रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाला साधारण किचन स्पंज अब बड़े पर्यावरणीय खतरे के रूप में सामने आया है। प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल एडवांसेज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार बर्तन धोते समय स्पंज के घिसने से हर साल प्रति व्यक्ति 0.68 ग्राम से 4.21 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निकल सकता है, जो पानी के साथ बहकर नदियों, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला तक पहुंच रहा है।
अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि बर्तन धोने से पर्यावरण पर पड़ने वाले कुल प्रभाव में बड़ा योगदान माइक्रोप्लास्टिक के साथ पानी की अत्यधिक खपत भी है, जो कुल प्रभाव का 85 से 97 प्रतिशत तक हिस्सा बनाती है। अध्ययन में सामने आया है कि किचन स्पंज उपयोग के दौरान धीरे-धीरे घिसता है और इसी प्रक्रिया में प्लास्टिक के अत्यंत सूक्ष्म कण निकलते हैं, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये कण इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन पानी के साथ बहकर नालों, नदियों और मिट्टी में पहुंच जाते हैं।
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अंततः ये खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर मानव शरीर तक भी पहुंच सकते हैं। वैज्ञानिकों ने पहले ही मानव रक्त और शरीर के विभिन्न अंगों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के प्रमाण पाए हैं, जिससे इस अदृश्य प्रदूषण को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
हर साल कई टन माइक्रोप्लास्टिक मिलता है पानी में
जर्मनी और उत्तरी अमेरिका के कई घरों में वास्तविक परिस्थितियों में अध्ययन किया गया, जहां पता चला कि यदि बर्तन को अधिक जोर से रगड़कर धोया जाता है, तो स्पंज तेजी से घिसता है और अधिक कण निकलते हैं। जब इसे बड़े स्तर पर जोड़ा जाता है तो यह हर साल कई टन माइक्रोप्लास्टिक के रूप में पर्यावरण में फैलती है।