चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस पूरे हफ्ते सुर्खियों में रहे। कारण वह रिपोर्ट रही जिसके मुताबिक चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने बिना उचित बैठकों, एजेंडा या मिनट्स के लिए गए फैसलों पर अपनी लिखित आपत्तियां बीते 10 महीने में 14 बार दर्ज कराई। इसके बाद से विपक्ष ज्ञानेश कुमार की इस्तीफे की मांग कर रहा है। इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।
पूर्णिमा त्रिपाठी: यह पहली बार नहीं हुआ है कि राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर बात की है। वह अपने हिसाब से महाराष्ट्र के चुनाव के बाद भी कुछ लेके आए थे। हरियाणा की वोटर लिस्ट में हुई गड़बड़ियों के खुलासे किए थे, लेकिन उनकी बात पर बहुत ज्यादा ध्यान चुनाव आयोग या किसी और ने नहीं दिया। इस बार के जो खुलासे हुए हैं, वह चुनाव आयोग के अधिकारियों की आपत्तियों पर आधारित हैं। इस बात का तो कोई कहीं खंडन नहीं आया है कि जो भी उस रिपोर्ट में कहा गया है वह गलत है। इस पर तो चुनाव आयोग को सिर्फ एक प्रेस रिलीज ना जारी करते हुए सामने आकर सफाई देनी चाहिए थी। राहुल गांधी इस मुद्दे को छोड़ने वाले नहीं है। वह तो इस चीज को लेकर आगे जाएंगे ही। लेकिन, सफाई जरूर आनी चाहिए, क्योंकि सरकार की क्रेडिबिलिटी दांव पर है। और बाहर से ही नहीं सरकार के अपने सहयोगियों ने भी इस पर सवाल उठा दिया है। मेरे ख्याल से अब इस मामले को ऐसे आसानी से यह रफादफा नहीं किया जा सकता है।
राकेश शुक्ल: सवाल तो यह है कि फॉर्म सिक्स में जो बदलाव किया गया वो तो सरकार का काम है। तो सरकार के काम को चुनाव आयोग ने कैसे कर दिया? फिर गोवा वाला जो 97 वोटरों का नाम जोड़ने की मांग मामला आ रहा है कि वह नहीं जुड़ पाए। वह इसलिए नहीं जुड़ पाए क्योंकि सारा का सारा अधिकार तो सीमित कर दिया गया दिल्ली पर, तो जो स्टेट का डिस्ट्रिक्ट के जो चुनाव प्रक्रिया चुनाव कार्य में लगे हुए लोगों के पास जो अधिकार था वो सब निर्भर हो गए दिल्ली पर। दिल्ली जिसको चाहेगा जोड़ेगा, जिसको चाहेगा हटाएगा।
ज्ञानेश कुमार जब आए उसी दरमियान सीमा खन्ना भी आईं। उसके बाद जो टेक्नोलॉजी का काम हुआ वो स्पीड पकड़ा और इतना स्पीड पकड़ लिया कि कंट्रोल के बाहर हो गया। एक-एक, दो-दो महीने में एसआईआर कर दे रहे हैं। जो ईआरओ हैं उनके पास कोई अधिकार नहीं बचा। वो बेचारे दिल्ली का मुंह ताक रहे हैं। ऐसा नहीं कि विसंगतियां नहीं है। स्पष्टता तब आएगी जब तीनों व्यक्ति सामने साथ बैठ कर बोलेंगे। यह भी सही है कि 14 आपत्ति आईं। यह स्पष्ट करना चाहिए कि हां आपत्तियां आई थीं। इन आपत्तियों के आधार पर हमने यह सुधार किया और उसके बाद हमने मतलब सहमति बनाई, तीनों लोगों ने यह फैसला किया है। जब आप सामने नहीं आ रहे, आप प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं, तो इसका मतलब आपकी भूमिका और संदेहास्पद होती जा रही है।
विनोद अग्निहोत्री: टीएन शेषन और ज्ञानेश कुमार की अप्रोच में थोड़ा फर्क है। टीएन शेषन ने चुनाव प्रणाली को क्लीन किया। उन्होंने पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट जो है उसका कड़ाई से पालन किया। उन्होंने उसमें कोई फेरबदल नहीं किया। ये जो रिपोर्ट है ये एक अखबार की रिपोर्ट है। उस अखबार की रिपोर्ट का बिंदुवार खंडन जिस तरह होना चाहिए वो चुनाव आयोग की तरफ से नहीं आया। बल्कि एक तरह से उसकी स्वीकृति होती दिखी। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कोई भी फैसला कोई एक चुनाव आयुक्त नहीं ले सकता। होगा बहुमत से या आमसहति से होगा। सुप्रीम कोर्ट भी इसे स्पष्ट कर चुका है। इसलिए सवाल है।
राहुल गांधी इस मामले को ज्ञानेश कुमार तक सीमित नहीं कर रहे हैं। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस देखिए वो तो कह रहे हैं ज्ञानेश कुमार अप्रूवर बन जाए। वो इस मामले को और आगे ले जा रहे हैं। वो इसको राजनीतिक मुद्दा बनाना चाहते हैं, सरकार के खिलाफ।