यह फैसला शिकायतकर्ता आरएस शशिकुमार की याचिका पर आया है, जिन्होंने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद ने लोक सेवक के रूप में अपने पद का गलत इस्तेमाल किया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि वे निजी हित और भ्रष्ट उद्देश्यों से प्रेरित हैं और भ्रष्टाचार, पक्षपात और भाई-भतीजावाद के दोषी हैं।
इस साल मार्च में लोकायुक्त न्यायमूर्ति सिरियाक जोसेफ और न्यायमूर्ति हारुन-उल-राशिद ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया था, क्योंकि इस बात को लेकर उनके बीच मतभेद था कि क्या मामले के गुण-दोष को लेकर भी मंत्रिपरिषद के फैसलों की जांच की जा सकती है। लोक आयुक्त ने जनवरी 2019 में शिकायत स्वीकार कर ली थी।
शशिकुमार की शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राकांपा नेता दिवंगत उझावूर विजयन, माकपा के पूर्व विधायक दिवंगत के के रामचंद्रन नायर और सिविल पुलिस अधिकारी प्रवीण के परिवार को कोष से वित्तीय सहायता मंजूर करने में 'पक्षपात' किया गया। शिकायतकर्ता ने कोष के दुरुपयोग के लिए मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों को अयोग्य ठहराने की मांग की थी।