्यक्ति की याचिका की सुनवाई कर रहा था। लखविंदर की गर्भवति पत्नी और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत बिजली गिरने से हो गई थी।

लखविंदर ने इसके लिए मुआवजे की मांग की थी। लेकिन उनकी मांग इस आधार पर ठुकरा दी गई कि आकाशीय बिजली गिरना चक्रवात, सूखा, तूफान, भूकंप, आगजनी, बाढ़, सुनामी, भूस्खलन जैसी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। 

कोर्ट ने इस मामले में फिर कहा कि आकाशीय बिजली को भी प्राकृतिक आपदा माना जाएगा। क्योंकि इससे सबसे ज्यादा गरीब लोग प्रभावित होते हैं, जो बारिश के समय भी काम कर रहे होते हैं। 

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

सरकार ने किया एचपीसी का गठन

वहीं योजना में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक और मानव जनित आपदाओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तरों पर आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार करने के लिए 1999 में एक उच्च शक्ति समिति (एचपीसी) का गठन किया था। एचपीसी ने पाया कि देश में 31 तरह की आपदाएं हैं। इन 31 आपदाओं को पांच भागों में बांटा गया है। 

जल और जलवायु संबंधी आपदाएं

बाढ़ और सूखा, चक्रवात, बवंडर और तूफान, ओलावृष्टि, बादल फटना, गर्म हवाएं और शीत लहर, हिमस्खलन, सूखा, समुद्री कटाव, गरज और हल्की वर्षा।

भौगोलिक संबंधित आपदाएं

भूस्खलन और कीचड़, भूकंप, बांध से होने वाली घटना और आग लगना।

रासायनिक, औद्योगिक और परमाणु संबंधी आपदाएं

इस सूची में रासायनिक, औद्योगिक और परमाणु संबंधी आपदाओं को भी शामिल किया गया।

दुर्घटना संबंधी आपदाएं

जंगलों में लगने वाली आग, शहरों में लगने वाली आग, बाढ़ से खान में तेल का रिसाव होना, प्रमुख इमारत का गिरना, सीरियल बम विस्फोट, त्योहार संबंधी आपदाएं, विद्युत आपदा और आग, हवा, सड़क और रेल दुर्घटनाएं, नाव पलटना और गांव में आग लगना।

बायलॉजिकली संबंधी आपदाएं

महामारी, कीट हमले, मवेशी महामारी और खाद्य विषाक्तता।

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