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Kerala High Court: कैदियों को पारिवारिक शादियों के लिए भी मिलेगी छुट्टियां, भतीजे-भानजे में भेदभाव असंवैधानिक

Wed, 07 Jan 2026 04:38 PM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, तिरुवनंतपुरम

सार

केरल उच्च न्यायालय ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि जेल में बंद कैदियों को आपातकालीन छुट्टी देने में भाई और बहन के बच्चों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पुरानी व्याख्या को असंवैधानिक बताते हुए सभी जेल अधीक्षकों को नए निर्देश जारी किए हैं।
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केरल उच्च न्यायालय (फाइल) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी बंदी को आपातकालीन अवकाश देते समय उसके भाई और बहन की संतानों के बीच कोई भेद नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि अब कैदी अपने भाई के बच्चों (भतीजे-भतीजी) के विवाह समारोह में भी सम्मिलित हो सकेंगे। न्यायालय ने कहा कि जेल प्रशासन की वर्तमान व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है।
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क्या था मामला?
यह प्रकरण कन्नूर केंद्रीय जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक कैदी से जुड़ा है। मामले में कैदी के भतीजे ने अदालत में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने जेल अधीक्षक को अपने चाचा की शादी में शामिल होने के लिए दस दिन की आपातकालीन छुट्टी का जो आवेदन दिया था। जेल प्रशासन ने नियमों का हवाला देते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद पीड़ित पक्ष ने उच्च न्यायालय का रुख किया।

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न्यायालय ने कहा नियमों की हो रही गलत व्याख्या
न्यायालय ने पाया कि केरल कारागार एवं सुधारात्मक सेवा (प्रबंधन) नियम, 2014 के नियम 400 (1) (ii) के अंतर्गत आने वाले मलयालम शब्द 'प्रत्यक्ष भतीजा' और 'प्रत्यक्ष भतीजी' की गलत व्याख्या की जा रही है। इसमें केवल बहन के पुत्र और पुत्री को ही शामिल किया जा रहा है। न्यायालय ने कहा कि ऐसी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है।
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न्यायालय ने जारी किया आदेश
न्यायालय ने कहा कि नियम 400 अच्छे आचरण वाले बंदियों को असाधारण परिस्थितियों में आपातकालीन छुट्टी का प्रावधान करता है। इसमें बेटे, बेटी, भाई, बहन और पोते-पोती की शादी शामिल है। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि बहन की संतानों और भाई की संतानों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। अगर बंदी नियम 400 की अन्य शर्तें पूरी करता है, तो उसे अपने भाई के बच्चों के विवाह में शामिल होने के लिए भी अवकाश दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि इस निर्णय की प्रति राज्य के सभी कारागार अधीक्षकों को भेजी जाए, ताकि भविष्य में ऐसी विसंगति न हो।

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