गिरजाघरों से संबंधित मामले में केरल उच्च न्यायालय द्वारा शीर्ष अदालत के फैसले और आदेश के साथ छेड़छाड़ से नाराज उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि केरल भारत का ही अंग है और वहां की अदालतें शीर्ष अदालत द्वारा घोषित व्यवस्था का पालन करने के लिए बाध्य हैं।
शीर्ष अदालत ने केरल उच्च न्यायालय और सभी दीवानी अदालतों को शीर्ष अदालत के 2017 के फैसले का उल्लंघन करते हुए कोई भी आदेश पारित करने से रोक दिया है। इस फैसले में न्यायालय ने अपनी व्यवस्था में कहा था कि 1934 के मालनकारा गिरजाघर के संविधान और दिशानिर्देशों के अनुरूप ही प्रार्थना सभा की जाएगी।
शीर्ष अदालत ने 2017 के इस फैसले में प्रशासन के अधिकार और गिरजाघरों में प्रार्थना को लेकर दो धड़ों के बीच विवाद के संदर्भ में अपनी व्यवस्था दी थी। न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार शीर्ष अदालत द्वारा घोषित कानून सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी हैं और अनुच्छेद 144 के तहत भारत की सीमा के भीतर दीवानी और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में काम करेंगे।
पीठ ने छह सितंबर को पारित अपने आदेश में कहा, केरल भारतीय सीमा के भीतर होने के कारण सभी फैसले मानने लिए बाध्य है। हमारी मंशा गिरजाघर में शांति कायम करने की थी, परंतु इस न्यायालय द्वारा प्रतिपादित कानून का उल्लंघन करते हुए ऐसे आदेश पारित किए जाने की वजह से कानून का कभी भी पालन नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा, यह फैसले और आदेश के उल्लंघन के समान है। उच्च न्यायालय (केरल) ने इस न्यायालय के फैसले और आदेशों का उल्लंघन करते हुए अंतरिम आदेश पारित किए हैं। शीर्ष अदालत ने केरल उचच न्यायालय का अंतरिम आदेश निरस्त कर दिया जिसमें कहा गया था कि गिरजाघरों में प्रार्थना सभाओं का आयोजन मलानकारा गिरजाघर के दोनों प्रतिद्वन्द्वी गुट बारी-बारी से करेंगे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय को उसके फैसले और आदेशों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने का अधिकार नहीं है क्योंकि वे बाध्यकारी हैं और हर कीमत पर न्यायिक शुचिता बनाकर रखनी होगी।