लेकिन केजरीवाल की असली राजनीति दिल्ली से' होती है। केजरीवाल जानते हैं कि यदि उनका दिल्ली का किला सुरक्षित रहता है तो बाकी देश की राजनीति साधने में उन्हें बहुत ज्यादा परेशानी नहीं आएगी। लेकिन दिल्ली की राजनीति सुरक्षित रहे, इसके लिए उन्हें दिल्ली की जनता के बीच ईमानदार और लोकप्रिय बने रहना होगा। इसके लिए वे स्वयं रविवार 22 सितंबर को दिल्ली की 'जनता की अदालत' में पेश होंगे और अपनी बेगुनाही का सबूत पेश करेंगे। आम आदमी पार्टी को भरोसा है कि जंतर-मंतर पर होने वाली इस रैली से आम आदमी पार्टी दिल्ली में अपनी धमक सिद्ध करने में सफल रहेगी।
मंत्रिमंडल को जनता की स्वीकृति
जनता की अदालत के लिए 22 सितंबर की तारीख को भी बहुत सोच समझकर रखा गया है। 20 सितंबर को केजरीवाल रोड शो करेंगे। 21 सितंबर को आतिशी मारलेना अपने मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेंगी। 22 सितंबर को जंतर मंतर पर होने वाली जनता की अदालत में आतिशी मारलेना अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ उपस्थित रह सकती हैं। इस जनता की अदालत के जरिए इस मंत्रिमंडल को जनता की स्वीकृति दिलाने की कोशिश की जाएगी।
अब केजरीवाल मुख्यमंत्री न होकर सरकार चलाने में दिशा निर्देश देंगे। भाजपा उन्हें सुपर सीएम बताने की कोशिश अभी से कर रही है। आतिशी मार्लेना को वह पहले ही डमी सीएम करार दे रही है। यही कारण है कि आतिशी को जनता की अदालत से स्वीकृति मिलने से आतिशी और केजरीवाल दोनों की छवि को मजबूत करने की कोशिश इस कार्यक्रम के जरिए की जाएगी।
कुर्सी की तुलना में 'त्याग' को महत्त्व
राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि सुपर सीएम रहते हुए अरविंद केजरीवाल एक मुख्यमंत्री की सुख-सुविधाएं भले न ले सकें, लेकिन वे मुख्यमंत्री से कहीं ज्यादा पॉवरफुल होकर उभर सकते हैं। इसके जरिए वे पहले से ज्यादा लोकप्रिय होकर उभर सकते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में कहीं ज्यादा मजबूत भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस देश की जनता का चरित्र ऐसा रहा है कि वह कुर्सी पर बैठने वाले नेता की तुलना में 'त्याग' करने वाले नेता को कहीं ज्यादा महत्त्व देती रही है।
महात्मा गांधी से लेकर सोनिया गांधी और बाला साहब ठाकरे तक इस तरह के अनेक उदाहरण भारतीय राजनीति में देखे जा सकते हैं। केजरीवाल कितनी सफलता हासिल कर पाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। हालांकि, यह भी सच है कि शराब घोटाले में जिस तरह के प्रमाण एजेंसियों ने अदालत के सामने रखे हैं, वे आने वाले दिनों में केजरीवाल के सामने बड़ी मुश्किल पैदा कर सकते हैं।
आप सूत्रों के अनुसार, जंतर-मंतर पर जनता की अदालत कार्यक्रम में दिल्ली, हरियाणा और पंजाब से भारी संख्या में कार्यकर्ताओं को लाकर पार्टी शक्ति प्रदर्शन करेगी। इसके जरिए वह आम जनता के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में भी उत्साह भरने की कोशिश करेगी जो शराब घोटाले के आरोपों के बाद मायूस होकर अपने घरों में शांत होकर बैठे हैं।
हरियाणा में बढ़त से मिलेगा आत्मविश्वास
आम आदमी पार्टी ने हरियाणा में कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अब केजरीवाल की पार्टी अकेले दम पर हरियाणा के चुनावी मैदान में उतर चुकी है। यदि केजरीवाल हरियाणा के चुनाव में अपना पैर जमाने में सफल रहते हैं तो इसका असर दिल्ली की राजनीति पर भी होगा। पार्टी इसका लाभ महाराष्ट्र में भी लेने की कोशिश करेगी। लेकिन यदि आम आदमी पार्टी यहां सफल नहीं होती है तो भाजपा-कांग्रेस यही प्रचारित करने की कोशिश करेंगे कि जनता ने शराब घोटाले में फंसे अरविंद केजरीवाल को नकार दिया। लिहाजा पार्टी इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है।
हम दिखाने के लिए चुनाव नहीं लड़ रहे
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने अमर उजाला से कहा कि उनकी पार्टी चुनावों के प्रति बेहद गंभीर है। वे चुनाव में जीत के लिए उतर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में कुरुक्षेत्र की केवल एक सीट से चुनाव लड़ने के बाद भी पांच लाख से ज्यादा वोट हासिल करना बताता है कि पार्टी के लिए हरियाणा में असीम संभावनाएं मौजूद हैं। यदि ऐसा होता है तो आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की उम्मीदों को पंख लग जाएंगे।