बीते हफ्ते दो बयानों पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। एक आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिया तो दूसरा उसी बयान के जवाब में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिया। राहुल के बयान पर हंगामा मचा हुआ है। भाजपा उनके बयान को देश के खिलाफ खुली जंग का एलान बता रही है। वहीं, राहुल गांधी संघ प्रमुख पर देशद्रोह का आरोप लगा रहे हैं।
इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
अवधेश कुमार: देश में किसी भी संगठन का प्रमुख यह कहता है कि हमारे देश को आजादी 15 अगस्त 1947 को आजादी नहीं मिली तो उसके विरोध में बात होगी। इसी तरह अगर संविधान की शपथ लेने वाला कोई भी व्यक्ति अगर यह कहेगा कि उसकी लड़ाई इंडियन स्टेट के विरुद्ध है तो उसका भी विरोध होगा ही। हमें यह देखना होगा कि क्या मोहन भागवत ने ऐसा कहा कि 15 अगस्त 1947 को आजादी नहीं मिली। उनके बयान को आप देखेंगे तो पता चलेगा कि ऐसा नहीं है।
राकेश शुक्ल: लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी एक चिप लेकर चले संघ, संविधान और अदाणी। अब दिल्ली चुनाव में भी जब वो प्रचार करने पहुंचे तो उस संविधान और अदाणी से बाहर नहीं निकल पाए। राहुल गांधी जो सकारात्मक संदेश देना चाहते थे वो नकारात्मक संदेश में बदल गया। सबसे बड़ा विषय यह है कि राहुल गांधी कुछ और बोलते हैं। कांग्रेस किसी और रास्ते पर चलती है।
विनोद अग्निहोत्री: उनको शब्दों के चयन में सावधानी बरतनी चाहिए। अक्सर उनके साथ इस तरह की गलती हो जाती है। देश का कोई भी नेता भारत के खिलाफ नहीं हो सकता है, ये बात मैं मानता हूं। राहुल गांधी अपनी भाषा में सुधार करें, अपने शब्दों के चयन में सुधार करें। उसके साथ ही 1947 में मिली आजादी को अधूरी या झूठी कहने वालों को भी अपने में सुधार लाना होगा। इस देश का मानस अतिवाद के खिलाफ है ये सभी को समझना होगा। चाहे वो अतिवाद दक्षिणपंथ का हो, वामपंथ हो, मुस्लिम अतिवाद हो या हिंदुत्व का अतिवाद हो। देश का मानस हर अतिवाद के खिलाफ है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: यह सच है कि राहुल गांधी जब भाषण देते हैं तो उत्साह में कई बार शब्दों का गलत चयन कर लेते हैं, लेकिन वो जो कहना चाह रहे थे कि उसमें कोई एंबिगुटी नहीं थी। 1947 में मिली आजादी को कम करने आंकना भी सही नहीं है। स्व की लड़ाई में दूसरी लड़ाई को कमतर करके नहीं आंका जा सकता है।
रामकृपाल सिंह: यह विचारधाराओं का टकराव है। ये टकराव हमेशा से रहा है। किसी भी जीवंत समाज में विचारधाराओं टकराना एक प्रक्रिया है। राजनीति में आपको बहुत सहज और सरल होना चाहिए। आपकी भाषा ऐसी होनी चाहिए जैसे बच्चे के मुंह में आइसक्रीम। राहुल गांधी के साथ यह समस्या है। कई बार संस्कृतनिष्ठ होने की कोशिश में राहुल गांधी यह कर जाते हैं।