मेरठ के ईलम सिंह 97 साल के हो चुके हैं। आजादी के आंदोलन से लेकर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन तक में वे सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। जब किसानों का मुद्दा सामने आया तो खुद को आंदोलन में कूदने से नहीं रोक सके। चाय और लगातार जल रहे अलाव के सहारे उनकी रात जागते हुए बीत रही है। वे कह रहे हैं कि या तो सरकार से अपनी बातें मनवाकर जाएंगे या यहीं यूपी बॉर्डर पर शहीद होकर जाएंगे। शनिवार को पूरी रात जारी रही बारिश और कड़ाके की ठंड भी इस उम्र में उनका जज्बा कमजोर नहीं कर सकी है।
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वाहनों में इस तरह रातें गुजार रहे किसान
- फोटो : अमर उजाला
बात ईलम सिंह जैसे बुजुर्गों की ही नहीं है। मंशा केवल 9 साल की हैं। वह पांचवीं कक्षा में पढ़ती हैं। अपने पिता के साथ किसान आंदोलन में भाग लेने आई हैं। वे कहती हैं कि सरकार को किसानों की मांगें माननी चाहिए, जिससे उनके पिता को इतनी कमाई हो सके कि वे उन्हें अच्छी शिक्षा दे सकें और उनके भाइयों-बहनों का पेट भर सकें। उसके सीमांत किसान और मजदूर पिता बताते हैं कि वह मजदूरी कर किसी तरह पैसे इकट्ठे कर खेती में लगाते हैं, लेकिन खेत में उगी फसलों को बेचकर भी मजदूरी का यह पैसा वापस नहीं आता। इससे उन्हें बहुत तकलीफ होती है। बुजुर्गों की दी हुई खेती है अगर खेत नहीं बोए जाएंगे तो उनकी बदनामी होगी, इसी लाज से खेती कर रहे हैं, अन्यथा वे ये घाटे की खेती करना ही छोड़ देते। उनकी उम्मीद है कि सरकार ऐसा कुछ करे कि वे सम्मान से अपनी जिंदगी गुजार सकें।
बारिश ने बढ़ाई परेशानी
दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में शनिवार रात से बारिश का दौर शुरू हुआ था जो रविवार दिन भी जारी रहा। बारिश के कारण तापमान गिरकर एक-दो डिग्री तक पहुंच गया है और ठंड बहुत ज्यादा बढ़ गई है। आंदोलनकारी किसान सड़कों पर टेंट लगाकर उनमें बिस्तर बिछाकर रातें गुजार रहे थे, लेकिन ज्यादातर टेंट में पानी भर गया है। बिस्तरों को पानी से बचाने के लिए उन्हें समेटकर एक जगह इकट्ठा कर दिया गया है। ऐसे में किसानों के लिए बैठने तक की जगह नहीं बची है। इससे किसानों को भारी परेशानी हो रही है, लेकिन इस परेशानी में भी किसानों का आंदोलन का जज्बा बरकरार है।
टेंट के अंदर बिस्तरों को भीगने से बचाने के लिए इकट्ठा कर दिया गया
- फोटो : अमर उजाला
फ्लाईओवर के नीचे ली शरण
कुछ किसान फ्लाईओवर के नीचे शरण लेकर बारिश से बचने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ ने वाहनों में ही टेंट लगा दिया है। जगह-जगह पर अलाव जला दिए गए हैं, जिसके सहारे ठंड से बचने की कोशिश की जा रही है। बिस्तरों को बारिश में भीगने से बचाने की पूरी कोशिश की जा रही है। मौसम की यह परेशानी किसानों का जोश कमजोर नहीं कर सकी है। वे अब भी अपने आंदोलन और अपनी मांगों पर लंबे समय तक टिके रहने के लिए सड़कों पर डटे हैं।
बारिश व ठंड जिंदगी का हिस्सा
उत्तराखंड के किसान सतवीर सिंह कहते हैं कि वे पूरी-पूरी रातें जागकर बारिश में अपने खेतों में फसलों की सिंचाई करते रहे हैं। इसी तरह जागकर अपने फसलों को जंगली जानवरों से बचाते रहे हैं। इसलिए इस तरह की ठंड और बारिश में जिंदगी काटने का उनका अनुभव नया नहीं है, लेकिन यह परेशानी सरकार की मुश्किलें बढ़ाएगी। अगर सरकार जल्द से जल्द किसानों की बात नहीं मानती है तो किसान आंदोलन को उसकी नाक के नीचे, दिल्ली तक ले जाएंगे और उसकी नींद हराम कर देंगे। किसान इसके लिए पूरी तरह से तैयार हो चुके हैं।
कम पड़ रहीं अलाव के लिए लकड़ियां
ट्रैक्टर की ट्रालियों में प्लास्टिक कवर डालकर टेंट का आकार दे दिया गया है। इससे बारिश के पानी का असर कुछ कम हो गया है। इनमें पुआल और अन्य घास डालकर गर्म बना दिया गया है। इन्हीं पर बैठकर या सोकर किसानों का आंदोलन जारी है। कुछ किसानों की शिकायत है कि जलाने के लिए लकड़ियों का कुछ इंतजाम गाजियाबाद नगर.निगम से किया जा रहा है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं हो रहा है क्योंकि यहां दिन-रात अलाव जल रहे हैं। किसानों की निगम से मांग है कि यूपी बॉर्डर पर ज्यादा लकड़ियां भेजी जाएं, जिससे किसानों को ठंड से बचाया जा सके।
बारिश में भी नहीं रुके भाषण
बारिश के कारण काफी किसान इधर-उधर हो गए हैं, लेकिन इस बारिश के बीच भी किसानों का भाषण, नारेबाजी और सरकार के खिलाफ आक्रोश कायम है। यूपी बॉर्डर के मुख्य धरना स्थल पर इस समय भी 11 किसान भूख हड़ताल पर हैं और कुछ लोग अपने दूसरे किसान भाइयों को आंदोलन की बारीकियां समझा रहे हैं। किसानों का कहना है कि यह कानून वापस लेने तक उनका जोश कमजोर नहीं पड़ेगा। चाहे बारिश पड़ती रहे या ओले पड़ते रहें, वे कानून खत्म कराए बिना यहां से वापस नहीं जाएंगे।
भोजन व चाय-नाश्ते का पूरा इंतजाम
आंदोलनकारी किसानों के लिए लंगर चला रहे हरमीत सिंह ने बताया कि कोई भी फौज भूखे पेट आंदोलन नहीं लड़ सकती। लिहाजा इस बारिश में भी लंगरों की व्यवस्था बरकरार रखी जा रही है। सुबह से लेकर शाम तक लोगों के लिए भोजन, चाय, नाश्ते का पूरा प्रबंध किया जा रहा है। उनका कहना है कि किसानों के आंदोलन के लिए वे तब तक आंदोलन में डटे रहेंगे जब तक सरकार किसानों को संतुष्ट कर उन्हें उनके घर वापस नहीं भेज देती।