उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में बारिश और बिजली गिरने से मंगलवार तक 60 लोगों की मौत हो गई है। राजस्थान में बारिश से संबंधित घटनाओं से सबसे अधिक 25 लोगों की मौत हुई है। वहीं मध्यप्रदेश में 21 लोगों की मौत हो गई है। इसके अलावा गुजरात में 10 और महाराष्ट्र में 3 लोगों की मौत हुई है।
इन मौतों में कम से कम 10 ऐसी हैं जो बिजली गिरने से हुई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक एक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि खराब मौसम से होने वाली मौत में 2001 से 2014 के बीच सबसे अधिक बिजली गिरने के कारण हुई हैं। साल 2005 के बाद से हर साल करीब 2 हजार लोगों की मौत बिजली गिरने के कारण हो रही है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2015 में बिजली गिरने से 2,641 लोगों की मौत हुई है। यानि एक दिन में सात मौत। ये संख्या अन्य घटनाओं में सबसे अधिक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बाढ़ से 846, भूस्खलन से 232, भूकंप से 92, महामारी से 218, तूफान से 15 और ठंड से 1,149 लोगों की मौत हुई है। इससे पता चलता है कि भारत में सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा बिजली गिरना है।
क्या है नीति?
हालांकि भारत की वो प्राकृतिक आपदा जिसने सबसे अधिक लोगों की जान ली है, उसमें राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मुआवजा नहीं दिया जाता है। यानी जो लोग बिजली गिरने से घायल हुए हैं या जिनकी मौत हुई हैं, वो मुआवजा पाने के हकदार नहीं हैं। जबकि बाकि प्राकृतिक आपदाओं में मुआवजा दिया जाता है।
हालांकि महाराष्ट्र की तरह कुछ राज्यों में अब बिजली गिरने से घायल या मृत लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जाने लगा है। ये कदम केंद्र द्वारा राज्यों को उनके आपदा राहत कोष का 10 फीसदी राज्य में आई आपदाओं के लिए आवंटित करने के निर्देश के बाद उठाया गया।
यूनिवर्सिटी ऑफ बर्कली का एक अध्ययन कहता है कि बिजली गिरने की घटनाएं हर साल प्रति डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से 12 फीसदी बढ़ने का अनुमान है। इसमें कहा गया है कि सदी के अंत तक बिजली गिरने की घटनाओं में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है।