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केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला: मेडिकल तरीके से गिराया जा सकेगा 31 हफ्ते का भ्रूण, अदालत ने इन आधारों पर दी अनुमति

Sat, 31 Jan 2026 03:53 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि (केरल)

सार

केरल हाईकोर्ट ने एक दंपती को 31 हफ्ते के भ्रूण का गर्भपात कराने की अनुमति दी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर भ्रूण जीवित जन्म लेता है, तो अस्पताल उसे जीवित रखने के लिए सभी जरूरी मदद देगा। भ्रूण की असामान्य स्थिति की रिपोर्ट पर गौर करते हुए कोर्ट ने यह अनुमति दी। पढ़ें रिपोर्ट-
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केरल हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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केरल हाईकोर्ट ने एक दंपती राहत दी है। कोर्ट ने उनके 31 हफ्ते से अधिक समय के भ्रूण का चिकित्सकीय गर्भपात कराने की अनुमति दी। यह भ्रूण दिमाग और सिर से जुड़ी जन्मजात गंभीर विकृतियों से पीड़ित है। 
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मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा?
जस्टिस शोभा अन्नम्मा ईप्पन ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर गर्भपात की इजाजत दी। बोर्ड ने राय दी थी कि अगर बच्चे का जन्म होता है तो वह गंभीर शारीरिक विकृतियों से ग्रस्त होगा। मेडिकल बोर्ड ने यह भी कहा कि गर्भावस्था को आगे बढ़ाना महिला के मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

कोर्ट ने मामले के तथ्यों, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, इस विषय से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों और मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों पर विचार किया। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि यदि गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई, तो इससे केवल नतीजे में देरी होगी और परिवार की तकलीफ और बढ़ेगी।
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कोर्ट ने कोट्टायम मेडिकल कॉलेज को दिया निर्देश
कोर्ट ने कोट्टायम मेडिकल कॉलेज को गर्भपात कराने का निर्देश दिया। कोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को तुरंत एक मेडिकल टीम गठित करने और प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा। कोर्ट ने कहा, मेडिकल टीम अपने विवेक और सर्वोत्तम निर्णय के अनुसार चिकित्सा विज्ञान में सुझाई गई सबसे उचित प्रक्रिया अपनाएगी, ताकि गर्भपात किया जा सके और पहली याचिकाकर्ता (महिला) की जान बचाई जा सके। 

'गर्भपात से अंतिम स्कैन कर दोबारा की जाए पुष्टि'
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि गर्भपात से पहले अंतिम स्कैन कर भ्रूण की विकृतियों की दोबारा पुष्टि की जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर भ्रूण जीवित जन्म लेता है, तो अस्पताल उसे जीवित रखने के लिए सभी आवश्यक सहायता देगा, जिसमें इन्क्यूबेशन और किसी भी सुपर-स्पेशलिटी में इलाज शामिल है। कोर्ट ने कहा, बच्चे को सर्वोत्तम चिकित्सा उपचार दिया जाएगा और याचिकाकर्ता पति-पत्नी बच्चे की पूरी जिम्मेदारी लेंगे तथा इलाज का खर्च भी वहन करेंगे।
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याचिकाकर्ता ने कोर्ट को क्या बताया था?
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया था कि भ्रूण दिमाग और सिर की जन्मजात विकृतियों से पीड़ित है, जिनमें माइक्रोसेफली जैसे लक्षण शामिल हैं, जिससे गंभीर और जीवनभर रहने वाली शारीरिक व न्यूरोलॉजिकल विकलांगता की आशंका बहुत अधिक है।

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