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Khabaron Ke Khiladi: प्रज्ज्वल से बृजभूषण तक, दागियों पर पार्टियां मेहरबान क्यों? बता रहे हैं खबरों के खिलाड़ी

Sat, 04 May 2024 05:01 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बीते हफ्ते कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के बेटे और पोते पर लगे यौन शोषण के आरोप सुर्खियों में रहे। वहीं, हफ्ता खत्म होने से पहले महिला पहलवानों के साथ यौन शोषण के आरोपी निर्वतमान सांसद बृजभूषण शरण सिंह का टिकट कटना भी चर्चा में रहा। इन सबके बीच यह भी सवाल उठे कि क्या राजनीति में नैतिकता की बात बेमानी होती जा रही है? 
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खबरों के खिलाड़ी में प्रज्ज्वल रेवन्ना और बृजभूषण से जुड़ी राजनीति पर चर्चा - फोटो : amar ujala graphics
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विस्तार
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लोकसभा चुनाव में दो चरण का मतदान हो चुका है। अगले चरणों से पहले उम्मीदवार तय किए जा रहे हैं। नेताओं के पार्टी बदलने का सिलसिला चल रहा है। वहीं, दागदार नेता भी सुर्खियों में हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या राजनीति में सबकुछ सिर्फ वोट बैंक को देखकर तय होता है? इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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सवाल- क्या सब कुछ वोट बैंक देखकर तय होता है?

समीर चौगांवकर: मुझे लगता है कि वोट बैंक का ही मामला रहता है। संदेशखाली के मुद्दे के बाद जिस तरह से इसे भाजपा ने इसे उठाया, उसके बाद बृजभूषण शरण सिंह को टिकट देने से भाजपा की तरफ से गलत संदेश जाता। भाजपा बृजभूषण की जगह प्रतीक भूषण को टिकट देना चाहती थी, जो अभी भाजपा के विधायक हैं, लेकिन बृजभूषण अपने दूसरे बेटे करण भूषण को टिकट देने पर अड़े थे।  

विनोद अग्निहोत्री: सारे राजनीतिक दलों के अंदर दोहरे मानदंड हैं। मेरी कमीज सफेद, तुम्हारी दागदार। कांग्रेस हो, भाजपा हो या दूसरी कोई पार्टी, सभी राजनीतिक दल महिलाओं के प्रति अपराध को लेकर दोहरा मापदंड अपनाते हैं। बृजभूषण शरण के मामले में मेरा मानना है कि भाजपा नेतृत्व की ओर से चूक हुई है। 
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अवधेश कुमार: कर्नाटक में जो घटना हुई है, उस मामले में सभी दलों को विरोध करना चाहिए। वहीं, बृजभूषण शरण सिंह के मामले में मेरा मनना है कि अगर पार्टी को लगता है कि उनके ऊपर लगे आरोपों में सच्चाई नहीं है तो भाजपा को साहस के साथ बृजभूषण को ही टिकट देना चाहिए था। वहीं, अगर पार्टी उन्हें दोषी मानती है तो उनके साथ-साथ उनके परिवार के भी किसी सदस्य को टिकट नहीं देना चाहिए था। 

अनुराग वर्मा: चुनाव के समय पार्टियां सारे आरोप किनारे रखकर सिर्फ जीत और हार को देखती हैं। यह बताता है कि हम महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर कितने संजीदा हैं। भ्रष्टाचार का मामला हो या महिला अपराध का मामला हो, बड़े-बड़े नेता जेल गए। यहां तक कि दोषी साबित होने के बाद भी उनकी राजनीति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। हमारा समाज ही इस तरह के आरोपी नेताओं को जिताकर भेजता है। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: बृजभूषण की जगह उनके बेटे को टिकट देकर भाजपा किस तरह का संदेश दे रही है? पार्टी डबल इंजन मैजिक की बात करती है। उसके बाद भी बृजभूषण शरण सिंह के सामने भाजपा ने आत्मसमर्पण क्यों किया, यह सोचना चाहिए?

रामकृपाल सिंह: राजनीति में होता है साम-दाम-दंड-भेद, जीत किसी भी कीमत पर। वहां, नैतिकता को ढूंढना बेमानी है। राजनीतिक दलों में हम-आप जरूर नैतिकता ढूंढते हैं, लेकिन पार्टियों में कोई नैतिकता को नहीं देखता है। चुनिंदा वर्ग की नैतिकता और व्यापक वर्ग की नैतिकता में छत्तीस का आंकड़ा होता है। भाजपा या कांग्रेस कोई भी हो, राजनीतिक दल अपनी जीत की कीमत पर नैतिकता की बात करेंगे, मैं यह नहीं मानता हूं।
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