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खबरों के खिलाड़ी: 'शेल कंपनी की तरह बन गया इंडिया गठबंधन'; क्या करेंगे राहुल, अब क्या होगी अखिलेश की भूमिका?

Sat, 22 Nov 2025 09:06 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

The Future of Anti-BJP India Alliance: नीतीश कुमार का अलग होना इंडिया गठबंधन के लिए निर्णायक क्षण था। इसके बाद नजरें राहुल गांधी पर थीं, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार हुआ था, लेकिन फिर हालात बदलते चले गए। जानिए कैसे...
 
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खबरों के खिलाड़ी - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कुछ समय विपक्षी खेमे में खामोशी रही, लेकिन बाद में अलग-अलग सुर सामने आने लगे। सवाल यह है कि भविष्य में इंडिया गठबंधन अस्तित्व में रहेगा या नहीं? अगर अस्तित्व में रहता है तो इसके नेतृत्व की कमान राहुल गांधी के पास ही रहेगी या अखिलेश यादव अथवा ममता बनर्जी इसकी कमान संभालेंगे? समाजवादी पार्टी चाहती है कि इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की जिम्मेदारी अब अखिलेश यादव को सौंपी जानी चाहिए। वहीं, 2026 में बंगाल के नतीजे ममता की भूमिका तय करेंगे। इसी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए 'खबरों के खिलाड़ी' में इस बार राजनीतिक विश्लेषक विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, अनुराग वर्मा और राकेश शुक्ल मौजूद रहे। 

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क्या इंडिया गठबंधन अब राहुल गांधी पर भरोसा नहीं करना चाहता?
अवधेश कुमार: यह गठबंधन उसी दिन खत्म हो गया, जब नीतीश कुमार इसे छोड़ गए थे। शरद पवार इस गठबंधन का हिस्सा थे, लेकिन उनकी पार्टी एनसीपी ही टूट गई। यह गठबंधन केवल चर्चा में ही था। राहुल गांधी भारत की बदली हुई राजनीति के लिए योग्य नजर नहीं आते। राहुल गांधी की पूरी राजनीति कांग्रेस के आत्म-विनाश की राजनीति है। जब तक राहुल गांधी के हाथ में विपक्ष की कमान रहेगी, तब तक देश में सकारात्मक विपक्ष खड़ा नहीं हो सकेगा। तेजस्वी यादव को बिहार में जो कुछ हासिल हो सकता था, वह भी राहुल ने होने नहीं दिया। बिहार की राजनीति ने साफ कर दिया कि मुसलमानों को अगर विकल्प मिलेगा तो वो कांग्रेस का साथ नहीं देंगे। कांग्रेस की ताकत अब खत्म हो गई है। 

राकेश शुक्ला: नीतीश कुमार और ममता बनर्जी, ये दो इंडिया गठबंधन के संस्थापक सदस्य रहे। दोनों अलग हो गए। अरविंद केजरीवाल भी इससे अलग हो गए। फिर यह धारणा बन गई कि इस गठबंधन का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं। हालांकि, गठबंधन के अंदर इस बात की कभी चर्चा नहीं हुई। इंडिया गठबंधन ने राहुल का नेतृत्व कभी स्वीकार नहीं किया। 99 लोकसभा सीटें लाने के बाद भी उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं किया गया।
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समीर चौगांवकर: 2023 में जब इंडिया गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो यह लग रहा था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ हर सीट पर इंडिया गठबंधन का एक संयुक्त उम्मीदवार होगा, लेकिन फिर हालात बदले। नीतीश कुमार जब गठबंधन से अलग हो गए, तो यह विपक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका था। इस बार बिहार में महागठबंधन को कई सीटों पर आपस में ही दोस्ताना मुकाबला लड़ना पड़ा। बिहार के जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस उनके लिए फायदेमंद है या मजबूरी है। अब क्या बंगाल में ममता और तमिलनाडु में स्टालिन कांग्रेस को तवज्जो दे पाएंगे?

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घटक दलों में क्या फर्क नजर आता है? 
अनुराग वर्मा: इंडिया गठबंधन उस शेल कंपनी की तरह है, जिसका काम सिर्फ साल में एक बार आयकर रिटर्न दाखिल करने का होता है। घटक दलों की राजनीति दिलचस्प रही है। लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव जमीन से जुड़े नेता थे। मुलायम सिंह 10 साल बाद भी किसी से मिलते थे, तो उन्हें उसके गांव, परिवार के बारे में सब याद रहता था। नीतीश कुमार भी ऐसे ही नेता हैं। राहुल गांधी इस मामले में अलग हैं। वे जनता से कटे-कटे रहते हैं। राहुल चुनाव से चार दिन पहले आते हैं और एक मुद्दा उछालकर टाइगर सफारी चले जाते हैं। अब एनडीए ने विपक्ष को सिखा दिया है कि वोट कैसे मिलेंगे। वोट जनता के बीच जाकर ही मिलेंगे।

चुनावों में राहुल गांधी शुरुआत में मेहनत करते नजर आते हैं, लेकिन फिर कहां चूक हो जाती है? 
विनोद अग्निहोत्री: राहुल गांधी मेहनत ज्यादा करते हैं, लेकिन फिर अचानक कहीं चले जाते हैं। हालांकि, उन्हें पार्ट टाइम राजनेता कहना ठीक नहीं है। समस्या उनकी कार्यशैली को लेकर है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन सुधारा, लेकिन उसका श्रेय राहुल गांधी को नहीं मिल पाता। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अगर सपा और कांग्रेस साथ चुनाव नहीं लड़ते तो सपा को 10 सीटें बमुश्किल मिल पातीं। लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में तो कांग्रेस का प्रदर्शन राजद के मुकाबले अच्छा रहा था। बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एक पहलू यह है कि राहुल गांधी ने उतना प्रचार नहीं किया। दूसरा पहलू यह है कि तेजस्वी यादव को प्रोजेक्ट करने से जंगलराज का मुद्दा हावी हो गया। बिहार में तो विपक्ष ने सारा दांव तेजस्वी पर ही लगाया था। जहां तक इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की बात है, तो वह राष्ट्रीय गठबंधन है। राष्ट्रीय स्तर पर हुए गठबंधन का नेतृत्व राष्ट्रीय दल ही कर सकता है, क्षेत्रीय दल नहीं।

सपा चाहती है अखिलेश यादव और तृणमूल चाहती है कि ममता बनर्जी गठबंधन का नेतृत्व करे?
अवधेश कुमार: 2004 में वामपंथी दलों और समाजवादी पार्टी की वजह से कांग्रेस देश में सत्ता में आई थी। जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है, तो वहां जिस मतदाता को भाजपा के विरोध में वोट करना होगा, तो वह किस पार्टी के पक्ष में मतदान करेगा? 2024 में उत्तर प्रदेश में यही हुआ और वहां सपा को सीटें मिलीं। सपा में भी उतनी ही समस्या है, जितनी कांग्रेस में है। 

राकेश शुक्ला: 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जो भी विधानसभा चुनाव हुए, उनमें अलग तरह के समीकरण बने। क्षेत्रीय दलों ने यह रणनीति बनाई कि उन्हें मजबूत दिखना होगा। सपा और तृणमूल चाहती है कि इंडिया गठबंधन में कांग्रेस उनके नेतृत्व में नजर आए, न कि वे कांग्रेस के नेतृत्व के अधीन दिखें।

समीर चौगांवकर: 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होंगे। इससे भी पहले 2026 में पश्चिम बंगाल के चुनाव होंगे। अगर बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता कायम रहेगी, तो इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने की उनकी दावेदारी पुख्ता होगी। सपा और तृणमूल में फर्क है। बंगाल में तृणमूल अपने दम पर चुनाव लड़ती है। उसे वहां कांग्रेस की जरूरत नहीं है। अखिलेश के सामने चुनौती 2027 की है। वे कांग्रेस की मदद के बिना चुनाव नहीं जीत पाएंगे। सपा के मुस्लिम-यादव समीकरण को वहां भाजपा के साथ-साथ ओवैसी से भी खतरा है।

अनुराग वर्मा: अभी सपा और तृणमूल ने अपना-अपना पासा फेंक दिया है, लेकिन आगे जाकर नेतृत्व तो कांग्रेस के पास ही रहेगा। इंडिया गठबंधन के घटक दलों के सामने दो ही रास्ते हैं- या तो राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करें या फिर अपना रास्ता अलग कर लें। हालांकि, ममता बनर्जी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की तुलना में ज्यादा मजबूत नेता हैं। 
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विनोद अग्निहोत्री: क्या कभी एनडीए का नेतृत्व चंद्रबाबू नायडू कर पाएंगे? जवाब है- नहीं। ऐसा ही इंडिया गठबंधन में भी है। अगर 2026 में ममता बनर्जी बंगाल में फिर जीत जाती हैं, तो उनका दावा मजबूत होगा। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह किसी भी बड़े राजनीतिक परिवार से नहीं आते। वे यहां तक अपनी मेहनत से और अपने दम पर पहुंचे हैं। बाकी कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर बड़े दल का नेतृत्व किसी न किसी परिवार के पास है। इस वजह से अखिलेश यादव की तुलना में ममता का दावा मजबूत रहेगा। 2024 के लोकसभा चुनाव से सपा को संजीवनी जरूर मिली है। इस वजह से अखिलेश यादव की प्राथमिकता उत्तर प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाने की होगी। इसके बाद ही वे इंडिया गठबंधन की फिक्र करेंगे।

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