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खबरों के खिलाड़ी: यूपी में राज्यसभा चुनाव बना 'शक्ति प्रदर्शन', अखिलेश के किस 'मास्टर स्ट्रोक' से गरमाई सियासत

Sat, 03 Oct 2026 05:02 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश में 16 अक्तूबर को होने जा रहे 10 सीटों के राज्यसभा चुनाव महज उच्च सदन की नुमाइंदगी तक सीमित न होकर आगामी राजनीतिक लड़ाइयों का बड़ा शक्ति परीक्षण बन गए हैं। अमर उजाला के विशेष कार्यक्रम 'खबरों के खिलाड़ी' में देश के प्रमुख वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने आज इस चुनाव के सियासी समीकरणों और दूरगामी प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण किया।
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विनोद अग्निहोत्री: धनराज नथवानी की उम्मीदवारी कॉरपोरेट जगत की एक अहम सिग्नलिंग है। देश के बड़े औद्योगिक घराने अब विपक्ष के साथ भी अपने रास्ते खुले रखना चाहते हैं, जो यह दर्शाता है कि विपक्ष मजबूत हो रहा है। इसके साथ ही, अखिलेश यादव अपनी पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) छवि के साथ-साथ कॉरपोरेट-फ्रेंडली संदेश भी देना चाहते हैं कि सपा के सत्ता में आने पर उद्योग जगत के हित सुरक्षित रहेंगे। सपा और कांग्रेस आगामी चुनावों के लिए अपने तालमेल को बेहतर कर रहे हैं।

समीर चौगांवकर: 10 सीटों के इस गणित में सात सीटें भारतीय जनता पार्टी और दो सीटें समाजवादी पार्टी के लिए लगभग तय मानी जा रही हैं, क्योंकि प्रत्येक सीट के लिए 37 प्रथम वरीयता वोटों की आवश्यकता है। असली मुकाबला 10वीं सीट को लेकर है, जहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपनी पिछली हार और विधायकों के टूटने का हिसाब चुकता करना चाहते हैं।

सपा की ओर से रामगोपाल यादव के साथ-साथ दूसरा प्रत्याशी धनराज नथवानी को बनाना एक चौंकाने वाला 'मास्टर स्ट्रोक' है। एनडीए और भाजपा से जुड़ाव रखने वाले पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट देकर अखिलेश ने सभी को हैरत में डाल दिया है। इसके अलावा, अखिलेश यादव की नजरें रालोद के असंतुष्ट विधायकों और सुभासपा (ओपी राजभर की पार्टी) के उन विधायकों पर टिकी हैं जो मूलतः सपा के चिह्न पर चुनाव लड़े थे।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: राज्यसभा चुनाव हमेशा से शक्ति प्रदर्शन और धन-बल के सामंजस्य का प्रतीक रहे हैं। यादव परिवार का कॉरपोरेट घरानों से संबंध कोई नया नहीं है; मुलायम सिंह यादव के दौर में भी 'इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट काउंसिल' के जरिए बड़े उद्योगपतियों को जोड़ा गया था। इस चुनाव का संदेश केवल यहीं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक हवा का रुख भी तय करेगा।
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