केरल हाईकोर्ट के समक्ष सात साल के बच्चे की लिंग चयनात्मक सर्जरी की याचिका लेकर पहुंचे माता-पिता की याचिका खारिज हो गई। अपनी याचिका में माता-पिता ने अपने बच्चे को एक महिला या लड़की के रूप में बड़ा करने के लिए जननांग पुनर्निर्माण सर्जरी की अनुमति मांगी थी। याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि नाबालिग पर गैर-सहमति वाली यह सर्जरी बच्चे की गरिमा, गोपनीयता का उल्लंघन करेगी।
अदालत ने बच्चे के स्वास्थ्य पर माता-पिता की चिंताओं पर विचार किया और कहा कि विधिवत गठित मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के आधार पर आवश्यक हस्तक्षेप किया जा सकता है। न्यायमूर्ति वी जी अरुण ने सात अगस्त को जारी एक आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति के लिंग या पहचान चुनने के अधिकार में हस्तक्षेप करना उस व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करेगा और इससे उसकी गरिमा और स्वतंत्रता का अपमान होगा।
जस्टिस वीजी अरुण की सिंगल जज बेंच ने सरकार से तीन महीने के भीतर शिशुओं और बच्चों पर लिंग चयनात्मक सर्जरी को विनियमित करने के लिए एक आदेश जारी करने का भी आह्वान किया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक ऐसा आदेश जारी नहीं किया जाता है, तब तक ऐसी सर्जरी केवल राज्य स्तरीय बहुविषयक समिति की राय पर ही की जाएगी कि बच्चे के जीवन को बचाने के लिए यह आवश्यक होगा।
बच्चे को 'जन्मजात एड्रेनल हाइपरप्लासिया' का पता चला था और उसका इलाज चल रहा था। डॉक्टरों ने बच्चे के लिए जेनिटल रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की सलाह दी। बच्चे के माता-पिता इस बात से व्यथित थे कि बहुत विशेषज्ञों से संपर्क करने के बावजूद, कोई भी डॉक्टर सक्षम न्यायालय के आदेश के बिना सर्जरी करने के लिए तैयार नहीं था। इसके बाद उन्होंने कैरियोटाइप रिपोर्ट-46XX पर भरोसा करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। जिसमें उन्होंने बताया कि वह अपने बच्चे को लड़की के रूप में बड़ा करना चाहते हैं।
लेकिन केरल हाईकोर्ट ने इस सर्जरी को बच्चे की गरिमा और गोपनीयता का उल्लंघन बताया और आदेश में कहा कि इस तरह की अनुमति देने से गंभीर भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। किशोरावस्था में पहुंचने पर अगर बच्चा अपने लिंग के अलावा दूसरे लिंग की तरफ आकर्षित हुआ तो क्या होगा, इसके लिए कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड की स्थापना की है जिसकी रिपोर्ट के आधार पर ही आगे का फैसला तय होगा।