कठुआ में सेना के वाहन पर जिस तरीके से हमला हुआ है, आतंकियों ने वैसा अटैक पहले भी कई बार किया है। जेकेपी की इंटेलिजेंस इकाई से जुड़े सूत्रों का कहना है, इस तरह के हमलों से आतंकियों का दुस्साहस बढ़ रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि उन्हें कामयाबी मिलती है। वे सेना के वाहन पर हमले की प्लानिंग इस तरह से करते हैं, जिसमें जवानों को जवाबी कार्रवाई का अवसर बहुत कम मिल पाता है। कठुआ हमला और मई में पुंछ के शाहसितार इलाके में वायुसेना के वाहन पर अटैक, इनके लिए एक जैसी रणनीति बनाई गई थी।
गत वर्ष दिसंबर में सुरनकोट में सेना के काफिले पर आतंकियों ने हमला किया था। इसमें पांच जवान शहीद हो गए थे। उस हमले में अमेरिकी एम-4 कार्बाइन असॉल्ट राइफल और स्टील बुलेट का इस्तेमाल किया गया। राजौरी के कंडी जंगलों में बनी गुफाओं में छिपे आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में भी सेना के पांच जवानों ने शहादत दी थी। इन हमलों में पहले आईईडी ब्लास्ट और फिर घात लगाकर जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की गई। लोकल आतंकी समूह, पीएएफएफ के प्रवक्ता तनवीर अहमद राथर ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली थी। पीएएफएफ ने इन हमलों का एक वीडियो भी जारी किया था। उसमें कहा गया कि वे, सुरक्षाबलों को अपने ट्रैप में फंसा रहे हैं। वे जैसा चाहते हैं, सुरक्षा बलों को वैसा ही करने के लिए मजबूर कर देते हैं। उस वक्त यह बात सामने आई थी कि सुरक्षा बलों के पास इन आतंकियों की मौजूदगी का इनपुट रहता है, लेकिन उन्हें ट्रैप करना मुश्किल होता है। इसका कारण यह है कि दहशतगर्द, सामान्य फोन से बातचीत नहीं करते।
जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपी वैद्य का कहना है, इसमें कोई शक नहीं है कि अब कश्मीर से जम्मू की तरफ आतंकवाद शिफ्ट हो रहा है। इसमें पाकिस्तान और चीन, ये दोनों देश मिले हैं। अनुच्छेद-370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में हालात बेहतर हुए हैं। यूं कहें कि वहां पर आतंकवाद की हार हुई है, तो यह कहना गलत नहीं होगा। इससे चीन और पाकिस्तान, दोनों में बौखलाहट है। अब उन्होंने, दहशतगर्दों का फोकस जम्मू की तरफ कर दिया है। इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे कश्मीर प्लेन क्षेत्र था। वहां रोड नेटवर्क बढ़िया है। इसके विपरित जम्मू में यह सब नहीं है। यहां पर सुरक्षा बलों को बहुत ज्यादा पैदल चलना पड़ता है। पहाड़ और जंगल भी खूब हैं। गांवों के बीच की दूरी अधिक है। दहशतगर्दों को छिपने की पर्याप्त जगह मिल जाती है। एलओसी से घुसपैठ की संभावना बनी रहती है। इसके लिए पुंछ राजौरी जैसे क्षेत्र, आतंकियों के लिए मनमाफिक हैं। इन क्षेत्रों में मिक्स जनसंख्या है। अनुच्छेद 370 के बाद जो नेरेटिव बना था, उसे आतंकी अब जम्मू में काउंटर करना चाहते हैं।
पूर्व डीजीपी वैद्य के मुताबिक, जम्मू में तो 15 साल से हालात नॉमर्ल थे। यहां पर लोकल आतंकी भी नहीं थे। ऐसे में पड़ोसी मुल्क ने अब यहां पर विदेशी आतंकी, यानी पाकिस्तानी दहशतगर्दों को आगे कर दिया है। कठुआ डोडा व दूसरे इलाकों में मारे गए आतंकियों में से ज्यादा विदेशी रहे हैं। जिस तरह से कश्मीर में आतंकियों को लोकल सपोर्ट मिल जाती थी, वैसा जम्मू में संभव नहीं था। यहां तो पत्थरबाज या दूसरे असामाजिक तत्व भी नहीं हैं। अब जिस तरह के हमले सामने आ रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि जम्मू क्षेत्र में भी आतंकी पैठ बना रहे हैं। ये तय है कि कुछ लोग आतंकियों की मदद कर रहे हैं। आतंकी संगठनों का 'ओवर ग्राउंड वर्कर' तैयार करने पर फोकस है। पैसा, विचार या डर, ये तीन बातें, लोगों को मदद के लिए आगे ला रही हैं। सेना के वाहन पर हमला, ये कोई दो चार दिन की प्लानिंग नहीं होती। इसके लिए लंबी रेकी करनी पड़ती है। सेना का वाहन कहां से चला है, बीच रास्ते की रिपोर्ट और रोड ओपनिंग पार्टी की स्थिति, ये सब बातें आतंकियों को बखूबी पता चल रही हैं। उनकी कोई तो मदद कर रहा है। सूचना उन तक पहुंचा रहा है।
जम्मू-कश्मीर की स्थिति को अच्छे से समझने वाले कैप्टन अनिल गौर (रिटा) कहते हैं, पाकिस्तान अब जम्मू को टारगेट कर रहा है। वहां के आतंकी संगठन, जम्मू को सॉफ्ट टारगेट मान रहे हैं। घुसपैठ की ज्यादा संभावना भी इस क्षेत्र में है। ऐसे में सेना और बीएसएफ को यह प्रयास करना होगा कि इस क्षेत्र में घुसपैठ का कोई भी मामला न हो। ड्रोन व टनल आदि पर नजर रखनी पड़ेगी। सेना के वाहन पर हमला, ये बिना रेकी के संभव नहीं है।
पूर्व डीजीपी वैद्य कहते हैं, यहां पर दो बाते हैं। आतंकियों को सेना के मूवमेंट की हर जानकारी रहती है, लेकिन सुरक्षा बलों को उनकी गतिविधि मालूम नहीं चलती। वजह, यहां मौजूद आतंकी चीन के संचार उपकरण इस्तेमाल कर रहे हैं। वे सायफर भाषा में संदेशों का आदान प्रदान करते हैं। यही वजह है कि सुरक्षा बल, उन्हें ट्रैक नहीं कर पा रहे हैं। अपनी पहचान छिपाने व खुफिया एजेंसियों को गुमराह करने के लिए आतंकी, संचार प्रक्रिया में सांकेतिक नामों का इस्तेमाल करते हैं। टेलीग्राम भी बातचीत करने का अत्यंत सुरक्षित माध्यम है। इस एप के चैट को डिकोड से निकालना आसान नहीं है। सिफरटेक्स्ट एक एन्क्रिप्टेड टेक्स्ट है, जिसे एन्क्रिप्शन एल्गोरिदम के उपयोग से प्लेनटेक्स्ट में बदला जाता है। सिफरटेक्स्ट को तब तक नहीं पढ़ा जा सकता, जब तक इसे कुंजी के साथ प्लेनटेक्स्ट में परिवर्तित (डिक्रिप्ट) न कर दिया जाए। ऐसे में सुरक्षा बलों को ज्यादा से ज्यादा मानवीय इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। जम्मू में तो अधिकांश लोग, सेना के समर्थन में हैं। इसे सैन्य बलों को पुष्ट करना होगा।
पीएएफएफ ने जम्मू-कश्मीर में 'जी-20' की बैठक से कुछ दिन पहले भारतीय सेना के वाहन पर हमला किया था। उसमें पांच जवान शहीद हो गए थे। उसके बाद राजौरी के कंडी जंगलों में बनी गुफाओं में छिपे आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में भी सेना के पांच जवानों ने शहादत दी थी। इन हमलों में पहले आईईडी ब्लास्ट और फिर घात लगाकर जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की गई। अब कठुआ हमले की जिम्मेदारी कश्मीर टाइगर्स 'आतंकी संगठन' ने ली है। यह संगठन प्रतिबंधित पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की शाखा बताई जाती है। संगठन ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा, यह हमला 26 जून को डोडा में मारे गए 3 आतंकियों की मौत का बदला है। कठुआ के बडनोटा में भारतीय सेना पर हैंड ग्रेनेड और स्नाइपर गन से हमला किया गया है। जल्द ही और ज्यादा हमले किए जाएंगे। ये लड़ाई कश्मीर की आजादी तक चलती रहेगी।