पश्चिम बंगाल का संदेशखाली बीते कुछ हफ्तों से चर्चा में है। इस मामले में राजनीति भी खूब हो रही है। इन सबके बीच वहां के लोगों को साथ हो रहे अत्याचार की कई कहानियां सामने आईं हैं। इनका केंद्र टीएमसी नेता शेख शाहजहां है। जो बीते करीब डेढ़ महीने से फरार है। इसी मुद्दे पर इस हफ्ते की खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रेम कुमार और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
हर्षवर्धन त्रिपाठी: मणिपुर में जो हुआ वह शर्मशार करने वाला था। संदेशखाली में जो हुआ वह भी शर्मशार करने वाला है। पश्चिम बंगाल में जो कुछ भी हुआ है वह एक काला धब्बा है। इस मामले में एक महिला मुख्यमंत्री जिस तरह का बयान देती हैं वह भी बहुत ही निंदनीय है। एक टीएमसी का नेता महिलाओं को बुला लेता है। उठा लेता है। जिसमें पुलिस शामिल होती है। सबसे पीड़ा देने वाली बात है इस पूरे मामले में वहां के एसपी की हरकत है।
समीर चौगांवकर: ममता बनर्जी के राज में जो घटना घटी है, उतना घटिया और घृणित काम बंगाल में वाम सरकार के वक्त भी नहीं हुआ। ममता बनर्जी शाहजहां शेख को बचा रही हैं, आज तक शाहजहां शेख को पकड़ा नहीं जा सका है। एक छोटा सा नेता इतना बड़ा गुंडा बन जाता है। क्या यह सब वह बिना सरकारी संरक्षण के कर सकता था। कांग्रेस और भाजपा इसमें राजनीति कर रही होंगी, लेकिन यह घटना ऐसा काला धब्बा है जिससे ममता बनर्जी अपना पीछा नहीं छुड़ा सकती हैं। आने वाले चुनाव में ममता बनर्जी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
रामकृपाल सिंह: सत्ता का चरित्र होता है कि वह हमेशा देखती है कि यह अपराधी का चेहरा है या मतदाता का चेहरा है। चाहे मणिपुर हो या बंगाल हो। बंगाल में जब भी सत्ता हस्तांतरण होता है, वहां साथ में हिंसा का भी हस्तांतरण भी होता है, लेकिन हिंसा का इतना बर्बर स्वरूप नहीं देखा गया। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का इस घटना से सिर शर्म से झुकेगा।
प्रेम कुमार: जो घटना घटी है उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है। जहां कहीं भी इस तरह की घटना घटती है, हम उसे कैसे देखते हैं यह भी समझना होगा। इस घटना को जिस तरह से मुगलों से जोड़ा जा रहा है। शाहजहां से जोड़ा जा रहा है यानी इसे हिन्दू-मुस्लिम करने की कोशिश हो रही है, वह भी गलत है। संदेशखाली में हुई घटना के लिए ममता बनर्जी कसूरवार हैं। एक घटना निश्चित रूप से गलत है। यह एक बहुत ही घृणित और क्रोध पैदा करने वाली घटना है।
विनोद अग्निहोत्री: चाहे संदेशखाली हो, मणिपुर हो या राजस्थान की घटनाएं हो, सभी निंदनीय, दंडनीय और दर्दनाक हैं, लेकिन उनकी तुलना करना पूरी तरह से गलत है। किसी भी महिला मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि महिला उत्पीड़न के मामले में इस तरह का स्टैंड लेगी। इस मामले में ममता बनर्जी को अपने मुस्लिम वोट बैंक चिंता है। वहीं, दूसरी ओर भाजपा को भी अपने दलित वोटबैंक की चिंता है। इसे किसी समुदाय विशेष से जोड़ने के बजाय इसे महिला उत्पीड़न के तौर पर ही देखना चाहिए। इस तरह की घटनाएं अब सामने आ रही हैं। लेकिन, इनका लंबा इतिहास है। जिस तरह से बृजभूषण शरण सिंह को पॉस्को से बचाया गया वहां भाजपा को अपने वोटबैंक की चिंता थी। यहां पर ममता बनर्जी को अपने वोटबैंक की चिंता है। मुझे लगता है कि इस तरह के मामलों पर ऐसी राजनीति भी निंदनीय है। चाहे वो किसी भी पक्ष की ओर से हो रही हो।
अनुराग वर्मा: भारतीय राजनीति की विडंबना है कि मेरी गलती पकड़ी जाएगी तो मैं दूसरे की गलती बताऊंगा। और दूसरे की गलती पकड़ी जाएगी तो वह पहले वाले की बताएगा। ममता बनर्जी कभी लेफ्ट के लोगों को गुंडा कहकर बुलाती थीं। लेकिन, जैसे ही सत्ता ममता के पास आई। वो सभी लोग ममता के साथ आ गए। यानी, आपका कैडर ही उन गुंडों बदमाशों का बन गया। यही चीज हमने समाजवादी पार्टी की सरकार में उत्तर प्रदेश में देखी थी। जिस तरह से बंगाल में पारदर्शिता का अभाव है वह जैसे-जैसे खुलेगी तो कई चीजें सामने आएंगे।