पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद से ममता बनर्जी की पार्टी में भगदड़ है। पहले विधायकों ने बगावत की। उसके बाद सांसदों ने भी बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। वहीं, दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन की दिल्ली में हुई बैठक में ममता बनर्जी भी नजर आईं। एक तरफ उनके और सोनिया गांधी के गले मिलने की तस्वीर ने सुर्खियां बटोरी। दूसरी तरफ टीएमसी और एनसीपी के कांग्रेस में विलय की अटकलें भी सुर्खियों में हैं। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, समीर चौगांवकर, मिहिर रंजन और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
पीयूष पंत: जिस तरह से ममता और सोनिया की मुलाकात हुई है। वो राजनीतिक रूप से एक बड़ा संदेश था। उसके बाद जो मीटिंग हुई थी विपक्षी गठबंधन की उसका मुख्य मुद्दा यही था कि किस तरह हम सब मिलकर लड़ाई लड़ेंगे। संविधान और डेमोक्रेसी को बनाए रखने के लिए ये जरूरी है कि फेडरलिज्म बना रहे। जिस तरह बैठक में सोनिया, ममता और मेहबूबा मुफ्ती को बैठाया गया था वो भी एक तरह से सदेंश देने की कोशिश थी। एक ऐसे वक्त में जब आपके विधायक-सांसद सभी छोड़कर जा रहे हैं, उस वक्त में कोई आपके कंधे पर हाथ रखे तो ये बड़ी बात है।
अनुराग वर्मा: अगर आप इस गठबंधन की बात करें तो इसमें ज्यादातर वो पार्टियां है जहां परिवारिक लड़ाई में पार्टियां हाशिये पर हैं। जिस तरह की स्थिति शरद पवार, लालू यादव जैसे परिवारों की पर्टियों में हुआ वैसा ही कुछ ममता के साथ हो रहा है। ये गठबंधन मजबूरी का गठबंधन है। सबको ये लग रहा है कि शायद कांग्रेस हमारा बेड़ा पार लगा दे।
समीर चौगांवकर: कांग्रेस को अब लग रहा होगा कि छोटे दलों को साथ ले आया जाए। शरद पवार की स्थिति खराब है तो उनका विलय कर लिया जाए। ममता की स्थिति खराब है तो उन्हें अपने साथ कर लिया जाए। हालांकि, दोनों पक्षों की ओर से ऐसा कोई बयान नहीं आया। मुझे लगता है ममता बनर्जी अभी विलय के विकल्प पर विचार नहीं करेंगी। उनकी कोशिश होगी कि बशीरहाट लोकसभा सीट पर होने वाले उप-चुनाव में अपनी ताकत लगाने की होगी। इसी तरह अखिलेश यादव भी अब कांग्रेस को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है।
मिहिर रंजन: ये स्थिति इसलिए चर्चा में है कि ममता बनर्जी का वजूद खत्म हो सकता है। इसलिए मजबूरी में आपको ये लगता है कि आप कांग्रेस के साथ आएंगे तो आपको ज्यादा ताकत मिलेगी। मुझे लगता है कि ये हारे को हरिनाम वाली स्थिति है। जब हारे हुई स्थिति में योद्धा जुटते हैं तो मतदाता को भी समझ में आता है। वोटर बहुत स्मार्ट है। इस तरह के गठबंधन से आप अगर सोचते हैं कि भाजपा का मुकाबला कर सकते हैं तो ये गलत है।
विनोद अग्निहोत्री: गठबंधन दो तरह के होते हैं। एक सत्ता का गठबंधन और दूसरा संघर्ष का गठबंधन। 1974 में जेपी आंदोलन के वक्त जो गठबंधन हुआ वो संघर्ष का गठबंधन था। 2024 का जो गठबंधन विपक्षी दलों का हुआ वो मुकम्मल गठबंधन नहीं था। इसके बावजूद ये गठबंधन भाजपा को 240 सीटों पर ले आया था। अब आगे आपकी परीक्षा होगी कि आप राज्यों में कार्यकर्ताओं की एकता कैसे होगी। दूसरी तरफ एनडीए का गठबंधन सत्ता का गठबंधन है। दोनों तरफ मजबूरियां हैं। एक तरफ सत्ता की मजबूरी और दूसरी तरफ संघर्ष की मजबूरी है। परिवार की राजनीति इस देश में खत्म नहीं हो रही है। बस उसकी भूमिका बदल रही है। हमारे देश में परिवार हमारे मानस में है।