केरल विधानसभा ने सोमवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें देश में विभाजनकारी ताकतों के प्रयासों का मुकाबला करने और उन्हें हराने और भारत को एक लोकतांत्रिक सामाजिक गणराज्य के रूप में बनाए रखने की दिशा में काम करने की बात की गई है। देश की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में सदन में आयोजित विशेष एक दिवसीय सम्मेलन के दौरान प्रस्ताव पेश किया गया और पारित किया गया। इसके साथ ही 10 दिवसीय विधानसभा सत्र की शुरुआत भी की गई जिसे केरल के राज्यपाल की मंजूरी के अभाव में 8 अगस्त को समाप्त हुए राज्य सरकार के 11 अध्यादेशों के मद्देनजर बुलाया गया है।
'स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को हटाने का प्रयास'
इस दौरान मुख्यमंत्री और विधानसभा में विपक्ष के नेता वी डी सतीसन दोनों ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन से कई स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को हटाने का प्रयास किया जा रहा है और यह सामूहिक रूप से हमारी जिम्मेदारी है कि ऐसे प्रयासों का विरोध करें। सम्मेलन की शुरुआत अध्यक्ष एम बी राजेश के भाषण से हुई, जिन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह विश्लेषण और मूल्यांकन करने का अवसर भी है कि क्या पिछले 75 वर्षों में आम आदमी स्वतंत्रता, न्याय, समानता और भाईचारे के संवैधानिक वादे का अधिकार हासिल कर पाया है।
उन्होंने कहा कि अभी संवैधानिक वादों को देश में भारी वित्तीय असमानताओं, भाईचारे के विचार के खात्मे और कई अन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राजेश ने विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों और प्रतिरोध आंदोलनों के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि डॉ. बी आर अंबेडकर ने कहा था कि स्वतंत्रता, न्याय, समानता और भाईचारा, ये सभी आवश्यक हैं और इनमें से कोई भी एक-दूसरे के बिना मौजूद नहीं रह सकता।
वहीं, मुख्यमंत्री ने कहा कि देश में मौजूदा स्थिति की मांग है कि हम सभी धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, समानता और स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखने और उनकी रक्षा करने के लिए कड़ा संघर्ष करें, जो स्वतंत्रता सेनानियों के सपने थे। सतीसन ने कहा कि हालांकि थोड़ी देर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को किनारे करने के प्रयास किए जा रहे हैं और उन्हें दूसरों के साथ बदलने का प्रयास हो रहा है।